लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (नादिचि से)। अर्थ—(दीर्घात्) दीर्घ से (जसि) जस् (च) अथवा (इचि) इच्छ प्रत्याहार परे होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (पूर्वसवर्ण, दीर्घः, एव) पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश (न) नहीं होता। ‘विश्वपा+औ’ यहां पकारोत्तर आकार दीर्घ है। इस से परे औकार=इच् वर्त्तमान है। अतः पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो गया। तब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर 'विश्वपौ' रूप सिद्ध हुआ। प्रथमा के बहुवचन में—विश्वपा+जस्=विश्वपा+अस्। इस अवस्था में प्रकृतसूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो जाता है। तब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर 'विश्वपाः' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रश्न—'विश्वपा+औ' में नादिचि (१२७) से भी पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो सकता है, तथा जस् में उस के हो जाने से भी कोई अनिष्ट नहीं होता, तो पुनः दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र के बनाने की क्या आवश्यकता है? उत्तर—यद्यपि इस सूत्र का फल यहां कुछ प्रतीत नहीं होता, तथापि 'पप्यौ, पप्यः' आदि में इस का फल स्पष्ट होगा। यहां न्यायवशात् इस लिया गया है। द्वितीया में—विश्वपा+अम्। पूर्वसवर्णदीर्घ के बाधक अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो—'विश्वपाम्' प्रयोग बना। द्विवचन में 'विश्वपौ' प्रथमा के समान बनता है। बहुवचन में—विश्वपा+शस्=विश्वपा+अस्। यहां पूर्वसवर्णदीर्घ को बाध कर अग्रिम कार्य होता है— [लघु०] संज्ञासूत्रम्—(१६३) सुँडनपुंसकस्य ।१।१।४२॥ स्वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्थानसंज्ञानि स्युरक्लीबस्य ॥ अर्थ—नपुंसकलिङ्ग से भिन्न अन्य लिङ्ग के सुँ आदि पञ्च प्रत्यय सर्वनाम- स्थान संज्ञक होते हैं। व्याख्या—सुँट् ।१।१। अनपुंसकस्य ।६।१। सर्वनामस्थानम् ।१।१। (शि सर्व- नामस्थानम् से)। समासः—न नपुंसकस्य=अनपुंसकस्य, नञ्समासः। पर्युदासप्रति- षेधः। अर्थ—(अनपुंसकस्य) नपुंसक से भिन्न अन्य लिङ्ग का (सुँट्) सुँट् प्रत्याहार (सर्वनामस्थानम्) सर्वनामस्थानसंज्ञक होता है। स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र के सुँ से लेकर औट् के टकार तक सुँट् प्रत्याहार बनता है। इस में 'सुँ, औ, जस्, अम्, औट्' इन पञ्च प्रत्ययों का ग्रहण होता है। ये पञ्च प्रत्यय पुंल्लिङ्ग या स्त्रीलिङ्ग से परे हों तो इन की सर्वनामस्थानसंज्ञा होती है। अब अग्रिमसूत्र में इस संज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१६४) स्वादिष्वसर्वनामस्थाने ।१।४।१७॥ कप्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं पदं स्यात् ॥ अर्थः—सर्वनामस्थानसंज्ञक प्रत्ययों को छोड़ कर 'सुँ' से लेकर 'कप्' पर्यन्त प्रत्ययों के परे होने पर पूर्वशब्दस्वरूप पदसंज्ञक हो।