भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 172

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५७ व्याख्या—तनिक ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सम्पूर्ण प्रकरण विसर्गसन्धि का नहीं है। अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६), हशि च (१०७), रोऽसुपि (११०), एतत्तदोः० (११४) आदि सूत्रों का—अवसान अथवा खर् परक न होने से विसर्गों के साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। किञ्च यदि इस सम्पूर्ण प्रकरण को विसर्ग- सन्धिप्रकरण मानें तो पञ्चसन्धिप्रकरण यह कथन असङ्गत हो जाता है क्योंकि तब चार ही प्रकरण होते हैं—१ अच्सन्धि-प्रकरण। २ प्रकृतिभाव-प्रकरण। ३ हल्सन्धि- प्रकरण। ४ विसर्गसन्धि-प्रकरण। अतः हमारे विचार में यहां दो प्रकरण ही होने चाहियें। वा शरि (१०४) तक विसर्गसन्धि-प्रकरण और इस से आगे स्वादिसन्धि- प्रकरण। वा शरि (१०४) सूत्र से आगे जितने सूत्र कहे गये हैं उन सब का सुँ आदि प्रत्ययों के साथ सम्बन्ध है अतः आगे 'स्वादिसन्धि-प्रकरण' कहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। 'सिद्धान्त-कौमुदी' में ऐसा किया भी गया है। इस प्रकार पञ्च- सन्धि-प्रकरण भी ठीक हो जाते हैं। प्रतीत होता है कि लिपिकरों की भूल से यहां दो प्रकरणों का एक प्रकरण कर दिया गया है। [लघु०] समाप्तञ्चेदं पञ्च-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां पञ्चसन्धिप्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—(१) अच्सन्धि-प्रकरण, (२) प्रकृतिभाव-प्रकरण, (३) हल्सन्धि- प्रकरण, (४) विसर्गसन्धि-प्रकरण, (५) स्वादिसन्धि-प्रकरण ये पञ्च सन्धि प्रकरण हैं। यहां कई लोग प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण नहीं मानते। उन का कथन है कि 'हरी एतौ' आदि में प्रकृतिभाव अर्थात् सन्धि का अभाव ही विधान किया गया है किसी सन्धि का विधान नहीं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण में गिनना भूल है। 'पञ्च-सन्धि-प्रकरणम्' इस की सङ्गति लगाने के लिये वे अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६), वा पदान्तस्य (८०) द्वारा विधान की गई एक अनुस्वार-सन्धि की कल्पना करते हैं। परन्तु हमारी सम्मति में 'प्रकृतिभावप्रकरण' के अन्दर मय उञो वो वा (५८), इकोऽसवर्णे० (५६), ऋत्यकः (६१) आदि सन्धि करने वाले सूत्र पाए जाते हैं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण भी एक प्रकार का सन्धिप्रकरण ही है। नवीन अनुस्वारसन्धि की कल्पना करना ग्रन्थकार के आशय से विपरीत जान पड़ता है। आगे विद्वज्जन स्वयं युक्तायुक्त का विचार कर लें। अभ्यास (२५) (१) तुल्यवलविरोध किसे कहते हैं ? उदाहरण दे कर समन्वय करें । (२) रोऽसुंपि सूत्र किस का और कैसे अपवाद है ? (३) सोऽचि लोपे० सूत्र में 'एव' पद लाने की क्या आवश्यकता है ? (४) पञ्च सन्धिप्रकरण कौन से हैं ? क्या प्रकृतिभावप्रकरण भी सन्धि- प्रकरण है ?