लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्तपुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २११ अर्थः- ङित् विभक्तियों के परे होने पर तीयप्रत्ययान्तों की विकल्प कर के सर्वनामसञ्ज्ञा होती है। व्याख्या—तीयस्य ।६।१। डित्सु ।७।३। वा इत्यव्ययपदम्। सर्वनामता ।१।१। (प्रकरण-प्राप्त) । 'तीय' यह एक प्रत्यय है। केवल इस की सञ्ज्ञा का कोई प्रयोजन नहीं; अतः सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति इस निषेध के होते हुए भी प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा से तीयप्रत्ययान्तों का ही ग्रहण किया जायेगा। द्वेस्तीयः (११७५) तथा त्रेः सम्प्रसारणं च (११७६) सूत्रों द्वारा 'द्वि' और 'त्रि' शब्दों से तीय- प्रत्यय हो कर द्वितीय और तृतीय ये दो तीयप्रत्ययान्त शब्द निष्पन्न होते हैं। इन दो का ही यहां ग्रहण अभीष्ट है। ङ् इत् यस्य असौ = ङित्, जिस के ङकार की इत्सञ्ज्ञा हो उसे ङित् कहते हैं। ङित् विभक्तियां चार हैं—ङे, ङसिं, ङस्, ङि। अर्थः—(ङित्सु) ङित् प्रत्ययों के परे होने पर (तीयस्य) तीयप्रत्ययान्त शब्दों की (सर्वनामना) सर्व- नाम संज्ञा (वा) विकल्प से हो जाती है। तीयप्रत्ययान्तों का पाठ सर्वादिगण में नहीं आया अतः वहां सर्वनामसंज्ञा अप्राप्त है। प्रकृत वार्त्तिक मे केवल ङित् विभक्तियों में उस का वैकल्पिक विधान किया जा रहा है। ङे में सर्वनामसंज्ञा होने से सर्वनाम्नः स्मै (१५३) तथा ङसिं और ङि में सर्व- नामसञ्ज्ञा होने मे ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) सूत्र प्रवृत्त होगा। ङस् में कुछ विशेष नहीं¹। पक्ष में जहां सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी वहां रामशब्दवत् प्रक्रिया होगी। द्वितीय (दूसरा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितीयः द्वितीयौ द्वितीयाः द्वि० द्वितीयम् ” द्वितीयान् तृ० द्वितीयेन द्वितीयाभ्याम् द्वितीयैः च० द्वितीयस्मै, द्वितीयाय ” द्वितीयेभ्यः प० द्वितीयस्मात्, द्वितीयात् ” ” ष० द्वितीयस्य द्वितीययोः द्वितीयानाम् स० द्वितीयस्मिन्, द्वितीये ” द्वितीयेषु सं० हे द्वितीय ! हे द्वितीयौ ! हे द्वितीयाः ! इसी प्रकार तृतीय (तीसरा) शब्द की रूपमाला जानें। अभ्यास (२७) (१) व्यवस्था का लक्षण लिख उस का सोदाहरण विस्तृत विवेचन करें। (२) (क) किस अर्थ में 'सम' की सर्वनामसञ्ज्ञा होती है और क्यों ? (ख) द्वितीय और द्वितय की रूपमालाओं का अन्तर सप्रमाण लिखें। १. यहां पुंल्लिङ्ग में यद्यपि सर्वनामसञ्ज्ञा का कोई फल नहीं, तथापि स्त्रीलिङ्ग में 'द्वितीयस्याः, तृतीयस्याः' प्रयोगों में सर्वनाम्नः स्याड्० (२२०) द्वारा स्याट् आगम तथा ह्रस्व होना फल है।