भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 633 में से

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पृष्ठ 227

२१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (ग) जसः शी यहा 'शी' की बजाय ह्रस्व 'शि' क्यो नही किया ? (घ) 'उभ' शब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का क्या प्रयोजन है ? (ङ) 'स्व' शब्द की किस अर्थ मे सर्वनामसञ्ज्ञा है ? स्पष्ट करें । (३) आमिसर्वनाम्नः० का क्यों कैसे और कौन-सा अर्थ ग्रन्थकार ने किया है ? (४) तद्गुणसंविज्ञान और अतद्गुणसंविज्ञान का विवेचन करते हुए यह लिखें कि सर्वादीनि सर्वनामानि सूत्र मे किस का आश्रय उचित है ? (५) सर्वादिगणपठित त्रिसूत्री का पुन अष्टाध्यायी मे क्यो उल्लेख किया है ? (६) निम्नलिखित परिभाषाओ का सोदाहरण विवेचन करें - (१) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् । (२) सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्त- ग्रहण नास्ति । (३) यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते । (४) उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् । (५) न केवला प्रकृति. प्रयोक्तव्या, न केवल प्रत्यय । (७) (क) 'सर्व, अर्ध, तृतीय, नेम, सम' शब्दो के षष्ठी-बहुवचन मे रूप सिद्ध करें । (ख) 'उभ, अर्ध, द्वितय, द्वितीय, पूर्व, स्व, अन्तर, एक' शब्दो के पञ्चमी के एकवचन मे रूप सिद्ध करें । (ग) 'कतिपय, चरम, स्व, प्रथम' शब्दो की प्रथमा-बहुवचन मे सिद्धि करें। ───.०.─── रामशब्द की अपेक्षा विशिष्ट उच्चारण वाले शब्दो में 'निर्जर' शब्द का प्रमुख- स्थान है। अत अब यहा उस का वर्णन किया जाता है- निर्गतो जराया = निर्जर (निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या इति वार्त्तिकेन समास, उपसर्जनह्रस्व ) । देवता को 'निर्जर' कहते हैं, क्योकि वह जरा = बुढ़ापे से रहित होता है। प्रथमा के एकवचन मे रामशब्द के समान 'निर्जरः' रूप बनता है। प्रथमा के द्विवचन मे-- निर्जर + औ । यहा अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१६१) जराया जरसन्यतरस्याम् ।७।२।१०१॥ अजादौ विभक्तौ ॥ अर्थः-अजादि विभक्ति परे हो तो जरा शब्द को विकल्प से जरस् आदेश हो। व्याख्या--अचि ।७।१। (अचि र ऋत से) । विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। जराया ।६।१। जरस् ।१।१। अन्यतरस्याम् ।७।१। 'विभक्तौ' का विशेषण होने से यस्मिन्विधिरुत्तदादावल्ग्रहणे द्वारा 'अचि' पद से तदादिविधि हो 'अजादौ' बन जाता है । अर्थ -(अचि) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था मे (जराया) जरा शब्द के स्थान पर (जरस्) जरस् आदेश हो। औ, जस् (अस्), अम्, औट् (औ), शस् (अस्), टा (आ), ङे (ए), ङसिं (अस्), ङस् (अस्), ओस्, आम्, ङि (इ), ओस्-ये तेरह अजादि विभक्तिया हैं।

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