भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 633 में से

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पृष्ठ 245

२३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् सुँ का लोप हो जाता है। दीर्घ ङी से परे ति और सि का आना असम्भव है। दीर्घ आप् से परे—'बाला + स्' (सुँ) यहां दीर्घ आप् (टाप्) से परे अपृक्त सुँ का लोप हो जाता है। दीर्घ आप् से परे भी ति और सि नहीं आया करते। यद्यपि ङी और आप् स्वतः ही दीर्घ हुआ करते हैं, इन के लिये पुनः दीर्घ का कथन व्यर्थ सा प्रतीत होता है, तथापि समास में इन के ह्रस्व हो जाने पर उन से परे लोप न हो जाये—इसलिये सूत्र में दीर्घ का ग्रहण किया है। यथा—निष्कौशाम्बि [ निष्क्रान्त कौशाम्ब्या ' इति विग्रह, निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या (वा० ५६) इति वार्त्तिकेन समास, गोस्त्रियो० (६५२) इत्युपसर्जनह्रस्व ]। यहां ङी के ह्रस्व हो जाने से उस से पर सुँ का लोप नहीं होता। एवम्—अतिखट्व, अतिमाल आदि में भी ह्रस्व आप् से परे सुँलोपाभाव समझ लेना चाहिये। शङ्का—हलन्त से परे हल् के लोप की कुछ आवश्यकता नहीं, क्योंकि वहां संयोगान्तस्य लोप (२०) से भी लोप सिद्ध हो सकता है। समाधान—संयोगान्तलोप करने से निम्नलिखित दोष प्राप्त होते हैं। तथाहि— (१) 'राजन् + स्' यहां संयोगान्तलोप करने पर उस के असिद्ध होने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा नकार का लोप न हो सकेगा। (२) 'उखास्रस् + स्, पर्णध्वस् + स्' यहां संयोगान्तलोप के अपवाद स्कोः संयोगाद्योरन्ते च (३०६) द्वारा संयोग के आदि प्रकृतित्सकार के लोप हो जाने पर अवशिष्ट प्रत्ययसकार के वस्वादि का अवयव न होने से वसुंस्त्रसुं० (२६२) सूत्र से दत्व न हो सकेगा। (३) भिदिर् विदारणे (रुधा०) धातु के लङ् लकार के मध्यमपुरुष के एक- वचन में सिप्, श्नम्, और दश्च (५७३) सूत्र से दकार को रुँ आदेश करने पर 'अभिनद् + स्' हुआ। अब यदि यहां संयोगान्तलोप करते हैं तो 'अभिनर् + अत्र' यहां अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) सूत्र से उत्व नहीं हो सकता, क्योंकि सकारलोप के असिद्ध होने से उस का व्यवधान पड़ता है। इस से 'अभिनोऽत्र' सिद्ध नहीं होता। (४) 'अबिभर् + त्' (इतश्चेति तिप इकारलोप)। यहां संयोगान्तलोप से कार्य सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि रात्सस्य (२०६) सूत्र द्वारा रेफ से परे सकार के लोप का ही नियम है। अतः हल् से परे भी हल् का लोप अवश्य विधान करना चाहिए—यह यहां सुतरां सिद्ध होता है। इस विषय पर एक प्राचीन श्लोक प्रसिद्ध है— संयोगान्तस्य लोपे हि नलोपादिर्न सिध्यति । रात्तु तेनैव लोपः स्याद् हलस्तस्माद्विधीयते ॥ (काशिका) 'सम्राज् + स्' यहां नकार हल् से परे अपृक्त सुँ का लोप हो कर 'सम्राज्' बना। अब अग्रिमसूत्र में नकार का लोप करते हैं— से टाप्, डाप्, चाप् का ग्रहण होता है। इन प्रत्ययों का विवेचन स्त्रीप्रत्यय- प्रकरण में देखें।

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