लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (५) एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि सूत्र में 'अनञ्समासे' यहां कौन सा प्रतिषेध है ? और ऐसा क्यों माना जाता है ? (६) (क) 'एषकस् + शिव' यहां सुँलोप क्यों न हो ? (ख) 'तृढ' यहां पूर्व अण् को दीर्घ क्यों न हो ? (ग) 'मनोरथ' यहां रेफ का लोप क्यों न हो ? (घ) 'अजर्या' यहां सन्धिविच्छेद करें । (ङ) रोऽसुपि में 'असुपि' क्यों कहा है ? (७) सुँ का लुक् हो कर पदसंज्ञा करने में प्रत्ययलक्षण प्रवृत्त हो जाता है परन्तु लुक् हुए सुँ को मानने में वह प्रवृत्त नहीं होता—इस की सोदाहरण मीमांसा करें । (८) रो रि सूत्र का ऐसा उदाहरण बताएं जहां पूर्व अण् को दीर्घ न होता हो ? [ भानो रश्मय, नरपते रिपु ] (६) 'अहर्गण' में रूँ आदेश प्राप्त था पुनः रेफ आदेश क्यों विधान किया गया है ? (१०) निम्नस्थ रूपों को सप्रमाण शुद्ध करें— १ प्रातोऽत्र । २ पुन्रो रविष्वदति । ३ एषो गच्छामि । ४ अहो रम्यम् । ५ सो रोदिति । ६ अनेष राम । ७ अजागोऽसौ । ८. सश्शान्ति । ९ साहमाजन्मशुद्धानाम् । १०. एषो दुःखप्रदो काल । —————— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु- सिद्धान्त-कौमुद्यां पञ्चसन्धि- प्रकरणं समाप्तम् ॥