भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१७ व्याख्या—स्वादिषु ।७।३। असर्वनामस्थाने ।७।१। पदम् ।१।१। (सुप्तिङन्तं पदम् से)। समासः—सुंप्रत्यय आदिर्येषान्ते स्वादयः, तेषु = स्वादिषु, बहुव्रीहिसमासः। न सर्वनामस्थाने = असर्वनामस्थाने, नञ्समासः। 'असर्वनामस्थाने' यह 'स्वादिषु' का विशेषण है। इस मे एकवचन आर्ष समझना चाहिये। 'स्वादिषु' यह सप्तम्यन्त है। अतः तस्मिन्निति० (१६) इस परिभाषा से पूर्वशब्दसमुदाय ही पदसञ्ज्ञक होगा। अर्थः—(असर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान-भिन्न (स्वादिषु) सुँ आदि प्रत्ययो के परे होने पर पूर्वशब्दसमुदाय (पदम्) पदसञ्ज्ञक होता है। चतुर्थ अध्याय के प्रथम प्रत्यय 'सुँ' से लेकर पञ्चवें अध्याय के अन्तिम प्रत्यय 'कप्' तक सब प्रत्यय 'स्वादि' कहलाते हैं। इस प्रकार चतुर्थ और पञ्चम अध्याय के सब प्रत्यय स्वादियो मे सगृहीत हो जाते हैं। इन स्वादि प्रत्ययो मे 'सुँ, औ, जस्, अम्, औट्' इन प्रत्ययो की सर्वनामस्थान सञ्ज्ञा है। इन सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक पञ्च प्रत्ययों से भिन्न अन्य स्वादि प्रत्यय यदि परे हो तो उन से पूर्वशब्दसमुदाय पदसञ्ज्ञक होता है। 'विश्वपा+अस्' (शस्) यहां शस् प्रत्यय सर्वनामस्थान से भिन्न स्वादि है; अतः इस के परे होने से पूर्वशब्दसमुदाय 'विश्वपा' की पदसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१६५) यचि भम् ।१।४।१८॥ यकारादिष्वजादिषु च कप्रत्ययावधिषु स्वादिष्वसर्वनामस्थानेषु पूर्वं भसञ्ज्ञं स्यात्॥ अर्थः—सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक प्रत्ययो को छोड़ कर 'सुँ' से लेकर 'कप्' प्रत्यय पर्यन्त यकारादि और अजादि प्रत्यय परे होने पर पूर्वशब्दसमुदाय भसञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—असर्वनामस्थाने ।७।१। स्वादिषु ।७।३। (स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से)। यचि ।७।१। भम् ।१।१। समासः—य् च अच् च = यच्, तस्मिन् = यचि, समाहार- द्वन्द्वः। समासान्तविधिरनित्यः इति द्वन्द्वाच्चुदषहान्तात्समाहारे (६८६) इति टच् न। यस्मिन् विधिः० परिभाषा से तदादिविधि हो कर 'यकारादिषु अजादिषु' ऐसा बन जायेगा। यहा भी पूर्ववत् तस्मिन्निति० (१६) परिभाषा से पूर्वशब्दसमुदाय की ही भसञ्ज्ञा होगी। अर्थ.—(असर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान से भिन्न (यचि) यकारादि या अजादि (स्वादिषु) स्वादि प्रत्यय परे हो तो (भम्) पूर्वशब्दसमुदाय भसञ्ज्ञक होता है। 'विश्वपा+अस्' (शस्) यहां 'अस्' प्रत्यय अजादि है अतः इस के परे होने से पूर्वशब्दसमुदाय 'विश्वपा' की भसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। अब यहां यह प्रश्न उठता है कि क्या जैसे लोक मे एक व्यक्ति की दो सञ्ज्ञाएं देखी जाती हैं वैसे यहां भी शस् आदियो के परे होने पर पूर्व की पद और भ दोनो सञ्ज्ञाएं की जाये या कोई एक ? यदि एक की जाये तो कौन सी एक ? इस पर अग्रिमसूत्र निर्णय करता है—