भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

२१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] अधिकार सूत्रम्—(१६६) आकडारादेका संज्ञा ।१।४।१॥ इत ऊर्ध्वं 'कडारा कर्मधारये' (२।२।३८) इत्यतः प्राग् एकस्यैकैव संज्ञा ज्ञेया, या परानवकाशा च ॥ अर्थ — इस सूत्र से लेकर 'कडारा कर्मधारये' (२।२।३८) सूत्र तक एक की एक ही संज्ञा हो । व्याख्या—यह प्रथमाध्याय के चतुर्थ पाद का पहला सूत्र है। यह अधिकार- सूत्र है। इसका अधिकार दूसरे अध्याय के दूसरे पाद के अन्तिमसूत्र 'कडारा कर्मधारये' (२।२।३८) तक जाता है। इस प्रकार इस के अधिकार में तीन पाद होते हैं। आ इत्यव्ययपदम्। कडारात् ।५।१। एका ।१।१। संज्ञा ।१।१। अर्थ — (कडारात्) कडाराः कर्मधारये सूत्र (आ) तक (एका) एक (संज्ञा) संज्ञा हो। 'कडारा कर्मधारये' सूत्र तक यदि एक ही संज्ञा करेंगे तो शेष सब संज्ञाएं जो मुनि ने उस सूत्र तक की हैं व्यर्थ हो जायेंगी, अतः यहां 'एक की एक ही संज्ञा हो दो न हों' ऐसा मुनि का अभिप्राय समझना चाहिये । अब पुनः संशय उठता है कि इस सूत्र से 'एक की एक संज्ञा हो दो न हों' यह तो निर्णीत हो गया, परन्तु कौन सी संज्ञा हो ? यह सन्देह वैसे का वैसा बना रहता है। इसका ग्रन्थकार समाधान करते हैं कि— या परानवकाशा च । अर्थात् जो संज्ञा पर या निरवकाश हो—वह हो। यदि दोनों संज्ञाएं सावकाश (भिन्न भिन्न स्थान पर प्रवृत्त हो चुकी) हों तो पर संज्ञा और यदि एक सावकाश और एक अनवकाश (जिसे प्रवृत्त होने के लिये कोई स्थान नहीं मिला) हो तो वह अनवकाश संज्ञा ही हो । ग्रन्थकार का ऐसा लिखना युक्त ही है। जहां दोनों संज्ञाएं सावकाश होंगी वहां विप्रतिषेध होने से 'विप्रतिषेधे परं कार्यम्' (११३) द्वारा पर संज्ञा ही होनी चाहिये। जहां एक सावकाश और एक निरवकाश होगी वहां निरवकाश संज्ञा को ही स्थान देना युक्तिगत है¹। क्योंकि यदि सावकाश संज्ञा वहां पर भी अनवकाश- संज्ञा को न होने दे तो उस अनवकाश संज्ञा का करना ही व्यर्थ हो जाये । अतः अनवकाश और सावकाश दोनों के एक साथ एक ही स्थान पर प्राप्त होने पर अन- वकाश संज्ञा ही होगी²। प्रकृत में पद संज्ञा को 'भ्याम्' आदि में अवकाश=स्थान प्राप्त है, क्योंकि वहां अजादि और यकारादि के न होने से भ-संज्ञा प्राप्त नहीं हो सकती । परन्तु १ लोक में भी ऐसा देखा जाता है। यथा—यदि भूखे और तृप्त के मध्य अन्नदान का प्रश्न उपस्थित हो तो भूखे को ही अन्न देना उचित समझा जाता है, क्योंकि वही अन्न का उचित अधिकारी होता है । २ दो अनवकाश संज्ञाओं की किसी एक रूप में युगपत् प्राप्ति इस प्रकरण में कहीं नहीं देखी जाती, अतः उस की चर्चा नहीं की गई है ।