लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२१
अभ्यास (२८)
(१) निम्नलिखित वचनों का सोदाहरण विवेचन करें— १. या पराऽनवकाशा च। २. पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च। ३. निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति। ४. एकदेशविकृतमनन्यवत्। ५. सन्निपातलक्षणो विधिरनिमित्तं तद्विघातस्य। (२) (क) 'निर्जरै:' मे जरस् आदेश क्यों नहीं होता ? (ख) 'हाहा:' प्रयोग किस किस विभक्ति मे बनता है ? (ग) सर्वनाम और सर्वनामस्थान संज्ञाओ में भेद बताएं। (घ) 'हाहान्' में आकारलोप क्यों नहीं हुआ ? (ङ) सुँपों में अजादि प्रत्यय कितने और कौन कौन मे हैं ? (३) निम्नलिखित अधिकारों की अवधि बताएं— १. पदाधिकार। २. अङ्गाधिकार। ३. एकसंज्ञाधिकार। ४. प्रत्ययाधिकार। ५. एकादेशाधिकार। (४) सुँप् प्रत्ययों के परे रहते कहां भसंज्ञा और कहां पदसंज्ञा होती है ? (५) दीर्घाज्जसि च के विना भी क्या 'विश्वपौ' आदि प्रयोग सिद्ध हो सकते हैं ? यदि हां ! तो सूत्र रचने की क्या आवश्यकता है ? (६) निर्जर, हाहा और सोमपा शब्दों की रूपमाला लिखें। (७) 'विश्वपौः, निर्जरसम्, हाही:' प्रयोगों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें। [यहां आकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है]
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[लघु०] हरिः। हरीं॥ व्याख्या—अथ ह्रस्व इकारान्त शब्दों की सुबन्तप्रक्रिया का विवेचन प्रारम्भ करते हुए सर्वप्रथम 'हरि' शब्द की प्रक्रिया दर्शाते हैं। कोषों में 'हरि' शब्द के अनेक अर्थ लिखे हैं। यथा— हरिर्विष्णावहाविन्द्रे भेके सिंहे हये रवौ। चन्द्रे कोले प्लवङ्गे च यमे वाते च कीर्तितः ॥ हरि शब्द के बारह अर्थ प्रसिद्ध हैं—(१) भगवान् विष्णु, (२) सांप, (३) इन्द्र, (४) मेंढक, (५) शेर, (६) घोडा, (७) सूर्य, (८) चन्द्र, (६) सूअर, (१०) वानर, (११) यमराज, (१२) वायु। प्रथमा के एकवचन में—हरि+सुँ=हरि+स्। मकार की इँत्त्व और रेफ को विसर्ग करने मे 'हरिः' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के द्विवचन में 'हरि+औ' इस अवस्था में प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ ईकार हो कर 'हरी' रूप बनता है। प्रथमा के बहुवचन में—हरि + अस् (जस्)। इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है—