भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

होगी। यदि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक 'सुं' हो कर अनिष्ट हो जाता। यद्यपि यहां 'घु, टि, घि' की भान्ति कोई छोटी सञ्ज्ञा भी की जा सकती थी तथापि पाणिनि ने पूर्वाचार्यों के अनुरोध से यह बड़ी सञ्ज्ञा की है। पाणिनि से पूर्ववर्त्ती आचार्य चूंकि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करते चले आये हैं अतः पाणिनि ने भी उन का अनुसरण किया है। पदं पदं प्रति प्रतिपदम्, तदहंत्तीति प्रातिपदिकम् । शब्दों के विषय में विद्वानों में दो मत प्रचलित हैं। १ व्युत्पत्तिपक्ष, २ अव्यु- त्पत्तिपक्ष। अव्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि किसी वस्तु की सञ्ज्ञा अपने सञ्ज्ञी को समुदाय-शक्ति से ही जनाती है उस में अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिये। अर्थात् 'राम' यह सञ्ज्ञा समुदायशक्ति से ही दशरथ-पुत्र रूप सञ्ज्ञी को प्रकट करती है इसमें अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिये—यही अव्युत्पत्तिपक्ष है। व्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि प्रत्येक वस्तु की सञ्ज्ञा का कोई न कोई अर्थ—जो उस के अवयवों से निष्पन्न होता है—ज़रूर हुआ करता है। यथा—'राम' शब्द में 'रम्' (भ्वा० आ०) धातु से 'घञ्' प्रत्यय हुआ है। 'रम्' का अर्थ 'खेलना' और 'घञ्' प्रत्यय अधिकरण को प्रकट करता है। रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः । अर्थात् जिस में (योगी जन) रमण करते हैं वह 'राम' है। यही व्युत्पत्तिपक्ष है। अवयवों द्वारा शब्दों के अर्थ करने की रीति बहुत प्राचीन है। वेद में इस पक्ष का बहुत आदर किया जाता है। परन्तु लोक में व्युत्पत्ति अव्युत्पत्ति दोनों पक्ष चलते हैं। अव्युत्पत्तिपक्ष में— जिस में न कोई धातु और न कोई प्रत्यय माना जाता है— अर्थवदधातुर० (११६) सूत्र प्रातिपदिक सञ्ज्ञा करता है और व्युत्पत्तिपक्ष—जहां धातु आदि से परे कृत् या तद्धित प्रत्यय की कल्पना होती है—के लिये दूसरा प्रातिपदिक सञ्ज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(११७) कृत्तद्धितसमासाश्च ।१।२।४६॥ कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा [प्रातिपदिक-सञ्ज्ञकाः] स्युः ॥ अर्थः—कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास भी पूर्ववत् प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—कृत्तद्धितसमासाः ।१।३। च इत्यव्ययपदम् । प्रातिपदिकानि ।१।३। (यहां पूर्व-सूत्र से आ रहे 'प्रातिपदिकम्' पद का बहुवचन में विपरिणाम हो जाता है)। समासः—कृच्च तद्धितश्च समासाश्च = कृत्तद्धितसमासाः। इतरेतरद्वन्द्वः । इस सूत्र में पूर्वसूत्र से 'अर्थवत्' पद की अनुवृत्ति होती है। कृत् और तद्धित अकेले अर्थवाले नहीं होते किन्तु जब प्रकृति (जिससे प्रत्यय किया जाता है उसे 'प्रकृति' कहते हैं। प्रत्ययात् पूर्वं क्रियत इति प्रकृतिः) से युक्त होते हैं तभी अर्थवाले होते हैं। तो इसलिये यहां कृत् से कृदन्त तथा तद्धित से तद्धितान्त लिया जायेगा। अर्थः—(कृत्तद्धित- समासाः) कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास (च) भी (प्रातिपदिकानि) प्रातिपदिक- [सञ्ज्ञक होते हैं।] ल० प्र० (११)