लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 228, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ९३ 'निर्जर+औ' यहां अजादि विभक्ति परे है 'औ'। परन्तु यहां जरा शब्द नहीं 'निर्जर' शब्द वर्त्तमान है अतः जरस् आदेश कैसे हो ? इस का समाधान अग्रिम- परिभाषा से करते हैं— [लघु०] पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (प०) ॥ अर्थः—'पद' तथा 'अङ्ग' के अधिकार में जिस के स्थान पर जो आदेश विधान किया जाये वह आदेश उस के तथा तदन्त = वह जिसके अन्त में है उस समुदाय के भी स्थान पर हो जाता है । व्याख्या—पदस्य यह अष्टमाध्याय के प्रथमपाद का सोलहवां सूत्र है । यह अधिकार-सूत्र है। इस का अधिकार अपदान्तस्य मूर्धन्यः (८.३.५५) सूत्र तक जाता है। इसे पदाधिकार कहते हैं । [अलुगुत्तरपदे (६.३.१) इत्ययमुत्तरपदाधिकारोऽपि पदाधिकारग्रहणेन गृह्यते इति तत्त्वबोधिनीकाराः श्रीज्ञानेन्द्रस्वामिनः] । अङ्गस्य यह षष्ठाध्याय के चतुर्थ पाद का प्रथम-सूत्र है। यह भी अधिकार- सूत्र है। इस का अधिकार सातवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। इसे अङ्गाधिकार कहते हैं। इन दोनों अधिकारों में जिस के स्थान पर आदेश का विधान किया गया हो उस के तथा वह जिस समुदाय के अन्त में हो उस समुदाय के भी स्थान पर वह आदेश होता है । जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र अङ्गाधिकार में पढ़ा गया है। इस सूत्र में जरस् आदेश जरा के स्थान पर विधान किया गया है। अतः वह आदेश अकेले जरा शब्द के स्थान पर भी होगा और जरा शब्द जिस के अन्त में होगा ऐसे 'निर्जर' प्रभृति शब्दों के स्थान पर भी होगा । जरस् आदेश अनेकाल् है अतः अनेकाल्शित् सर्वस्य (४५) सूत्र से सम्पूर्ण 'निर्जर' शब्द के स्थान पर वह प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-परिभाषा प्रवृत्त होती है — [लघु०] निर्दिश्यमानस्याऽऽदेशा भवन्ति (प०) ॥ अर्थः—जिस का निर्देश किया गया हो उस के स्थान पर ही आदेश होते हैं। व्याख्या—सूत्र में जो साक्षात् निर्दिष्ट किया गया हो उस के स्थान पर ही आदेश करना चाहिये । अन्य के स्थान पर नहीं। जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र में जरस् आदेश जरा के स्थान पर ही कहा गया है, अतः वह 'निर्जर' के अन्तर्गत 'जरा' के स्थान पर ही होगा सम्पूर्ण 'निर्जर' के स्थान पर नहीं । यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि जब आदेश निर्दिश्यमान के स्थान पर ही करना अभीष्ट है तो पुनः पूर्वोक्त तदन्तग्रहण-परिभाषा का क्या लाभ ? इस का उत्तर यह है कि तदन्तग्रहणपरिभाषा से केवल इतना लाभ होता है कि प्रथम जो तदन्तों में आदेश की बिलकुल प्राप्ति नहीं होती थी सो अब हो जाती है। यथा—यदि तदन्त- ग्रहणपरिभाषा न होती तो 'निर्जर' शब्द में जरस् आदेश की बिलकुल प्राप्ति ही न