भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

हल्-सन्धि-प्रकरणम् १४१ के (तुँक्) तुँक् का आगम होता है। तुँक् किस का अवयव हो ? पदान्त दीर्घ का हो या छकार का ? यह यहां प्रश्न है। उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् के अनुसार तो छकार का अवयव होना चाहिये। पर ऐसा नहीं होना; यह दीर्घ का ही अवयव होता है। इस का कारण यह है कि यदि यह छकार का अवयव होना तो कित् होने से छकार के अन्त में होना चाहिये था, परन्तु विभाषा सेना-सुराच्छाया-शाला-निशा- नाम् (२.४.२५) सूत्र में तो छकार के आदि अर्थात् दीर्घ से परे देखा जाता है अतः यह दीर्घ का ही अन्तावयव है यह सुतरां सिद्ध होता है। उदाहरण यथा— 'लक्ष्मी + छाया' (लक्ष्मी की छाया। लक्ष्म्याश्छायेति विग्रहः, षष्ठी-तत्पुरुषः) यहां समास में पदान्त दीर्घ ईकार से छकार परे विद्यमान है अतः दीर्घ ईकार को विकल्प कर के तुँक् का आगम हो कर पूर्ववत् उँक् के चले जाने पर जश्त्व = दकार, श्चुत्व = जकार तथा चर्त्व = चकार हो कर विभक्ति लाने से—'लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मी- छाया' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। स्मरण रहे कि पहला सूत्र पदान्त अपदान्त कुछ नहीं कहता था इस लिये वह दोनों में प्रवृत्त होता था। परन्तु यह सूत्र पदान्त में ही प्रवृत्त होता है; वह भी तब जब पदान्त दीर्घ होगा। पदान्त—समस्त, व्यस्त दोनों अवस्थाओं में हो सकता है। ग्रन्थकार ने समस्तावस्था (समास अवस्था) का उदाहरण दिया है। व्यस्तावस्था (समासरहित अवस्था) के उदाहरण—'कुलटाच्छिन्ननासिका' आदि अभ्यास में देखें। नोट—यदि आङ् और माङ् अव्ययों से परे छकार होगा तो दीर्घ पदान्त होते हुए भी तुँक् का आगम नित्य होगा; तब पदान्ताद्वा (१०२) सूत्र प्रवृत्त नहीं होगा। इस के लिये नित्य तुँक् विधानार्थ आङ्माङोश्च (६.१.७२) यह नया सूत्र बनाया गया है। यथा—आच्छादयति, माच्छैत्सीः। इसे सिद्धान्त-कौमुदी में देखें। सूचना—'मूर्च्छना, मूर्च्छा' आदि में तुँक् नहीं समझना चाहिये, किन्तु अचो रहाभ्यां द्वे (६०) से वैकल्पिक द्वित्व हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हुआ है। किञ्च 'वाञ्छति' आदि में चकार जोड़ना अशुद्ध है, क्योंकि तुँक् प्राप्त नहीं। [लघु०] इति हल्सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां हलों की सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—सन्धि एक प्रकार का वर्णविकार ही है। यदि वह विकार अच् के स्थान पर हो तो 'अच्सन्धि', हल् के स्थान पर हो तो 'हल्सन्धि' कहाता है। इसी प्रकार विसर्ग-सन्धि के विषय में भी जान लेना चाहिये। लोक में प्रायः यह प्रचलित है और हम भी लोकवाद का अनुसरण करते हुए पीछे यही लिख आये हैं कि अच् का अच् के साथ मेल = विकृति 'अच्सन्धि' और हल् का हल् के साथ मेल 'हल्सन्धि' कहाता है। पर ध्यान देने से यह ठीक प्रतीत नहीं होता। क्योंकि ऐसा मानने से वान्तो यि प्रत्यये (२४) आदि अच्सन्धि के सूत्रों तथा ङमो ह्रस्वादचि ङमुँन्नित्यम् (८६) आदि हल्सन्धि के सूत्रों में व्यवस्था न बन सकेगी। अतः यही उचित प्रतीत