लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३१ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८०) न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य ।८।२।७॥ प्रातिपदिकसञ्ज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः स्यात् । सखा ॥ अर्थः—प्रातिपदिकसञ्ज्ञक जो पद उस के अन्त्य नकार का लोप हो जाता है। व्याख्या—प्रातिपदिक ।६।१। (यहां सुपां सुलुकू० सूत्र से षष्ठी का लुक् हुआ है)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्तस्य ।६।१। न ।६।१। (यहां भी षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अर्थः—(प्रातिपदिक) प्रातिपदिकसञ्ज्ञक (पदस्य) पद के अवयव (अन्तस्य) अन्त्य (नः) न् का (लोपः) लोप हो जाना है।१ यदि सूत्र में 'प्रातिपदिक' का ग्रहण न करके केवल 'पद' का ही ग्रहण करते तो 'अहन्' (हन् धातु के लँङ् में प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचनान्त प्रयोग) यहां भी नकार का लोप हो जाना; क्योंकि यहां पदसंज्ञा अक्षुण्ण है। इसी प्रकार यदि 'पद' का ग्रहण न करके केवल 'प्रातिपदिक' का ही ग्रहण करते तो 'राजन् + औ = राजानौ' यहां भी नकार का लोप हो जाता; क्योंकि प्रातिपदिकसंज्ञा तो यहां भी है। अतः दोनों का ग्रहण किया गया है। 'सखान्' यह प्रातिपदिकसंज्ञक पद है। यद्यपि प्रातिपदिकसंज्ञा 'सखि' शब्द की ही थी तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् ने यहां भी प्रातिपदिकसंज्ञा विद्यमान है। इसी प्रकार सुं—सुँप् का लोप होने पर भी आगे आने वाले प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र की सहायता से सुबन्त हो जाने के कारण सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा पदसंज्ञा हो जाती है। तो प्रकृत-सूत्र से इस के नकार का लोप हो—'सखा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'सखि + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(१८१) सख्युरसम्बुद्धौ ।७।१।९२॥ सख्युरङ्गात् परं सम्बुद्धिवर्जं सर्वनामस्थानं णिद्वत् स्यात् ॥ अर्थः—अङ्गसंज्ञक सखि शब्द से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान णिद्वत्— णित् के समान हो, अर्थात् णित् के परे होने पर जो कार्य होते हैं उस के परे होने पर भी वे कार्य हों। व्याख्या—अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है। यहां विभक्ति का विपरि- णाम हो जाता है)। सख्युः ५।१। असम्बुद्धौ ।७।१। (यह प्रथमान्त हो जायेगा)। सर्व- १. इस सूत्र में 'नस्य लोपः—नलोपः' ऐसा षष्ठीतत्पुरुषसमास नहीं समझना चाहिये। क्योंकि 'नस्य' का सम्बन्ध 'अन्तस्य' के साथ है जो समासावस्था में घटित नहीं हो सकता। अतएव 'ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः' के स्थान पर 'ऋद्धस्य राजपुरुषः' प्रयुक्त नहीं होता। इसी प्रकार 'प्रातिपदिकान्तस्य' में भी 'प्रातिपदिक' को पृथक् पद समझना चाहिये। षष्ठीसमास मानने पर उस का 'पदस्य' के साथ अन्वय नहीं हो सकेगा।