लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें. १४० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्रजा + पालयामास । १२ तस्मिन् + च । १३ बाल + थूत्करोति । १४ पुम् + चेष्टा । १५ चञ्चुमान् + टिट्टिभ । १६ प्रशान् + चरति । १७ नॄन् + प्रति । १८ पुम् + टिप्पणी । १९ पुम् + तर । २० य + क्षत्रिय । (६) 'हन्ति' में नश्छव्यप्रशान् सूत्र से तथा 'पुंदारा' में पुमः खय्यम्परे सूत्र से रुँत्व क्यों नहीं होता ? (७) सूत्रों की सोदाहरण व्याख्या करें— अनुनासिकात्परो०, नश्छव्यप्रशान्, पुमः खय्यम्०, कुप्वो ≍क ≍पौ च । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०१) छे च ।६।१।७३॥ ह्रस्वस्य छे तुक् । शिवच्छाया ॥ अर्थ—छकार परे होने पर ह्रस्व को अवयव तुँक् हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्वस्य ।६।१। तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से) । छे ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । संहितायाम् ।६।१। (यह अधिकृत है)। अर्थ—(संहितायाम्) संहिता के विषय में (ह्रस्वस्य) ह्रस्व का अवयव (तुँक्) तुँक् हो जाता है (छे) छकार परे हो तो। तुँक् कित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वह ह्रस्व का अन्तावयव होता है। उदाहरण यथा— शिव+छाया' (शिव की छाया । शिवस्य छायेति विग्रह, षष्ठी-तत्पुरुष- समास ) यहां वकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से छकार परे है और समास होने से संहिता का विषय भी है, अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वकारोत्तर अकार का अन्तावयव तुँक् हो कर उँक् के चले जाने पर—शिवत् + छाया । अब स्तोः श्चुना श्चुः (८ ४ ३६) के असिद्ध होने से झलां जशोऽन्ते (८ २ ३६) द्वारा तकार को दकार हो— शिवद् + छाया । पुनः स्तोः श्चुना श्चुः (८ ४ ३६) के प्रति शर्परे च (८ ४ ५४) के असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व अर्थात् दकार को जकार पश्चात् चर्त्व अर्थात् जकार को चकार किया तो—शिवच्छाया । अब 'सुँ' विभक्ति ला कर हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से उस का लोप हो—'शिवच्छाया' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां ष्टोः ष्टुः (३०६) द्वारा षवर्ग आदेश नहीं होगा, क्योंकि जश्त्व, श्चुत्व और चर्त्व तीनों उसकी दृष्टि में असिद्ध हैं। उसे तो 'त्' ही दीखता है। इस सूत्र के अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें। [लघु०] विधि सूत्रम्—(१०२) पदान्ताद्वा ।६।१।७४॥ दीर्घात् पदान्ताच्छे तुंग्वा । लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया ॥ अर्थ—पदान्त दीर्घ से छकार परे हो तो विकल्प से तुँक् का आगम हो। व्याख्या—दीर्घात् ।५।१। (दीर्घात् सूत्र से) । पदान्तात् ।५।१। छे ।७।१। (छे च सूत्र से) । तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से)। वा इत्यव्ययपदम्। अर्थ— (दीर्घात्) दीर्घ (पदान्तात्) पदान्त से (छे) छकार परे होने पर (वा) विकल्प कर