भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 173

१५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (५) एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि सूत्र में 'अनञ्समासे' यहां कौन सा प्रतिषेध है ? और ऐसा क्यों माना जाता है ? (६) (क) 'एषकस् + शिव' यहां सुँलोप क्यों न हो ? (ख) 'तृढ' यहां पूर्व अण् को दीर्घ क्यों न हो ? (ग) 'मनोरथ' यहां रेफ का लोप क्यों न हो ? (घ) 'अजर्या' यहां सन्धिविच्छेद करें । (ङ) रोऽसुपि में 'असुपि' क्यों कहा है ? (७) सुँ का लुक् हो कर पदसंज्ञा करने में प्रत्ययलक्षण प्रवृत्त हो जाता है परन्तु लुक् हुए सुँ को मानने में वह प्रवृत्त नहीं होता—इस की सोदाहरण मीमांसा करें । (८) रो रि सूत्र का ऐसा उदाहरण बताएं जहां पूर्व अण् को दीर्घ न होता हो ? [ भानो रश्मय, नरपते रिपु ] (६) 'अहर्गण' में रूँ आदेश प्राप्त था पुनः रेफ आदेश क्यों विधान किया गया है ? (१०) निम्नस्थ रूपों को सप्रमाण शुद्ध करें— १ प्रातोऽत्र । २ पुन्रो रविष्वदति । ३ एषो गच्छामि । ४ अहो रम्यम् । ५ सो रोदिति । ६ अनेष राम । ७ अजागोऽसौ । ८. सश्शान्ति । ९ साहमाजन्मशुद्धानाम् । १०. एषो दुःखप्रदो काल । —————— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु- सिद्धान्त-कौमुद्यां पञ्चसन्धि- प्रकरणं समाप्तम् ॥