भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २१६ भ सञ्ज्ञा अनवकाश है अर्थात् इसे कोई स्थान नहीं मिलता; क्योंकि जब यह यकारा- दियों और अजादियों में प्रवृत्त होने लगती है तब पद सञ्ज्ञा भी उपस्थित हो जाती है। अतः यहां पूर्वविप्रतिषेधनियमानुसार अनवकाशसञ्ज्ञा का होना ही युक्त है। तो इस प्रकार यह निर्णय हुआ कि—यकारादि और अजादि प्रत्यय परे होने पर भ सञ्ज्ञा तथा शेष हलादि प्रत्ययों के परे होने पर पद सञ्ज्ञा हो। हम बालकों के ज्ञान के लिये इसे और अधिक स्पष्ट करते हैं— (१) 'सुँ, औ, जस्, अम्, औट्' इन पञ्चों के परे रहते न तो पदसञ्ज्ञा होती है और न भसञ्ज्ञा। परन्तु ध्यान रहे कि पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग तक ही यह नियम सीमित है नपुंसकलिङ्ग में नहीं; क्योंकि इन की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा इन दो ही लिङ्गों में की गई है। नपुंसक में सुँ परे रहते 'पद' तथा औ, अम् परे रहते 'भ' सञ्ज्ञा होती है। जस् और शस् के स्थान पर नपुंसक में 'शि' आदेश हो जाया करता है; उस की शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होती है, अतः उस के परे रहते न तो पदसञ्ज्ञा होती है और न भसञ्ज्ञा। (२) शस्, टा, ङे, ङसिँ, ङस्, ओस् और ङि—इन के परे रहने पर पूर्व की भसञ्ज्ञा होती है; क्योंकि ये सर्वनामस्थान से भिन्न होते हुए अजादि स्वादि हैं। ध्यान रहे कि अनुबन्धों का लोप कर देने से शस् आदि प्रत्यय अजादि हो जाते हैं। (३) यदि आम् विशुद्ध अर्थात् नुट् आगम से रहित हो तो उस से पूर्व भ सञ्ज्ञा होती है। नुट् आगम होने पर अजादि न होने से पदसञ्ज्ञा ही हो जाती है। यथा 'षण्णाम्' में पदसञ्ज्ञा हुई है। (४) उपर्युक्त सुँप् प्रत्ययों के अतिरिक्त अन्य सुँप् प्रत्ययों (भ्याम्, भिस्, भ्यस्, नुट् सहित आम्, सुप्) के परे रहते पूर्व की पदसञ्ज्ञा होती है। यहां यह सुँबन्तप्रक्रियोपयोगी विवरण ही लिखा है। विद्यार्थियों को चतुर्थ तथा पञ्चम अध्यायों में स्थित अन्य प्रत्ययों के विषय में भी पूर्वोक्त आधार से व्यवस्था समझ लेनी चाहिये। पद और भसञ्ज्ञा का विषय व्याकरण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है अतः छात्रों को इस का पुनः पुनः अभ्यास करना आवश्यक है। तो इस प्रकार 'विश्वपा + अस्' यहां भसञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१६७) आतो धातोः ।६।४।१४०॥ आकारान्तो यो धातुस्तदन्तस्य भस्याङ्गस्य लोपः। अलोऽन्त्यस्य (२१) —विश्वपः। विश्वपा। विश्वपाभ्याम् इत्यादि॥ अर्थः—आकारान्त धातु जिस के अन्त में हो ऐसे भसंज्ञक अङ्ग का लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अङ्ग के अन्त्य अल्—आकार का ही लोप होगा। व्याख्या-आतः ।६।१। धातोः ।६।१। भस्य ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (ये दोनों अधिकृत हैं)। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। 'आतः' यह 'धातोः' का तथा 'धातोः' यह 'भस्य' का विशेषण है, अतः विशेषणों से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः- (आतः)