भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 224

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०६ अर्थः—प्रथम, चरम, तयप्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम—ये शब्द जस् परे होने पर विकल्प कर के सर्वनाम-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाः ।१।३। च इत्यव्ययपदम् । जसि ।७।१। विभाषा ।१।१। (विभाषा जसि से) । सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्व- नामानि से) । समासः—प्रथमश्च चरमश्च तयश्च अल्पश्च अर्धश्च कतिपयश्च नेमश्च =प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(प्रथम—नेमाः) प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम ये शब्द (जसि) जस् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं । इन शब्दों में ‘नेम’ शब्द के अतिरिक्त अन्य किसी शब्द का सर्वादिकण में पाठ नहीं, अतः शेष सब शब्दों की जस् को छोड़ अन्य विभक्तियों में रामशब्दवत् प्रक्रिया होगी । जस् में सर्वनामपक्ष में जसः शी (१५२) आदि कार्य होंगे । तदभावपक्ष में रामवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये । इन की रूपमाला यथा— प्रथम (पहला) | चरम (अन्तिम) प्र० प्रथमः प्रथमो { प्रथमे | प्र० चरमः चरमो { चरमे { प्रथमाः | { चरमाः द्वि० प्रथमम् ,, प्रथमान् | द्वि० चरमम् ,, चरमान् तृ० प्रथमेन प्रथमाभ्याम् प्रथमैः | तृ० चरमेण चरमाभ्याम् चरमैः च० प्रथमाय ,, प्रथमेभ्यः | च० चरमाय ,, चरमेभ्यः प० प्रथमात् ;; ,, | प० चरमात् ,, ,, ष० प्रथमस्य प्रथमयोः प्रथमानाम् | ष० चरमस्य चरमयोः चरमाणांम् स० प्रथमे ,, प्रथमेषु | स० चरमे ,, चरमेषु सं० हे प्रथम! हे प्रथमौ! { हे प्रथमे ! | सं० हे चरम! हे चरमौ! { हे चरमे! { हे प्रथमाः! | { हे चरमाः! चरमशब्द के बाद ‘तय’ आता है । ‘तय’ प्रत्यय है । प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् इस परिभाषानुसार तयप्रत्ययान्तों का ही ग्रहण किया जायेगा । यद्यपि सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति इस ज्ञापक से तदन्तों का ग्रहण नहीं होना चाहिये था; तथापि केवल तय प्रत्यय की सञ्ज्ञा करना निष्प्रयोजन होने से तदन्तों का ग्रहण हो जाता है । तयप्रत्ययान्त शब्द—द्वितय, त्रितय, चतुष्टय, पञ्चतय, षट्‌तय, सप्ततय, अष्टतय, नवतय, दशतय आदि जानने चाहियें । किञ्च—द्वि और त्रि शब्दों से परे तयप् को द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा (११६६) सूत्र से अयच् आदेश हो कर ‘द्वय’ और ‘त्रय’ शब्द भी बन जाते हैं । ये भी स्थानिवद्भाव से तयप्रत्ययान्त होने के कारण जस् में प्रकृत सूत्र द्वारा विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं । द्वितय (द्वौ अवयवौ यस्य, दो अवयवों वाला—जोड़ा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितयः द्वितयौ { द्वितये | द्वि० द्वितयम् द्वितयौ द्वितयान् { द्वितयाः | ल० प्र० (१४)