लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 171, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां य् (१०८) और य् का वैकल्पिक लोप (३०) हो—'स इमामविद्धि प्रभृति य ईशिषे' इस प्रकार तेरह अक्षरों वाला पाद हो जाता, क्योंकि यकारलोप के असिद्ध होने से गुण प्राप्त नहीं हो सकता था । अब यहां इस सूत्र द्वारा विहित सकारलोप के त्रैपादिक न होने के कारण सिद्ध होने से गुण के निर्बाध हो जाने के कारण बारह अक्षर पूरे हो जाते हैं कोई दोष नहीं आता । द्वितीय उदाहरण यथा— सैष दाशरथी' रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः । सैष कर्णो महात्यागी, सैष भीमो महाबलः ॥ [ये वे भगवान् दशरथनन्दन श्रीराम हैं। ये वे राजा युधिष्ठिर हैं। ये वे महादानी कर्ण हैं । ये वे महाबली भीम हैं।] यह 'अनुष्टुम्' (पद्यावक्त्र) छन्द है। अनुष्टुभ् छन्द के चार पाद और प्रत्येक पाद में आठ २ अक्षर होते हैं। इन सब पादों में 'सस् + एष' यहां प्रकृत सूत्र से स् का लोप हो वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने पर 'सैष' प्रयोग सिद्ध होता है । इस से आठ २ अक्षरों वाले सब पाद पूरे हो जाते हैं। यदि यहां इस सूत्र से स् का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को य् और य् का वैकल्पिक लोप हो कर त्रैपादिकतामूलक असन्धि होने से—'स एष' या 'सयेष' इस प्रकार रूप हो जाते । इस से प्रत्येक पाद में नौ २ अक्षर हो कर छन्दोभङ्ग हो जाता । अतः यहां पादपूर्ति का—सिवाय इस के कि स् का सिद्ध लोप किया जाये, अन्य कोई उपाय नहीं, इसलिये स् का लोप किया गया है । 'बहुलम्' की अनुवृत्ति से 'एव' इसलिये ग्रहण किया गया है कि यदि किसी अन्य उपाय से पाद पूरा हो सकता हो तो स् का लोप न हो । किन्तु जब पादपूर्ति का अन्य कोई उपाय न सूझता हो तब लोप करना चाहिये । यथा— सोऽहमाजन्मशुद्धानाम्, आफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानाम्, आनाकरथवर्त्मनाम् ॥ (रघु० १ ५) यहां 'सस्+ अहम्' में सकार का लोप करने पर 'साहम्' बन जाने से पाद की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यह पादपूर्ति अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) द्वारा उत्व कर गुण और पूर्वरूप करने पर भी हो सकती है। अतः यहां स् का लोप न कर उत्व आदि ही करेंगे। आचार्य वामन इस सूत्र के 'पाद' शब्द से ऋग्वेद के पाद का ही ग्रहण करते हैं। उन का कथन है कि यदि ऋग्वेद के पाद की पूर्ति होती होगी तो सकार का लोप हो जायेगा। परन्तु सूत्र में किसी विशेष स्थान के पाद का उल्लेख न होने से सर्वत्र लोक अथवा वेद में इस की प्रवृत्ति होती है—ऐसा अन्य लोग मानते हैं । ग्रन्थकार ने दोनों मत दिखाने के लिये दोनों उदाहरण दे दिये हैं। [लघु०] इति विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां विसर्ग-सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है । १. अत्र रो रि (१११) इति रेफलोपे ढ्रलोपे० (११२) इति पूर्वस्याणो दीर्घः ।