लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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अथ षड्लिङ्ग्यामजन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम्
सन्धिप्रकरण सर्वप्रकरणोपयोगी होने के कारण सर्वप्रथम व्याख्यात किया गया। अब व्याकरणशास्त्र का मुख्य कार्य शब्दविवेचन प्रारम्भ होता है। व्याकरण-शास्त्र में शब्द तीन प्रकार के होते हैं। १. सुंवन्त, २. तिङन्त और ३. अव्यय¹। अब सुंबन्त शब्दों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जिन शब्दों के अन्त में सुँप् प्रत्यय हों उन्हें सुंबन्त शब्द कहते हैं। वे शब्द प्रथम दो प्रकार के होते हैं। १. अजन्त, २. हलन्त। जिन शब्दों के अन्त में अच् अर्थात् स्वर हों वे शब्द अजन्त तथा जिन शब्दों के अन्त में हल् अर्थात् व्यञ्जन हों वे शब्द हलन्त कहाते हैं। यथा—'राम' शब्द के अन्त में अकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी अकारान्त अजन्त है। 'हरि' इस शब्द के अन्त में इकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी इकारान्त अजन्त है। 'पितृ' इस शब्द के अन्त में ऋकार = अच् है अतः यह अजन्त शब्द है और अजन्तों में भी ऋकारान्त अजन्त है। 'गो' इस शब्द के अन्त में ओकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी ओकारान्त अजन्त है। 'लिह्' इस शब्द के अन्त में हकार = हल् है अतः यह हलन्तशब्द है और हलन्तों में भी हकारान्त हलन्त है। 'राजन्' इस शब्द के अन्त में नकार = हल् है अतः यह हलन्तशब्द है और हलन्तों में भी नकारान्त हलन्त है। इस प्रकार अजन्त और हलन्त भेद से शब्द दो प्रकार के होते हैं। दो प्रकार के भी ये शब्द पुनः तीन लिङ्गों के भेद से छः प्रकार के हो जाते हैं। तथाहि—१. अजन्त-पुंल्लिङ्ग, २. अजन्त-स्त्रीलिङ्ग, ३. अजन्त-नपुंसकलिङ्ग; ४. हलन्त-पुंल्लिङ्ग, ५. हलन्त-स्त्रीलिङ्ग, ६. हलन्त- नपुंसकलिङ्ग। इन छः भेदों के कारण ही इस प्रकरण को षड्लिङ्ग-प्रकरण कहते हैं। अब क्रमप्राप्त प्रथम अजन्त-पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ किया जाता है। सर्व- प्रथम सर्वोपयोगी प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा का विधान करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(११६) अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥१।२।४५॥ धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तञ्च वर्जयित्वाऽर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिक- सञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः—धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त को छोड़ कर अर्थ वाला शब्दस्वरूप प्रातिपदिक-सञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—अर्थवत् १।१। अधातुः १।१। अप्रत्ययः १।१। प्रातिपदिकम् १।१। समासादिः—अर्थोऽस्यास्तीत्यर्थवत्, तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् (११८१) इस सूत्र से
१. यद्यपि अव्यय भी सुंवन्त ही है तथापि इन से परे सम्पूर्ण सुँप् का लुक् हो जाने से इन की उन से विशेषता है अतः ब्राह्मणवसिष्ठन्याय से पृथक् उल्लेख किया गया है।