भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

२२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'हरि' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती अतः प्रकृतसूत्र से इस की घि-सञ्ज्ञा हुई। अब घिसञ्ज्ञा का फल दर्शाते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१७१) आङो नाऽस्त्रियाम् ।७।३।१२०॥ घेः परस्याङो ना स्यादस्त्रियाम् । आङ् इति टासञ्ज्ञा । हरिणा । हरिभ्याम् । हरिभिः ॥ अर्थ :-घिसञ्ज्ञक से परे आङ् को ना आदेश हो, परन्तु स्त्रीलिङ्ग में नहीं। 'आङ्' यह टा की (प्राचीन) सञ्ज्ञा है। व्याख्या-घेः ।६।१। (अच्च घेः से) । आङः ।६।१। ना ।१।१। (विभक्तिलोप आर्ष) । अस्त्रियाम् ।७।१। समासः-न स्त्रियाम् = अस्त्रियाम्, नञ्सुप्सुप् । अर्थः - (अस्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग से भिन्न अन्य लिङ्ग में (घेः) घिसञ्ज्ञा से परे (आङः) आङ् के स्थान पर (ना) ना आदेश होता है। पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य टा को 'आङ्' कहते चले आ रहे थे। पाणिनि ने भी यहां उसी प्राचीन सञ्ज्ञा का व्यवहार किया है। 'हरि + आ' यहां घिसञ्ज्ञक है 'हरि' । इस से परे टा को ना हो अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र से नकार को णकार करने पर 'हरिणा' प्रयोग सिद्ध होता है। द्विवचन में 'हरिभ्याम्' और बहुवचन में 'हरिभिः' सिद्ध होते हैं। चतुर्थी के एकवचन में-- हरि + ए (ङे) । यहां पूर्वोक्त घिसञ्ज्ञा होकर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१७२) घेर्ङिति ।७।३।१११॥ घिसञ्ज्ञकस्य ङिति सुपि गुणः । हरये ॥ अर्थ :-ङित् सुँप् परे रहते घिसञ्ज्ञक को गुण हो। व्याख्या-घेः ।६।१। गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से) । ङिति ।७।१। सुँपि ।७।१। (सुँपि च से)। अर्थः- (ङिति) ङित् (सुँपि) सुँप् परे होने पर (घेः) घिसञ्ज्ञक के स्थान पर (गुणः) गुण आदेश होता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से गुण घिसञ्ज्ञ अङ्ग के अन्त्य वर्ण को ही होगा। 'हरि + ए' यहां घिसञ्ज्ञक 'हरि' है। इस से परे ङित् सुँप् 'ए' है। अतः घि के अन्त्य वर्ण इकार के स्थान पर एकार गुण होकर- 'हरे + ए' बना। अब इस स्थिति में एचोऽयवायावः (२२) से रेफोत्तर एकार को अय् होकर 'हरये' प्रयोग सिद्ध हुआ। द्विवचन में 'हरिभ्याम्' और बहुवचन में 'हरिभ्यः' रूप बनते हैं। पञ्चमी के एकवचन में 'हरि + अस्' (ङसिँ) । यहां घिसञ्ज्ञा होकर घेर्ङिति (१७२) सूत्र से इकार को एकार गुण हुआ। तब 'हरे + अस्' इस स्थिति में पदान्त न होने से एङः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप नहीं हो सकता। एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश प्राप्त होता है। इस पर इस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है-