भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 240

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२५ [लघु०] विधि-सूत्रम्- (१७३) ङसिँ-ङसोश्च ।६।१।१०६॥ एङो ङसिँ-ङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः । हरेः २ । हर्योः । हरीणाम् ॥ अर्थः-एङ् (ए, ओ) से ङसिँ या ङस् का अकार परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो । व्याख्या - एङः ।५।१। (एङः पदान्तादति मे)। ङसिँ-ङसोः ।६।२। च इत्यव्यय- पदम् । अति ।७।१। (एङः पदान्तादति मे) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। पूर्वः ।१।१। (अमि पूर्वः से)। अर्थः- (एङः) एङ् प्रत्या- हार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस् का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वः) पूर्व वर्ण आदेश होता है । 'हरे + अस्' यहां एकार एङ् से ङसिँ का अकार परे है, अतः पूर्व + पर के स्थान पर एकार पूर्वरूप हो कर सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'हरेः' प्रयोग सिद्ध हुआ । ओकार का उदाहरण 'भानोः' आगे आयेगा । षष्ठी के एकवचन में पूर्ववत् 'हरेः' रूप बनता है । द्विवचन में 'हरि + ओस्' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर मकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने पर 'हर्योः' रूप बनता है । बहुवचन में 'हरि + आम्' । यहां ह्रस्वान्त अङ्ग 'हरि' है अतः ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से आम् को नुट् का आगम हो अनुबन्धलोप और नामि (१८४) से दीर्घ करने पर 'हरी + नाम्' । अब अट्कुप्वाङ्० (१३८) सूत्र से नकार को णकार करने से - 'हरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में-हरि + इ (ङि) । यहां घिसञ्ज्ञा हो कर घेर्ङिति (१७२) से गुण प्राप्त होता है । इस पर इस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१७४) अच घेः ।७।३।११९॥ इदुद्भ्यामुत्तरस्य ङेगौत्, घेरच्च । हरौ । हर्योः । हरिषु । एवं कवयादयः ॥ अर्थः-ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे ङि को औत् और घि को अत् आदेश हो । व्याख्या - इदुद्भ्याम् ।५।२। (इदुद्भ्याम् से)। ङेः ।६।१। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः मे)। औत् ।१।१। (औत् से)। घेः ।६।१। अत् ।१।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थः- (इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (औत्) औ आदेश हो (च) तथा (घेः) घिसञ्ज्ञक के स्थान पर (अत्) ह्रस्व अकार आदेश हो । अलोन्त्यपरिभाषा से यह अत् आदेश घि के अन्त्य अल् को ही होगा । 'हरि + इ' यहां इस सूत्र से ङि (इ) को 'औ' और घिसञ्ज्ञक 'हरि' शब्द के इकार के स्थान पर अकार आदेश हुआ । तब 'हर् + औ' इस दशा में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर 'हरौ' रूप सिद्ध हुआ । ल० प्र० (१५)