लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २२६ 'सखान्+स्' यहां 'स्' यह एक अल् रूप प्रत्यय है, अतः प्रकृत सूत्र से इस की अपृक्तसञ्ज्ञा हुई। अब अग्रिमसूत्र से इस का लोप करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१७६) हल्ड्·याब्भ्यो दीर्घात् सुँतिस्यपृक्तं हल् । ६। १। ६६ ॥ हलन्तात् परम्, दीर्घौ यौ ङ्यापौ तदन्ताच्च परम्, 'सुँ-ति-सि' इत्ये- तद् अपृक्तं हल् लुप्यते ॥ अर्थः—हलन्त अङ्ग से अथवा दीर्घ 'ङी' या 'आप्' जिस के अन्त में हो उस अङ्ग से परे 'सुँ, ति, सि' प्रत्ययों के अपृक्त हल् का लोप होता है। व्याख्या—हल्ड्·याब्भ्यः ।५।३। दीर्घात् ।५।१। सुँ-ति-सि ।१।१। अपृक्तम् ।१।१। हल् ।१।१। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से) । समासः—हल् च ङी च आप् च = हल्ड्·यापः, तेभ्यः=हल्ड्·याब्भ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । यहां 'शब्दस्वरूपम्' अथवा 'अङ्गम्' का अध्याहार कर उस के ये हलादि विशेषण बना दिये जाते हैं। इस से तदन्तविधि हो कर 'हलन्तात् ङ्यन्ताद् आवन्तात्' ऐसा बन जाता है। सूत्रस्थ 'दीर्घात्' पद 'ङी' और 'आप्' के साथ ही सम्बद्ध हो सकता है, 'हल्' के साथ नहीं; क्योंकि हल् दीर्घ नहीं हुआ करता। तो अब 'हलन्तात् दीर्घङ्यन्तात् दीर्घावन्तात्' ऐसा हो जायेगा। 'हल्ड्·याब्भ्यः' में पञ्चमी विभक्ति दिग्योग में हुई है, अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१) की सहायता से 'परम्' का अध्याहार कर लेंगे। सुँश्च तिश्च सिश्च = सुँ-ति-सि, समाहारद्वन्द्वः। 'सुँतिसि अपृक्तं हल्' इस का अर्थ है —'सुँ, ति, सि जो अपृक्त हल्'। यहां सन्देह होता है कि अपृक्तसञ्ज्ञा तो एक अल् रूप प्रत्यय की ही की जाती है पुनः 'सुँ, ति, सि' ये कैसे हल् और अपृक्त बन सकते हैं। इस का समाधान यह है कि जब 'सुँ, ति, सि' के उकार तथा इकार का लोप हो जाता है तब अवशिष्ट 'स्, त्, स्' को ही 'सुँ, ति, सि' समझ लेना चाहिये; क्योंकि वे उन से ही शेष बचे हैं। इस प्रकार वे अपृक्त भी होंगे और हल् भी होंगे। कई लोग —'सुँतिसेरपृक्तम् = सुँतिस्यपृक्तम्' ऐसा षष्ठीतत्पुरुषसमास मान कर 'सुँ, ति सि के अपृक्त हल् का लोप हो' इस प्रकार अर्थ किया करते हैं। यह अर्थ भी शुद्ध तथा स्पष्ट है। 'लोपः' यहां कर्म में 'घञ्' प्रत्यय हुआ है—लुप्यत इति लोपः। जो लुप्त किया जाये उसे 'लोप' कहते हैं। यह 'हल्' पद का विशेषण है। अर्थः—(हल्ड्·याब्भ्यः दीर्घात्) हलन्त से परे तथा दीर्घ ङी और आप् जिस के अन्त में है उस से परे (सुँतिसि) सुँ, ति, सि ये (अपृक्तम्) अपृक्त- सञ्ज्ञक (हल्) हल् (लोपः) लुप्त हो जाते हैं। उदाहरण यथा— हलन्त से परे—'राजन्+स्' (सुँ) यहां नकार हल् से परे अपृक्त सुं का लोप हो जाता है। 'अहन्+त्' [इतश्च (४२४) इति तिप इकारलोपः] यहां नकार हल् से परे अपृक्त ति का लोप हो जाता है। 'अहन्+स्' [इतश्च (४२४) इति सिप इकारलोपः] यहां हल् से परे अपृक्त सि का लोप हो जाता है। दीर्घ ङी¹ से परे—'कुमारी+स्' (सुँ) यहां दीर्घ ङी (ङीप्) से परे अपृक्त १. भेदक अनुबन्धों से रहित होने के कारण 'ङी' से ङीप्, ङीष्, ङीन् का तथा 'आप्'