लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७६) अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा ।१।१।६४॥ अन्त्यादल पूर्वो वर्ण उपधा-सञ्ज्ञ ॥ अर्थ —अन्त्य अल् से पूर्व वर्ण उपधासञ्ज्ञक हो। व्याख्या—अन्त्यात् ।५।१। अल् ।१।१। पूर्व ।१।१। उपधा ।१।१। अर्थ— (अन्त्यात्) अन्त्य (अल्) अल् से (पूर्व) पूर्व वर्ण (उपधा) उपधासञ्ज्ञक हो। अल् प्रत्याहार में सब वर्ण आ जाते हैं, अतः अल् और वर्ण पर्यायवाची हैं। समुदाय के अन्तिम वर्ण से पूर्व वर्ण की उपधा सञ्ज्ञा होती है। यथा—पठ्, पच्, पत्, अत् इत्यादि में अन्त्य वर्ण से पूर्व अकार उपधासञ्ज्ञक है। बुध्, युध्, रुध् इत्यादि में अन्तिम वर्ण से पूर्व उकार उपधासञ्ज्ञक है। वृत्, वृध् इत्यादि में अन्त्य वर्ण से पूर्व ऋकार उपधासञ्ज्ञक है। 'सखन् + स्' यहां अङ्ग में अन्त्य अल् नकार है इससे पूर्व वर्ण खकारोत्तर अकार है, इस की उपधासञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१७७) सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ ।६।४।८॥ नान्तस्योपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने ॥ अर्थ —सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे हो तो नकारान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—न ।६।१। (नोपधाया मे। यहां सुपां सुलुक० सूत्र द्वारा षष्ठी का लुक हुआ है। अङ्गस्य का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो 'नान्तस्य' बन जाता है)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। उपधाया ।६।१। (नोपधाया मे)। दीर्घ ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण मे)। असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। च इत्य- व्ययपदम् । समास—न सम्बुद्धौ = असम्बुद्धौ नञ्तत्पुरुष । अर्थ—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (न) नान्त (अङ्गस्य) अङ्ग की (उपधाया) उपधा के स्थान पर (दीर्घ) दीर्घ आदेश होता है। सर्वनामस्थान- सञ्ज्ञा का निरूपण पीछे (१६३) सूत्र पर कर चुके हैं। 'मखन् + स्' यहां नान्त अङ्ग 'मखन्' है, इस से परे सर्वनामस्थान है 'स्' । यह सम्बुद्धिभिन्न भी है। अतः प्रकृतसूत्र से नान्त अङ्ग की उपधा अकार को दीर्घ हो—'मखान् + स्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१७८) अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ।१।२।४१॥ एकाल् प्रत्ययो यः, सोऽपृक्तसञ्ज्ञ स्यात् ॥ अर्थ —एक अल् रूप प्रत्यय अपृक्तसञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—अपृक्त ।१।१। एकाल् ।१।१। प्रत्यय ।१।१। समास—एकश्चासा- वल्=एकाल्, कर्मधारयसमास । एकशब्दोऽत्र असहायवाची। अर्थ—(एकाल्) एक अल् रूप (प्रत्यय) प्रत्यय (अपृक्त) अपृक्तसञ्ज्ञक हो। भाव—जो प्रत्यय केवल एक अल् रूप हो या एक अल् रूप हो गया हो, उस की अपृक्तसञ्ज्ञा होती है।