भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०१ अन्यतरशब्द के बाद 'इतर' शब्द आता है। इस का अर्थ 'भिन्न' है। इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है— प्र० इतरः इतरौ इतरे | प० इतरस्मात् इतराभ्याम् इतरेभ्यः द्वि० इतरम् ,, इतरान् प० इतरस्य इतरयोः इतरेषाम् तृ० इतरेण इतराभ्याम् इतरैः स० इतरस्मिन् ,, इतरेषु च० इतरस्मै ,, इतरेभ्यः सं० हे इतर ! हे इतरौ ! हे इतरे! इतर के अनन्तर सर्वादिगण में अदन्त शब्द 'त्व' आता है। इस का अर्थ भी 'भिन्न' है। यह वेद में प्रयुक्त होता है। इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् है— प्र० त्वः त्वौ त्वे | प० त्वस्मात् त्वाभ्याम् त्वेभ्यः द्वि० त्वम् ,, त्वान् ष० त्वस्य त्वयोः त्वेषाम् तृ० त्वेन त्वाभ्याम् त्वैः स० त्वस्मिन् ,, त्वेषु च० त्वस्मै ,, त्वेभ्यः सं० हे त्व ! हे त्वौ ! हे त्वे ! त्वशब्द के अनन्तर अदन्त सर्वनाम 'नेम' शब्द आता है। अर्ध (आधा) अर्थ में इस का सर्वादिगण में पाठ अभीष्ट है। अवधि आदि अर्थों में पाठ न होने से सर्वनाम- सञ्ज्ञा नहीं होगी। तब रामवत् उच्चारण होगा। अर्धवाची सर्वनाम नेमशब्द का विशेष विवेचन प्रथमचरम० (१६०) सूत्र पर देखें। सर्वादिगण में नेमशब्द के बाद 'सम' आता है। इस के 'सर्व' और 'तुल्य' दो अर्थ होते हैं। 'सर्व' अर्थ में इस की सर्वनामसञ्ज्ञा इष्ट है; 'तुल्य' अर्थ में नहीं। इस का कारण यह है कि आचार्य ने यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) सूत्र में 'समानाम्' कहा है। यहां समशब्द तुल्यवाचक है। यदि इस अर्थ में इस का सर्वादिगण में पाठ होता तो 'समानाम्' की बजाय 'समेषाम्' होता। सर्वनामसञ्ज्ञक समशब्द की रूप- माला यथा— प्र० समः समौ समे | प० समस्मात् समाभ्याम् समेभ्यः द्वि० समम् ,, समान् ष० समस्य समयोः समेषाम् तृ० समेन समाभ्याम् समैः स० समस्मिन् ,, समेषु च० समस्मै ,, समेभ्यः सं० हे सम ! हे समौ ! हे समे ! इस के बाद 'सिम' (सर्व) शब्द आता है। इस की रूपमाला भी सर्ववत् है— प्र० सिमः सिमौ सिमे | प० सिमस्मात् सिमाभ्याम् सिमेभ्यः द्वि० सिमम् ,, सिमान् ष० सिमस्य सिमयोः सिमेषाम् तृ० सिमेन सिमाभ्याम् सिमैः स० सिमस्मिन् ,, सिमेषु च० सिमस्मै ,, सिमेभ्यः सं० हे सिम ! हे सिमौ ! हे सिमे! इसके बाद पूर्व-परावर-दक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायाम् असंज्ञायाम् यह गण-सूत्र आता है। इस का अर्थ है—सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ हो तो 'पूर्व, पर, अवर,