भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 235, कुल 633 में से

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पृष्ठ 235

२२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् आकारान्त (धातो ) धातु जिस के अन्त में हो ऐसे (भस्य) भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग का (लोप) लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा से अङ्ग के अन्त्य अल्—आकार का ही लोप होगा। 'विश्वपा + अस्' यहां आकारान्त धातु 'पा' है, तदन्त भसञ्ज्ञक अङ्ग 'विश्वपा' है। इस के अन्त्य अल् आकार का लोप कर—विश्वप् + अस् = विश्वपस्। अब सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने से 'विश्वपः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'विश्वपा + आ' (टा) यहां भी अन्त्य आकार का लोप हो कर विश्वप् + आ = 'विश्वपा' रूप सिद्ध होता है। इसी प्रकार अजादि विभक्तियों में आकार का लोप होगा, हलादि विभक्तियों में कोई विशेष कार्य नहीं होगा। विश्वपाशब्द की समग्र रूपमाला यथा— प्र० विश्वपा विश्वपौ विश्वपाः प० विश्वपः * विश्वपाभ्याम् विश्वपाभ्यः द्वि० विश्वपाम् ,, विश्वपः * ष० ,, * विश्वपोः * विश्वपाम्* तृ० विश्वपा* विश्वपाभ्याम् विश्वपाभिः स० विश्वपि* ,, * विश्वपासु च० विश्वपे* ,, विश्वपाभ्यः स० हे विश्वपा ! हे विश्वपौ ! हे विश्वपा !

  • इन स्थानों पर भसञ्ज्ञक आकार का लोप होता है। [लघु०] एव शङ्खध्मादयः ॥ व्याख्या—शङ्खं धमतीति—शङ्खध्मा, शङ्ख बजाने वाला। 'शङ्खध्मा' आदि शब्दों के रूप भी 'विश्वपा' के समान होते हैं। आदि से—सोमपा, मधुपा, कीलालपा (जल पीने वाला) आदि शब्दों का ग्रहण जानना चाहिये। [लघु०] धातोः किम् ? हाहान्। हाहाः। हाहा . २। हाहाै २। हाहाम्। हाहाै ॥ व्याख्या—धातोः धातो (१६७) में—धातु के आकार का लोप होता है— यह क्यों कहा गया है ? इसलिये कि 'हाहान्' आदि में 'हाहा' शब्द के आकार का लोप न हो जाये। तथाहि—'हाहा' शब्द अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है, इस का अर्थ है —'गन्धर्व विशेष'। हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौकसाम् इत्यमरः। यह शब्द किसी धातु से निष्पन्न नहीं होता अतः शसादियों में भसंज्ञा होने पर भी इस के आकार का लोप नहीं होता। 'हाहा' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० हाहा हाहाै हाहाः प० हाहाः † हाहाभ्याम् हाहाभ्यः द्वि० हाहाम् ,, हाहान्* ष० ,, † हाहाै ‡ हाहानाम्‡ तृ० हाहा† हाहाभ्याम् हाहाभिः स० हाहे@ ,, ‡ हाहासु च० हाहाै‡ ,, हाहाभ्यः स० हे हाहा ! हे हाहाै ! हे हाहा ! सर्वनामस्थानप्रत्ययों में विश्वपावत् प्रक्रिया होती है।
  • पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर शस् के सकार को नकार हो जाता है। † इन सब स्थानों पर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ प्रवृत्त होता है। ‡ इन स्थानों पर वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो जाता है। @ यहां आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश हो जाता है।
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