भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

२१४ भैमीव्याख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् होनी, क्योंकि वहाँ 'निर्जर' शब्द है 'जरा' नहीं। अब इस परिभाषा से तदन्तघटित 'निर्जर' के जरा में भी आदेश की प्रवृत्ति हो जाती है—यह यहाँ लाभ है। अब यहाँ यह सन्देह होता है कि 'निर्जर' शब्द में 'जरा' नहीं 'जर' है। आदेश जरा के स्थान पर ही होता है अतः यहाँ जरस् नहीं होना चाहिये। इस अड़चन को दूर करने के लिये अग्रिम-परिभाषा प्रवृत्त होती है— [लघु०] एकदेशविकृतमनन्यवत् (प०)। इति जराशब्दस्य जरस्—निर्जरसौ। निर्जरसः । इत्यादि। पक्षे हलादौ च रामवत् ॥ अर्थ — अवयव के विकृत हो जाने पर अवयवी अन्य के समान नहीं हो जाता। व्याख्या यह परिभाषा लोकन्याय पर आश्रित है अर्थात् जैसे लोक में किसी कुत्ते की पूँछ कट जाने पर वह अन्य नहीं हो जाता, कुत्ता ही रहता है, इसी प्रकार यहाँ शास्त्र में भी यदि किसी शब्द में व्याकरणजन्य कुछ विकृति आ जाये तो वह वही शब्द रहता है अन्य शब्द नहीं हो जाता। तो इस प्रकार 'निर्जर' के अन्तर्गत 'जरा' के 'जर' हो जाने पर भी वह 'जरा' ही रहता है कुछ अन्य नहीं हो जाता। इस से 'जर' को भी जरस् आदेश हो जाता है। 'निर्जर + औ' यहाँ 'जर' को जरस् आदेश होकर—निर्जरस् + औ = 'निर्ज- रसौ' रूप सिद्ध हो जाता है। पक्ष में रामशब्दवत् प्रक्रिया होकर 'निर्जरौ' रूप बनता है। इसी प्रकार आगे भी अजादि विभक्तियों में समझ लेना चाहिये। 'निर्जर' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० निर्जर निर्जरसौ, निर्जरौ निर्जरसः, निर्जराः द्वि० निर्जरसम्, निर्जरम् " " निर्जरसः, निर्जरान् तृ० निर्जरसा, निर्जरेण निर्जराभ्याम् निर्जरैः च० निर्जरसे, निर्जराय " निर्जरेभ्यः प० निर्जरसः, निर्जरात् " " ष० निर्जरसः, निर्जरस्य निर्जरसोः, निर्जरयोः निर्जरसाम्, निर्जराणाम् स० निर्जरसि, निर्जरे " " निर्जरेषु सं० हे निर्जर ! हे निर्जरसौ!, निर्जरौ ! हे निर्जरसः !, निर्जराः ! इसी प्रकार जराशब्दान्त 'दुर्ज्जर' प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। ध्यान रहे कि— इन, आत्, स्य, य तथा नुट् आदियों से जरस् आदेश पर है; अतः प्रथम जरस् आदेश प्रवृत्त होकर तदनन्तर उन की बारी आयेगी। परन्तु जरस् हो चुकने पर अङ्ग के अदन्त या अजन्त न रहने से उन की प्रवृत्ति न होगी। यदि प्रथम 'इन' आदि आदेश हो जाते तो टा में 'निर्जरसिन', ङसिं में 'निर्जरसात्' तथा ङस्, ङे और आम् में हलादि हो जाने से जरस् आदेश न हो— 'निर्जरस्य', निर्जराय' और 'निर्जराणाम्' यह एक-एक रूप बन कर अनिष्ट हो जाता।