भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२३ [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७०) शेषो घ्यसखि ।१।४।७॥ शेष इति स्पष्टार्थम् । अनदीसञ्ज्ञौ ह्रस्वौ याविदुतौ तदन्तं सखिवर्जं घिसञ्ज्ञम् ॥ अर्थः—जिन की नदीसंज्ञा नहीं ऐसे जो ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार, तदन्त शब्दों की घिसंज्ञा होती है परन्तु ‘सखि’ शब्द की नहीं होती । व्याख्या—शेषः ।१।१। ह्रस्वः ।१।१। (ङिति ह्रस्वश्च से)। यू ।१।२। (यूस्त्र्याख्यौ नदी से) । घि ।१।१। असखि ।१।१। समासः—इच्च उश्च यू, इतरेतरद्वन्द्वः । न सखि = असखि, नञ्तत्पुरुष । इस सूत्र से पूर्व विशेष विशेष अवस्थाओं में ह्रस्व की नदी संज्ञा की गई है, अतः जिस ह्रस्व की नदी संज्ञा नहीं की गई वह ह्रस्व यहां ‘शेषः’ पद से गृहीत किया गया है । ‘शेषः ह्रस्वः’ ये ‘यू’ के प्रत्येक के साथ अन्वित होते हैं । अर्थात् ‘शेष ह्रस्व इकार, शेष ह्रस्व उकार’ यह इन का अर्थ है । शब्दस्वरूपम् इस विशेष्य का ऊपर से अध्याहार कर लिया जाता है । ‘शेषः ह्रस्वः यू’ ये इस के विशे- षण बना दिये जाते हैं । तब विशेषण से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ—(शेषः) जिन की नदीसञ्ज्ञा नहीं ऐसे (ह्रस्वः) ह्रस्व (यू) इकार उकार जिन के अन्त में हैं वे शब्दस्वरूप (घि) घिसञ्ज्ञक होते हैं परन्तु (असखि) सखि शब्द नहीं होता । कहां कहां नदी सञ्ज्ञा नहीं होती ? (१) पुंल्लिङ्ग तथा नपुंसक में ह्रस्व इकारान्त तथा ह्रस्व उकारान्त शब्द नदीसञ्ज्ञक नहीं होते । पुं० में यथा—हरि, अरि, भानु, गुरु आदि । नपुं० में यथा— वारि, मधु आदि । (२) स्त्रीलिङ्ग में ङित् विभक्तियों के परे रहते जिस पक्ष में ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा नदीसञ्ज्ञा नहीं होती । इन दो स्थानों के अतिरिक्त अन्य सब स्थानों पर ह्रस्व इकारान्त उकारान्त शब्दों की नदीसञ्ज्ञा हो जाती है अतः उपर्युक्त दो स्थान ही इस सूत्र के विषय हो सकते हैं । सूत्र में ‘शेषः’ ग्रहण का यह प्रयोजन है कि नदी सञ्ज्ञा करने से जो शेष ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द रहें उन की ही घिसञ्ज्ञा हो अन्यों की न हो । परन्तु यह प्रयोजन ‘शेषः’ ग्रहण के बिना भी सिद्ध हो सकता है । क्योंकि घिसञ्ज्ञा सामान्य होने से उत्सर्ग और ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा विहित नदीसञ्ज्ञा विशेष होने से अपवाद है । अपवाद के विषय को छोड़कर ही उत्सर्ग प्रवृत्त हुआ करते हैं । इस से प्रथम नदीसञ्ज्ञा हो कर शेष अवशिष्टों की ही घिसञ्ज्ञा सुतरां प्राप्त हो जायेगी; इस के लिये ‘शेषः’ पद के ग्रहण की कोई आवश्यकता नहीं । तथापि यहां मुनि ने बात को बिलकुल स्पष्ट करने के लिये ‘शेषः’ का ग्रहण कर दिया है । अर्थात् मुनि ने यह समझा कि कदाचित् मन्दमति लोग इस बात को न समझ सकें अतः ‘शेष.’ पद लिख कर स्पष्ट कर देना उचित है—शेष इति स्पष्टार्थम् ।