लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३१ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८०) न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य ।८।२।७॥ प्रातिपदिकसञ्ज्ञकं यत्पदं तदन्तस्य नस्य लोपः स्यात् । सखा ॥ अर्थः—प्रातिपदिकसञ्ज्ञक जो पद उस के अन्त्य नकार का लोप हो जाता है। व्याख्या—प्रातिपदिक ।६।१। (यहां सुपां सुलुकू० सूत्र से षष्ठी का लुक् हुआ है)। पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अन्तस्य ।६।१। न ।६।१। (यहां भी षष्ठी का लुक् हुआ है)। लोपः ।१।१। अर्थः—(प्रातिपदिक) प्रातिपदिकसञ्ज्ञक (पदस्य) पद के अवयव (अन्तस्य) अन्त्य (नः) न् का (लोपः) लोप हो जाना है।१ यदि सूत्र में 'प्रातिपदिक' का ग्रहण न करके केवल 'पद' का ही ग्रहण करते तो 'अहन्' (हन् धातु के लँङ् में प्रथम वा मध्यमपुरुष का एकवचनान्त प्रयोग) यहां भी नकार का लोप हो जाना; क्योंकि यहां पदसंज्ञा अक्षुण्ण है। इसी प्रकार यदि 'पद' का ग्रहण न करके केवल 'प्रातिपदिक' का ही ग्रहण करते तो 'राजन् + औ = राजानौ' यहां भी नकार का लोप हो जाता; क्योंकि प्रातिपदिकसंज्ञा तो यहां भी है। अतः दोनों का ग्रहण किया गया है। 'सखान्' यह प्रातिपदिकसंज्ञक पद है। यद्यपि प्रातिपदिकसंज्ञा 'सखि' शब्द की ही थी तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् ने यहां भी प्रातिपदिकसंज्ञा विद्यमान है। इसी प्रकार सुं—सुँप् का लोप होने पर भी आगे आने वाले प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम् (१६०) सूत्र की सहायता से सुबन्त हो जाने के कारण सुप्तिङन्तं पदम् (१४) द्वारा पदसंज्ञा हो जाती है। तो प्रकृत-सूत्र से इस के नकार का लोप हो—'सखा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'सखि + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(१८१) सख्युरसम्बुद्धौ ।७।१।९२॥ सख्युरङ्गात् परं सम्बुद्धिवर्जं सर्वनामस्थानं णिद्वत् स्यात् ॥ अर्थः—अङ्गसंज्ञक सखि शब्द से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान णिद्वत्— णित् के समान हो, अर्थात् णित् के परे होने पर जो कार्य होते हैं उस के परे होने पर भी वे कार्य हों। व्याख्या—अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है। यहां विभक्ति का विपरि- णाम हो जाता है)। सख्युः ५।१। असम्बुद्धौ ।७।१। (यह प्रथमान्त हो जायेगा)। सर्व- १. इस सूत्र में 'नस्य लोपः—नलोपः' ऐसा षष्ठीतत्पुरुषसमास नहीं समझना चाहिये। क्योंकि 'नस्य' का सम्बन्ध 'अन्तस्य' के साथ है जो समासावस्था में घटित नहीं हो सकता। अतएव 'ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः' के स्थान पर 'ऋद्धस्य राजपुरुषः' प्रयुक्त नहीं होता। इसी प्रकार 'प्रातिपदिकान्तस्य' में भी 'प्रातिपदिक' को पृथक् पद समझना चाहिये। षष्ठीसमास मानने पर उस का 'पदस्य' के साथ अन्वय नहीं हो सकेगा।
२३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नामस्थानम् । १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से) । णित् ।१।१। (गोतो णित् से) । समास — न सम्बुद्धि = असम्बुद्धि, नञ्तत्पुरुष । अर्थ — (अङ्गात्) अङ्गसञ्ज्ञक (सख्यु ) सखिशब्द से परे (असम्बुद्धि) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थानम्) सर्वनामस्थान (णित्) णित् हो । यह अतिदेश-सूत्र है । अतिदेशसूत्रों का यह काम होता है कि जो, जो नहीं उसे वह बना देते हैं । यथा सिंहो माणवक (बालक शेर है)। बालक शेर नहीं होता, परन्तु उसे शेर कह दिया जाना है । इस का तात्पर्य अन्ततोगत्वा सादृश्य म समाप्त होता है—बालक शेर के समान (शूर) है । यहां सर्वनामस्थान को णित् कहा गया है, परन्तु उस में न तो ण् है और न ही उस की इत्सञ्ज्ञा होती है । तो यहां ‘णित्’ अतिदेश का तात्पर्य ‘णिद्वत्’ से होगा । अर्थात् णित् के परे रहने पर जो कार्य होते हैं, उस के पर रहने पर भी होंगे । ‘सखि + औ’ यहां अङ्गसञ्ज्ञक सखि से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान ‘औ’ है । यह णित् = णिद्वत् हुआ । अब अग्रिमसूत्र में इस का फल दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८२) अचो ञ्णिति ।७।२।११५॥ अजन्ताङ्गस्य वृद्धि, जिति णिति च परे । सखायौ, सखाय । हे सखे ! । सखायम्, सखायौ, सखीन् । सख्या । सख्ये ॥ अर्थः—ञित् अथवा णित् परे रहते अजन्त अङ्ग के स्थान पर वृद्धि हो । व्याख्या—अच ६।१। अङ्गस्य ।६।१। (अधिकृत है) । ञ्णिति ।७।१। वृद्धि ।१।१। (मृजेर्वृद्धिः से) । समास — ञ् च ण् च ञ्णौ, तावितौ यस्य तत् ञ्णित्, तस्मिन् = ञ्णिति, द्वन्द्वगर्भबहुव्रीहिसमास । अर्थः— (ञ्णिति) ञित् अथवा णित् परे रहते (अच ) यजन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (वृद्धि ) वृद्धि हो । अलोन्त्य- परिभाषा से अन्त्य अल् के स्थान पर वृद्धि होगी । ‘सखि + औ’ यहां ‘औ’ णित् परे है, अतः सखि के अन्त्य अल् = इकार को ऐकार वृद्धि हो — ‘सखै + औ’ हुआ । अब एचोऽयवायाव. (२२) से ऐकार को आय् आदेश हो कर ‘सखायौ’ प्रयोग सिद्ध होता है । ‘सखि + अस्’ (जस्) यहां भी पूर्ववत् णिद्द्भाव, वृद्धि और आय् आदेश हो कर सकार को रुँत्व विसर्ग करने पर ‘सखाय’ प्रयोग सिद्ध होता है । ‘हे सखि + स्’ यहां सम्बुद्धि में हरिशब्द के समान ह्रस्वस्य गुण. (१६६) से इकार को एवार गुण हो एडन्त हो जाने से एङ्ह्रस्वात् सबुद्धेः (१३४) सूत्र द्वारा सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे सखे’ सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि (१८१) सूत्र में ‘असम्बुद्धौ’ कथन के कारण यहा सबुद्धि मे णिद्द्भाव नहीं होता । ‘सखि + अम्’ यहा भी पूर्ववत् सर्वनामस्थान को णिद्द्भाव, उस के परे रहते वृद्धि तथा ऐकार को आय् आदेश हो कर—‘सखायम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । द्वितीया के द्विवचन में ‘सखायौ’ प्रथमावत् बनता है ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३३ बहुवचन में 'सखि + अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ होकर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार करने पर—'सखीन्' प्रयोग सिद्ध हुआ। ध्यान रहे कि शस् के सर्वनामस्थान न होने से णिद्वद्भाव नहीं होगा। तृतीया के एकवचन में 'सखि + आ' (टा) इस स्थिति में इको यणचि (१५) से यण् आदेश हो—'सख्या' प्रयोग सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि सखि की घिसञ्ज्ञा न होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा 'टा' को 'ना' नहीं होता। तृतीया के द्विवचन में 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभिः'। 'सखि + ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा के न होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण नहीं होता। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'सख्ये' प्रयोग बनता है। 'सखि + अस्' (ङसि) यहां इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो— 'सख्य् + अस्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१८३) ख्यत्यात्परस्य ।६।१।१०८॥ 'खि-ति'शब्दाभ्यां 'खी-ती'शब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ङसिँ- ङसोरत उः । सख्युः २ ॥ अर्थः—जिन के स्थान पर यण् किया गया हो ऐसे खिशब्द, तिशब्द, खीशब्द अथवा तीशब्द से परे ङसिँ और ङस् के अकार को उकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—ख्यत्यात् ।५।१। परस्य ।६।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च से)। अतः ।६।१। (एङः पदान्तादति से, विभक्तिविपरिणाम कर के)। उत् ।१।१। (ऋत उत् से)। समासः—ख्यञ्च त्यञ्च = ख्यत्यम्, तस्मात् = ख्यत्यात्, समाहार- द्वन्द्वः। यकारादकार उच्चारणार्थः¹। 'खि' या 'खी' शब्द के इवर्ण को यण् करने से ख्य् और 'ति' या 'ती' शब्द के इवर्ण को यण् करने ये त्य् रूप बनता है। उसी का यहां ग्रहण करना चाहिये। 'ख्यत्यात्' यह पञ्चम्यन्त है; अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१) सूत्र से स्वयं ही ख्य् और त्य् से परे कार्य होना था, पुनः मुनि का 'परस्य' ग्रहण करना एकः पूर्वपरयोः (६.१.८१)अधिकार की निवृत्ति के लिये है। अर्थः—(ख्यत्यात्) यणादेश किये हुए खि, खी और ति, ती शब्दों से (परस्य) परे (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ और ङस् के (अतः) अकार के स्थान पर (उत्) उकार आदेश होता है। 'सख्य् + अस्' यहां यणादेश किया हुआ 'खि' शब्द है; अतः इस से परे ङसिँ के अकार को उकार हो—'सख्य् + उस्' बना। अब सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'सख्युः' प्रयोग सिद्ध हुआ। द्विवचन में चतुर्थी के समान 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभ्यः'। १ ध्यान रहे कि यदि यहां अकार को उच्चारणार्थ न मान 'ख्य' और 'त्य' शब्दों का ग्रहण कर 'सङ्ख्य' 'अपत्य' आदि शब्दों में इस की प्रवृत्ति मानेंगे तो सख्य्युर्यः (११५७) पत्युर्नो यज्ञसंयोगे (४.१.३३), आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति (६.४.१५१) इत्यादि निर्देश विपरीत पड़ेंगे।
२३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् षष्ठी के एकवचन (ङस्) मे 'सख्यु' बनता है। 'सखि + ओस्' यहा यण् हो कर रुँत्व विसर्ग करने से 'सख्योः' बना। 'सखि + आम्' इस स्थिति मे ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् का आगम हो अनुबन्ध- लोप कर नामि (१४६) मे दीर्घ करने पर 'सखीनाम्' रूप बनता है। 'सखि + ङि' (ङि) यहा घिसञ्ज्ञा न होने से अच्च घेः (१७४) सूत्र प्रवृत्त नही होता। तब सवर्ण दीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८४) औत् ।७।३।११८॥ इदुद्भ्या परस्य ङेरौत्। सख्यौ। शेष हरिवत् ॥ अर्थ —ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार से परे 'ङि' को 'औ' हो जाता है। व्याख्या—इदुद्भ्याम् ।५।२। (इदुद्भ्याम् ५) । ङे ।६।१। (ङेराम्नद्याम्नीभ्य स) । औत् ।१।१। अर्थ —(इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे (ङे ) ङि के स्थान पर (औत्) औकार¹ आदेश होता है। यह उत्सर्ग-सूत्र (सामान्य-सूत्र) है। अच्च घे (१७४) इस का अपवाद है। अतः उस के विषय मे इस की प्रवृत्ति नही होती। उकार का उदाहरण नही मिलता, उस का यहा ग्रहण अच्च घेः (१७४) आदि अग्रिम-सूत्रो मे अनुवृत्ति के लिये है। 'सखि + ङि' यहा प्रकृत-सूत्र से इकार को औकार आदेश हो इको यणचि (१५) से यण् करने पर 'सख्यौ' रूप बनता है। द्विवचन मे 'सख्योः' षष्ठी के द्विवचन के समान बनता है। बहुवचन मे सखि + सु = सखिषु (आदेशप्रत्यययोः)। समग्र रूपमाला यथा— प्र० सखा सखायौ सखायः । प० सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः द्वि० सखायम् ,, सखीन् । ष० ,, सख्योः सखीनाम् तृ० सख्या सखिभ्याम् सखिभिः । स० सख्यौ ,, सखिषु च० सख्ये ,, सखिभ्यः । सं० हे सखे ! हे सखायौ ! हे सखायः ! अब 'पति' शब्द का वर्णन करते हैं। 'पति' का अर्थ 'स्वामी' है। प्रथम दो विभक्तियो मे 'हरि' शब्द के समान प्रक्रिया होती है। तृतीया के एकवचन मे शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस पर अग्रिम-सूत्र मे नियम करते हैं— [लघु०] नियम-सूत्रम्—(१८५) पतिः समास एव ।१।४।८॥ घि-सञ्ज्ञः। पत्या। पत्ये। पत्युः २। पत्यौ। शेष हरिवत्। समासे तु—भूपतये ॥ १ औत् मे तकार तपर है जो तत्काल के लिये है। यहा पर श्री पं० श्रीधरानन्द जी शास्त्री भ्रान्तिवश तकार को इत् लिखते और उस का प्रयोजन मवदिश करना बताते हैं।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३५ अर्थः- 'पति' शब्द समास में ही घिसञ्ज्ञक होता है (समास से भिन्न स्थल में नहीं)। व्याख्या-पतिः ।१।१। समासे ।७।१। एव इत्यव्ययपदम् । घिः ।१।१। (शेषो घ्यसखि से)। अर्थः- (पतिः) पतिशब्द (समासे) समास में (एव) ही (घिः) घिस- ञ्ज्ञक होता है।¹ समास और असमास दोनों अवस्थाओं में पतिशब्द की शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा प्राप्त होती थी । अब इस सूत्र में नियम किया जाता है कि समास में ही पतिशब्द की घिसञ्ज्ञा हो असमास में नहीं । घिसञ्ज्ञा के यहां तीन कार्य होते हैं। १. आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा को ना आदेश । २. ङे, ङसिँ, ङस् में घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण । ३. अच्च घेः (१७४) द्वारा ङि को औकार और घि को अकार आदेश । असमासावस्था में पति शब्द की घिसञ्ज्ञा न होने से ये तीनों घिकार्य न होंगे । तब इन विभक्तियों में सखि- शब्दवत् प्रक्रिया होगी । यथा- 'पति + आ' यहां यण् आदेश हो—'पत्या' बना । 'पति + ए' (ङे) यहां भी यण् आदेश करने पर 'पत्ये' बना । 'पति + अस्' (ङसिँ वा ङस्) इस दशा में यण् आदेश हो ख्यत्यात् परस्य (१८३) से उकार आदेश करने पर 'पत्युः' बना । 'पति + इ' (ङि) इस अवस्था में औत् (१८४) से ङि को औकार हो इको यणचि (१५) से यण् करने पर 'पत्यौ' रूप सिद्ध होता है । समग्र रूपमाला यथा- प्र० पतिः पती पतयः | प० पत्युः पतिभ्याम् पतिभ्यः द्वि० पतिम् ,, पतीन् | ष० ,, पत्योः पतीनाम् तृ० पत्या पतिभ्याम् पतिभिः | स० पत्यौ ,, पतिषु च० पत्ये ,, पतिभ्यः | सं० हे पते! हे पती ! हे पतयः ! समास में 'पति' शब्द की घिसञ्ज्ञा हो जायेगी; अतः 'हरि' शब्द के समान रूप चलेंगे । 'भूपति' (पृथ्वी का पति = राजा) में 'भुवः पतिः = भूपतिः' इस प्रकार षष्ठीतत्पुरुषसमास है। इसकी रूपमाला यथा -- प्र० भूपतिः भूपती भूपतयः | प० भूपतेः भूपतिभ्याम् भूपतिभ्यः द्वि० भूपतिम् ,, भूपतीन् | ष० ,, भूपत्योः भूपतीनाम् तृ० भूपतिना भूपतिभ्याम् भूपतिभिः | स० भूपतौ ,, भूपतिषु च० भूपतये ,, भूपतिभ्यः | सं० हे भूपते! हे भूपती! हे भूपतयः! इसी प्रकार-नरपति, नृपति, मृगपति, गृहपति, पृथ्वीपति, क्षितिपति, लोक- पति, देशपति, पशुपति, गणपति, सेनापति प्रभृति शब्दों के रूप जानने चाहियें। १. इस सूत्र में यद्यपि 'एव' पद के बिना भी सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः द्वारा उप- र्युक्त नियम सिद्ध हो सकता था; तथापि-'समास में पतिशब्द ही घिसञ्ज्ञक हो अन्य शब्द न हों' इस विपरीत नियम की आशङ्का से बचने के लिये यहां मुनि ने 'एव' पद का ग्रहण किया है ।
२३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् विशेष—'बहुपति' (ईषदून पति) शब्द में 'बहुच्' प्रत्यय है, जो कि—विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात् (५।३।६८) इस सूत्र से प्रकृति मे पूर्व होगा। उस का उच्चारण 'पति' की तरह होगा। यदि 'बहु' शब्द अभीष्ट हो, तब 'भूपति' की तरह होगा। प्रश्न—सीतायाः पतये नमः इत्यादि स्थानों पर समास न होने से कैसे घिसञ्ज्ञा कर दी गई है ? उत्तर—यहां पर छन्दोवत् कवयः कुर्वन्ति इस उक्ति के अनुसार षष्ठीयुक्त- श्छन्दसि वा (१।४।६) से घिसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये। अथवा—तत्पुरुषे कृति बहु- लम् (८१२) सूत्र से बहुलग्रहणसामर्थ्यात् यहां षष्ठी का समास में अलुक् जान कर घिसञ्ज्ञा समझनी चाहिये। [लघु०] कतिशब्दो नित्य बहुवचनान्तः ॥ अर्थ:—'कति' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है। व्याख्या—'किम्' शब्द से 'डति' प्रत्यय करने पर कति शब्द सिद्ध होता है। इस का प्रयोग सदा बहुवचन में ही होता है, एकवचन और द्विवचन में नहीं। क्योंकि 'कति' (कितने) शब्द बहुत्व का ही वाचक है एक दो का नहीं। 'कति + शस्' (जस्) इस स्थिति में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१८६) बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या ।१।१।२३॥ अर्थ—बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा डतिप्रत्ययान्त शब्द 'सङ्ख्या' सञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—बहु-गण-वतुं-डति ।१।१। सङ्ख्या ।१।१। समासः—बहुश्च गणश्च वतुंश्च डतिश्च = बहु-गण-वतुं-डति, समाहारद्वन्द्वः । 'वतुँ' और 'डति' प्रत्यय हैं, अतः प्रत्ययग्रहणे तदन्त-ग्रहणम् से तदन्त शब्दों का ही ग्रहण होगा। केवल प्रत्ययों की सञ्ज्ञा करना निष्प्रयोजन होने से सञ्ज्ञाविधौ प्रत्यय-ग्रहणे तदन्त-ग्रहणं नास्ति यह निषेध प्रवृत्त न होगा। अर्थ—(बहु-गण-वतुं-डति) बहुशब्द, गणशब्द, वतुँप्रत्ययान्त शब्द तथा डतिप्रत्ययान्त शब्द (सङ्ख्या) सङ्ख्या सञ्ज्ञक होते हैं। 'कति + जस्' यहां प्रकृतसूत्र से डतिप्रत्ययान्त 'कति' शब्द की सङ्ख्या सञ्ज्ञा हो जाती है। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१८७) डति च ।१।१।२४॥ डत्यन्ता सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञा स्यात् ॥ अर्थ:—डति-प्रत्ययान्त सङ्ख्या षट्सञ्ज्ञक हो। व्याख्या—डति ।१।१। च इत्यव्ययपदम् ।१।१। (बहु-गण-वतुं-डति सङ्ख्या से) । षट् ।१।१। (ष्णान्ता षट् से)। अर्थ—(डति) डतिप्रत्ययान्त (सङ्ख्या) सङ्- ख्यासञ्ज्ञक शब्द (षट्) षट् सञ्ज्ञक होते हैं। 'कति + जस्' यहां कतिशब्द डतिप्रत्ययान्त है और साथ ही सङ्ख्यासञ्ज्ञक भी है; अतः इस की षट्सञ्ज्ञा हो जाती है। आकडारादेका संज्ञा (१६६) इस
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३७ अधिकार से बहिर्भूत होने के कारण यहां एक की दो सञ्ज्ञाएं हुईं । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१८८) षड्भ्यो लुक् ।७।१।२२॥ जश्शसोः ॥ अर्थः-षट्सञ्ज्ञकों से परे जस् और शस् का लुक् हो जाता है । व्याख्या - षड्भ्यः ।५।३। जश्शसोः ।६।२। (जश्शसोः शिः से) । लुक् ।१।१। अर्थः - (षड्भ्यः) षट्सञ्ज्ञकों से परे (जश्शसोः) जस् और शस् का (लुक्) लुक् हो जाता है । 'कति + अस्' यहां 'कति' शब्द की षट्सञ्ज्ञा है । इस से परे जस् विद्यमान है, अतः जस् का लुक् होगा । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि लुक् किसे कहते हैं ? इस का समाधान अग्रिमसूत्र से करते हैं- [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् - (१८६) प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ।१।१।६०॥ लुक्-श्लु-लुपूशब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमात् तत्तत्सञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः-लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो प्रत्यय का अदर्शन किया जाता है, वह (अदर्शन) क्रमशः लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता है । व्याख्या-प्रत्ययस्य ।६।१। अदर्शनम् ।१।१। (अदर्शनं लोपः से) । लुक्श्लुलुपः ।१।३। यहां 'प्रत्यय का अदर्शन लुक्, श्लु, लुपू सञ्ज्ञक हो' ऐसा अर्थ प्रतीत होता है । इस से एक ही प्रत्यय के अदर्शन की 'लुक्, श्लु, लुपू' ये तीन सञ्ज्ञाएं हो जाती हैं । इस से 'हन्ति' में शप् का लुक् होने पर श्लौ (६०५) से द्वित्व प्राप्त होता है। 'जुहोति' में शप् का श्लु होने से उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६) से वृद्धि प्राप्त होती है । अतः इन के साङ्कर्य की निवृत्ति के लिये 'लुक्-श्लु-लुपः' पद की आवृत्ति (दो वार पाठ) कर एक स्थान पर उस का तृतीयान्ततया विपरिणाम कर लेना चाहिये । अर्थः- (लुक्- श्लु-लुब्भिः) लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो (प्रत्ययस्य) प्रत्यय का (अदर्शनम्) अदर्शन किया जाता है, वह क्रमशः (लुक्-श्लु-लुपः) लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता है । भावः-१. प्रत्यय का अदर्शन 'लुक्' सञ्ज्ञक होता है । २. प्रत्यय का अदर्शन 'श्लु' सञ्ज्ञक होता है । ३. प्रत्यय का अदर्शन 'लुपू' सञ्ज्ञक होता है । अब इस अर्थ से 'हन्ति' आदि में कोई दोष नहीं आता; क्योंकि 'हन्ति' में शप्प्रत्यय का अदर्शन लुक्- सञ्ज्ञक है श्लुसञ्ज्ञक नहीं, अतः श्लौ (६०५) से द्वित्व नहीं होता । 'जुहोति' में शप्प्रत्यय का अदर्शन श्लुसञ्ज्ञक है लुक्सञ्ज्ञक नहीं, अतः उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६) से वृद्धि नहीं होती । इसी प्रकार अन्यत्र भी जान लेना चाहिये । तो अब हमें विदित हो गया कि प्रत्यय के अदर्शन को ही 'लुक्' कहते हैं । 'कति + अस्' यहां अस् (जस्) प्रत्यय का लुक् अर्थात् अदर्शन हो कर 'कति' प्रयोग सिद्ध होता है । अब यहां जसि च (१६८) द्वारा गुण की आशङ्का करने के लिये प्रथम जस् की स्थापना करते हैं-
२३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(१६०) प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम्। १।१।६१॥ प्रत्यये लुप्ते तदाश्रितं कार्यं स्यात् । इति जसि च (१६८) इति गुणे प्राप्ते— अर्थ—प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी तदाश्रित कार्य हो जाते हैं। इस सूत्र से जसि च (१६८) द्वारा 'कति' में गुण प्राप्त होता है। इस पर [अग्रिमसूत्र निषेध कर देता है]। व्याख्या—प्रत्यय लोपे ।७।१। प्रत्यय-लक्षणम् ।१।१। समास—प्रत्ययस्य लोप = प्रत्ययलोप, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे। षष्ठीतत्पुरुषसमास । प्रत्ययो लक्षणं (निमित्तम्) यस्य तत् प्रत्ययलक्षणम् कार्यम् इत्यर्थः । बहुव्रीहिसमास । अर्थ — (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय का लोप हो जाने पर भी (प्रत्ययलक्षणम्) प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य हो जाता है। कई कार्य प्रत्यय को मान कर हुआ करते हैं। यथा—जसि च (१६८) यह ‘जस्’ प्रत्यय को मान कर ह्रस्वान्त अङ्ग के स्थान पर गुण करता है। सुपि च (१४१) यह यत्रादि सुप् प्रत्यय को मान कर अदन्त अङ्ग को दीर्घ करता है। सुप्तिङन्तं पदम् (१४) यह सुप् तथा तिङ् प्रत्यय को मान कर ही पद सञ्ज्ञा करता है। इस प्रकार के कार्य उस प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी हो जाते हैं—यह इस सूत्र का तात्पर्य है। यथा—'राम' यहां जिस प्रकार सुप् प्रत्यय के रहते पदसञ्ज्ञा हो जाती है वैसे 'लिट्, विद्वान्, भगवान्' आदियों में सुप् प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। 'कति' यहां जस् प्रत्यय का लोप हो चुका है, अब इस सूत्र से उस के न रहने पर भी उस को मान कर जसि च (१६८) द्वारा गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम- सूत्र निषेध करता है : प्रश्न—इस सूत्र द्वारा प्रत्यय के लोप में ही प्रत्ययलक्षण होता है, परन्तु 'कति' में प्रत्यय का लुक् हुआ है, लोप नहीं, तो यहां कैसे प्रत्ययलक्षण (गुण) प्राप्त हो सकता है ? उत्तर—जैसे लोक में एक व्यक्ति की अनेक सञ्ज्ञाएं देखी जाती हैं वैसा इस शास्त्र में भी होता है। तव्यत्, तव्य, अनीयर् आदि प्रत्ययों की कृत् और कृत्य दोनों सञ्ज्ञाएं हैं। जहां शास्त्र में एक सञ्ज्ञा करना अभीष्ट होता है वहां स्पष्ट कह दिया जाता है यथा—आकडारादेका सञ्ज्ञा (१४१)। यहां प्रत्यय के अदर्शन की अदर्शनं लोपः (२) से लोप-सञ्ज्ञा की गई है। उसी अदर्शन की पुनः प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः (१८६) सूत्र से लुक्, श्लु और लुप्-सञ्ज्ञाएं की जाती हैं। तो इस प्रकार लुक्, श्लु और लुप् तीनों सञ्ज्ञाओं के साथ 'लोप' सञ्ज्ञा भी वर्तमान रहती है। इस से 'कति' में प्रत्यय-लक्षण प्राप्त होता है। [लघु०] निषेध सूत्रम्—(१६१) न लुमताऽङ्गस्य ।१।१।६२॥ लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात् । कति २। कतिभिः । कतिभ्यः २ । कतीनाम् । कतिषु ॥
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३६ अर्थः—लु वाले (लुक्, श्लु, लुप्) शब्दों से यदि प्रत्यय का लोप हुआ हो तो तन्निमित्तक (उस प्रत्यय को निमित्त मान कर होने वाला) अङ्ग-कार्य नहीं होता। व्याख्या—लुमता ।१।१। प्रत्ययलोपे ।७।१। (प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। प्रत्ययलक्षणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम्। समासः— लु इत्येकदेशोऽस्त्यस्य स लुमान्, तेन लुमता। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुँप् (११८४) इति मतुँप्प्रत्ययः। प्रत्ययस्य लोपः=प्रत्ययलोपः, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः—(लुमता) लु वाले शब्द से (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय का लोप होने पर (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (प्रत्ययलक्षणम्) उस प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य (न) नहीं होता। ‘लु’ वाले शब्द तीन हैं—१. लुक्, २. श्लु, ३. लुप्। यह सूत्र पूर्वकथित प्रत्ययलक्षण सूत्र का अपवाद है। ‘कति’ में जस् प्रत्यय का लु वाले शब्द = लुक् से अदर्शन हुआ है तो यहां प्रत्ययलक्षण कार्य (गुण) न होगा। ध्यान रहे कि यह निषेध तभी होगा जब अङ्ग के स्थान पर प्रत्ययलक्षण कार्य करना होगा। यदि अङ्ग के स्थान पर कार्य न होगा तो ‘लु’ वाले शब्दों से अदर्शन होने पर भी प्रत्ययलक्षण हो जायेगा। यथा—‘पञ्चन्, सप्तन्’ यहां षड्भ्यो लुक् (१८४) से जस् और शस् का लुक् होने पर भी सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र से पद- सञ्ज्ञा हो जाती है। पदसञ्ज्ञा हो जाने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा नकार का लोप हो जाता है। पदसञ्ज्ञा केवल अङ्ग की ही नहीं होती किन्तु प्रत्यय- विशिष्ट अङ्ग की हुआ करती है; इस से प्रत्ययलक्षण में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इसी प्रकार यङ्लुगन्त प्रक्रिया में यङ्लुक् होने पर भी यङन्तमूलक द्वित्व हो ही जाता है। यह विषय विस्तारपूर्वक रोऽसुंपि (११०) सूत्र पर लिख आए हैं वहीं देखें। द्वितीया के बहुवचन शस् में भी जस् की तरह ‘कति’ प्रयोग बनता है। प्रत्यय- लक्षण द्वारा गुणप्राप्ति तथा उस का निषेध यहां नहीं होता। कति + भिस् = कतिभिः। कति + भ्यस् = कतिभ्यः। यहां सकार को रुँ और रेफ को विसर्ग आदेश हो जाते हैं। ‘कति + आम्’ यहां ह्रस्वनद्यापो नुट् (१८४) सूत्र से ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप तथा नामि (१४६) से दीर्घ होकर—‘कतीनाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। [अथवा षट्त्व के कारण षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से नुट् का आगम कर दीर्घ कर लेना चाहिये। इस की स्पष्टता ‘रामाणाम्’ प्रयोग पर सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओं में देखनी चाहिये।] सप्तमी के बहुवचन में आदेश-प्रत्यययोः (१५०) से मूर्धन्य षकार होकर ‘कतिषु’ रूप बनता है। विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० ० कति | तृ० ० ० कतिभिः द्वि० ० ० ,, | च० ० ० कतिभ्यः
२४० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पं० ० ० कतिभ्यः | स० ० ० कतिषु ष० ० ० कतीनाम् | सं० ० ० हे कति ! [लघु०] युष्मदस्मत्षट्सञ्ज्ञकास्त्रिषु सरूपा ॥ अर्थ — युष्मद् अस्मद् और षट्सञ्ज्ञक शब्द तीनों लिङ्गो में समान रूप वाले होते हैं। व्याख्या—समानानि रूपाणि येषां ते सरूपाः, बहुव्रीहिसमासः । ज्योतिर्जनपद० (६ ३ ८४) इति समानस्य सभावे । 'कति' शब्द षट्सञ्ज्ञक है, अतः तीनों लिङ्गों में एक समान रूप बनेंगे। यथा—कति पुरुषाः ? कति नार्यः ? कति फलानि ? । इसी प्रकार युष्मद् और अस्मद् के भी—'अहम्पुरुषः, अहं नारी, अहं मित्रम्, त्वं पुरुषः त्वं नारी, त्वं मित्रम्' इत्यादि समान रूप बनते हैं। [लघु०] त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । त्रयः । त्रीन् । त्रिभिः । त्रिभ्यः २ ॥ अर्थ—'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। व्याख्या—'त्रि' शब्द का अर्थ 'तीन' है। तीन—बहुसङ्ख्या का वाचक है अतः एकत्व और द्वित्व का प्रकृति के अर्थ—बहुत्व के साथ अन्वय न हो सकने के कारण एकवचन द्विवचन नहीं आते। ध्यान रहे कि प्रधान होने पर ही 'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है, गौण अवस्था में तो इस में एकवचन और द्विवचन भी हुआ करते हैं जैसा कि आगे 'प्रियत्रि' शब्द में किया गया है। 'त्रि+अस्' (जस्) इस अवस्था में जसि च (१६८) सूत्र से गुण हो एचोऽय- वायाव (२२) से अय् आदेश करने पर—त्रयस्— 'त्रयः' रूप बनता है। 'त्रि+अम्' (शस्) इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ हो शकार को नकार करने पर 'त्रीन्' प्रयोग सिद्ध होता है। त्रि+भिस् = त्रिभिः । त्रि+भ्यस् = त्रिभ्यः । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं। 'त्रि+आम्' इस दशा में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६२) त्रेस्त्रयः ।७।१।५३॥ त्रि-शब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि। त्रयाणाम् । त्रिषु । गौणत्वेऽपि - प्रियत्रयाणाम् ॥ अर्थ—आम् पर हो तो 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'त्रय' आदेश हो। व्याख्या—त्रेः ।६।१। त्रयः ।१।१। आमि ।७।१। (आमि सर्वनाम्नः सुट् से)। अर्थ —(आमि) आम् परे होने पर (त्रेः) त्रिशब्द के स्थान पर (त्रयः) त्रय आदेश हो। अनेकाल् होने से यह आदेश अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा। सूत्र में त्रिशब्द सङ्ख्यावाचक नहीं शब्दवाचक है अतः हरिवत् उच्चारण होने से 'त्रेः' यहाँ एकवचन हो गया है। 'त्रि+आम्' यहाँ आम् परे है अतः त्रिशब्द को प्रकृतसूत्र से त्रय आदेश हो
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४१ —'त्रय + आम्' । अब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, नामि (१४६) से दीर्घ तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व करने पर 'त्रयाणाम्' रूप सिद्ध होता है। 'त्रि + सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्ययोः (१५०) से सकार को षकार हो कर 'त्रिषु' रूप सिद्ध हुआ। 'त्रि' शब्द की समग्र रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० ० त्रयः | प० ० ० त्रिभ्यः द्वि० ० ० त्रीन् | ष० ० ० त्रयाणाम् तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु च० ० ० त्रिभ्यः | सं० ० ० हे त्रयः ! बहुव्रीहिसमास में अन्यपद प्रधान रहता है, समस्यमान पद गौण अर्थात् अप्रधान रहते हैं। यह हम पीछे (१३३) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं। जब बहुव्रीहि- समास में 'त्रि' शब्द गौण होता है तब भी इस सूत्र से उस के स्थान पर 'त्रय' आदेश हो जाता है। सूत्र में 'त्रेः' यहां एकवचन करना ही इस में प्रमाण है; अन्यथा अष्टाभ्य औश् (३००) की तरह यहां भी त्रेस्त्रयः की बजाय 'त्रयाणां त्रयः' इस प्रकार का सूत्र बनाते। प्रियाः त्रयः यस्य सः=प्रियत्रिः, बहुव्रीहिसमासः । जिसे तीन प्रिय हों उसे 'प्रियत्रि' कहते हैं। 'प्रियत्रि+आम्' इस स्थिति में त्रि के स्थान पर त्रय आदेश हो— प्रियत्रय+आम्। तब ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप, ह्रस्वान्त अङ्ग को दीर्घ तथा नकार को णकार हो कर 'प्रियत्रयाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अन्य विभक्तियों में रूप 'हरि' की तरह होते हैं। 'प्रियत्रि' की रूपमाला यथा— प्र० प्रियत्रिः प्रियत्री प्रियत्रयः | प० प्रियत्रेः प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभ्यः द्वि० प्रियत्रिम् ,, प्रियत्रीन् | ष० ,, प्रियत्र्योः प्रियत्रयाणाम् तृ० प्रियत्रिणा प्रियत्रिभ्याम् प्रियत्रिभिः | स० प्रियत्रौ ,, प्रियत्रिषु च० प्रियत्रये ,, प्रियत्रिभ्यः | सं० हे प्रियत्रे! हे प्रियत्री! हे प्रियत्रयः! अब सङ्ख्यावाचक द्वि(दो) शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६३) त्यदादीनामः ।७।२।१०२॥ एषामकारो विभक्तौ । द्विपर्यन्तानामेवेष्टिः । द्वौ २ । द्वाभ्याम् ३ । द्वयोः २ ॥ अर्थः—विभक्ति परे रहने पर त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर अकार आदेश हो । द्विपर्यन्तानाम् —'द्वि' तक ही त्यदादियों को अकार करना इष्ट है। व्याख्या—त्यदादीनाम् ।६।३। अः ।१।१। विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से) । समासः—त्यद्-शब्द आदिर्येषान्ते त्यदायः, तद्गुण-संविज्ञान-बहुव्रीहि-समासः । सर्वादिगण के अन्तर्गत त्यदादिगण आया है। यह त्यद् शब्द से आरम्भ होता है। इस की अवधि भाष्यकार ने 'द्वि' शब्द पर्यन्त नियत की है। इस प्रकार इस गण में 'त्यद्, ल० प्र० (१६)
२४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि' ये आठ शब्द आते हैं। अर्थ—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (त्यदादीनाम्) त्यद् आदि शब्दों के स्थान पर (अ) अकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से त्यदादियों के अन्त्य अल् को ही अकार आदेश होगा। 'द्वि' शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त होता है। द्विवचन प्रत्यय आने पर सब विभक्तियों में प्रथम प्रकृतसूत्र द्वारा इकार को अकार हो 'द्व' बन जाता है। तब रामशब्द के समान प्रक्रिया होकर रूप सिद्ध होते हैं। द्विशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० द्वौ* ० | प० ० द्वाभ्याम् ० द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयो ‡ ० तृ० ० द्वाभ्याम्† ० | स० ० ,, ० च० ० ,, ० | त्यदादियों का प्राय सम्बोधन नहीं होता।
- 'द्वि + औ' यहां अकार अन्तादेश हो वृद्धि हो जाती है। † 'द्वि + भ्याम्' यहां अकार अन्तादेश हो सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है। ‡ 'द्वि + ओस्' यहां अकार अन्तादेश हो ओसि च (१४७) से एकार तथा एचोऽय- वायाव (२२) से एकार को अय् आदेश हो जाता है।
अभ्यास (२६) (१) अव्ययों से अतिरिक्त ऐसे कौन से शब्द हैं जो तीनों लिङ्गों में सरूप अर्थात् समान रूप वाले होते हैं ? (२) ऐसे किसी शब्द का उल्लेख करें जिस की सुबन्तप्रक्रिया आम् को छोड़ अन्यत्र हरिशब्दवत् होती हो। (३) सीतायाः पतये नमः यहां समासाभाव में भी कैसे घिसञ्ज्ञा हो कर तज्जन्य कार्य हो जाते हैं ? (४) निम्नलिखित सञ्ज्ञाओं में कौन सी सञ्ज्ञा प्रकृति की, और कौन सी प्रत्यय की होती है ? ससूत्र यथाधीतं टिप्पणं करें— १ अपृक्त। २ अङ्ग। ३. आट्। ४ उपधा। ५ सर्वनाम। ६. सङ्ख्या। ७ षट्। ८ घि। ६ सर्वनामस्थान। १० विभक्ति। ११ भ। १२ पद। १३ प्रातिपदिक। १४ सम्बुद्धि। १५ बहुवचन। (५) (क) न लुमताङ्गस्य सूत्र में 'अङ्गस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (ख) शेषो घ्यसखि सूत्र में 'शेष' पद का ग्रहण क्यों किया गया है ? (ग) हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० सूत्र में 'दीर्घात्' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (घ) अतिदेश किसे कहते हैं ? इस का क्या लाभ होता है ? (ङ) प्रत्यय का लुक् होने पर भी क्या प्रत्ययलक्षण हुआ करता है ?
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४३ (६) इस व्याकरण में एक की एक सञ्ज्ञा होती है या अनेक ? सप्रमाण लिखें। (७) ह्यत्स्यात् परस्य सूत्र में 'परस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (८) 'अपत्य' आदि शब्दों से परे ङसिं या ङस् के अकार को ह्यत्स्यात्परस्य द्वारा उकार आदेश होगा या नहीं ? स्पष्ट करें। (६) संयोगान्तस्य लोपे हि—इस श्लोक की व्याख्या करें। (१०) हरौ, त्रयाणाम्, सख्युः, पत्ये, हरिणा, कति, सखा, हरेः, भूपतये, द्वौ, सखायौ, हे सखे, प्रियययः—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक साधनप्रक्रिया लिखें। (११) नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य, शेषो घ्यसखि इन सूत्रों की व्याख्या करें। [यहां ह्रस्व इकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है] —:०:— अब ईकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का वर्णन किया जाता है— [लघु०] पाति लोकमिति पपीः=सूर्यः। दीर्घाज्जसि च (१६२)—पप्यौ २। पप्यः। हे पपीः। पपीम्। पपीन्। पप्या। पपीभ्याम् ३। पपीभिः। पप्ये। पपीभ्यः २। पप्यः २। पप्योः। दीर्घात्वान्न नुट्—पप्याम्। ङौ तु सवर्ण-दीर्घः —पपी। पप्योः। पपीषु। एवं वातप्रम्यादयः॥ व्याख्या—पा रक्षणे (अदा०) धातु से औणादिक 'ई' प्रत्यय कर द्वित्व और आकार का लोप करने से 'पपी' शब्द सिद्ध होता है[देखें—पापोः किद् द्वे च (उणा० ४३६)]। जगत् का रक्षक होने से सूर्य 'पपी' कहाता है। प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर इस से सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— पपी+स् (सुँ) इस स्थिति में सकार को रेफ और रेफ को विसर्ग करने पर 'पपीः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि यहां 'ङी' के न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) सूत्र द्वारा सुँ का लोप नहीं होता। 'पपी+औ' यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) सूत्र से प्राप्त पूर्वसवर्णदीर्घ का दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से निषेध हो कर इको यणचि (१५) से ईकार को यण्=यकार करने से 'पप्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी+अस्' (जस्) यहां पूर्व- सवर्णदीर्घ का निषेध हो ईकार को यण्=यकार करने से 'पप्यः' रूप बनता है। 'पपी+अम्' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप एकादेश करने पर 'पपीम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने से 'पपीन्' रूप बनता है। 'पपी+आ' (टा) यहां इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'पप्या' रूप बनता है। तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में 'पपीभ्याम्' बनता है। तृतीया के बहुवचन में 'पपीभिः'। सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं।
२४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् चतुर्थी के एकवचन में—'पप्ये'। इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन 'पपी + अस्' में यण् हो—'पप्यः'। 'पपी + ओस्' इस अवस्था में यण् हो कर 'पप्योः' बनता है। 'पपी + आम्' इस स्थिति में दीर्घ होने से नुट् का आगम नहीं होता। पुंल्- लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञा भी नहीं होती। तब यण् (१५) हो कर 'पप्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी + ङि' (ङि) यहां अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर 'पपी' बनता है। 'पपी + सु' (सुप्) यहां सकार को षकार (१५०) हो कर 'पपीषु' बनता है। 'पपी' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पपी पप्यौ पप्यः | प० पप्यः पपीभ्याम् पपीभ्यः द्वि० पपीम् ,, पपीन् | ष० ,, पप्योः पप्याम् तृ० पप्या पपीभ्याम् पपीभिः | स० पपी , पपीषु च० पप्ये ,, पपीभ्यः | सं० हेपपी ! हे पप्यौ ! हे पप्यः ! इसी प्रकार—ययी (मार्ग), वातप्रमी (मृग-विशेष) आदि के रूप होते हैं। [लघु०] बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी ॥ व्याख्या—'बहु' शब्द से स्त्रीलिङ्ग में बह्वादिभ्यश्च (१२५६) द्वारा ङीष् प्रत्यय करने पर 'बह्वी' शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'प्रशस्य' शब्द से द्विवचन- विभाज्योपपदे० (१२१८) सूत्र द्वारा 'ईयसुन्' प्रत्यय करने तथा प्रशस्यस्य श्रः (१२१६) से 'श्र' आदेश और उगितश्च (१२४६) से ङीप् प्रत्यय करने पर 'श्रेयसी' शब्द बनता है। अतिशयेन प्रशस्या = श्रेयसी। बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स = बहुश्रेयसी। अतिप्रशस- नीय बहुत स्त्रियों वाला पुरुष 'बहुश्रेयसी' कहाता है। यहां 'बह्वी' और 'श्रेयसी' पदों का बहुव्रीहिसमास हो गया है। स्त्रियाः पुंवत्० (६६८) सूत्र से समास में बह्वी पद को पुंवत् अर्थात् 'बहु' शब्द हो जाता है। ईयसो बहुव्रीहेर्नेति वाच्यम् (वा०) इस निषेध के कारण उपसर्जनह्रस्व नहीं होता। समासान्त 'कप्' प्रत्यय प्राप्त था, परन्तु ईयसश्च (५।४।१५६) सूत्र से निषिद्ध हो गया। समास होने के कारण प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय आते हैं— 'बहुश्रेयसी + स्' (सुं)। यहां 'श्रेयसी' शब्द ङ्यन्त है, अतः ङी से परे सुं का हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) सूत्र से लोप हो कर 'बहुश्रेयसी' बनता है। प्रथमा के द्विवचन में 'बहुश्रेयस्यौ' तथा बहुवचन में 'बहुश्रेयस्यः' बनता है। दोनों स्थानों पर पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध (१६२) हो कर यण् हो जाता है। सम्बुद्धि में 'हे बहुश्रेयसी + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१६४) यू स्त्र्याख्यौ नदी ।१।४।३॥ ईदूदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गौ नदीसञ्ज्ञौ स्तः ॥ अर्थ—ईदन्त और ऊदन्त नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द नदीसञ्ज्ञक होते हैं।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४५ व्याख्या—यू ।१।२। स्त्र्याख्यौ ।१।२। नदी ।१।१। समासः—ईश्च ऊश्च = यू ['यू+औ' इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घः, दीर्घाज्जसि च इति निषेधाभावश्छान्दसः], इतरेतर- द्वन्द्वः । स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ [स्त्रीकर्मोपपदाद् आङ्पूर्वात् चक्षिङ्धातोः कर्तरि मूलविभुजादित्वात् कप्रत्यये, ख्यावादेशे, आकारलोपे, उपपदसमासे च कृते 'स्त्र्या- ख्य'शब्दो निष्पद्यते ] । यहां शब्दशास्त्र के प्रस्तुत होने से 'यू' का विशेष्य 'शब्दौ' अध्याहृत किया जाता है अतः विशेषण से तदन्तविधि हो जायेगी । 'स्त्र्याख्यौ' का अर्थ 'स्त्रियाम्' कहने से भी सिद्ध हो सकता है अतः यहां इस के फलस्वरूप 'नित्य' शब्द का अध्याहार किया जाता है । अर्थः— (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईदान्त और ऊदन्त शब्द (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं । जिन शब्दों का केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयोग होता है वे शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग कहाते हैं । 'ग्रामणी, खलपू' आदि शब्द पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में देखे जाते हैं अतः ये नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, इन की नदीसञ्ज्ञा न होगी । नदी, गौरी, वधू आदि शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं वे यहां उदाहरण समझने चाहियें । [वस्तुतः नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्दों के विषय में विस्तारपूर्वक विचार सिद्धान्तकौमुदी के अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें ] । श्रेयसी शब्द ङ्यन्त होने से नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अतः इस की तो इस सूत्र से नदीसञ्ज्ञा निर्बाध होगी ही; परन्तु बहुश्रेयसी में श्रेयसीशब्द गौण हो जाता है, इस की इस सूत्र से नदीसञ्ज्ञा नहीं हो सकती—इस पर अग्रिम वार्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(१७) प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च ॥ पूर्वं स्त्र्याख्यस्योपसर्जनत्वेऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः ॥ अर्थः—यहां नदीसञ्ज्ञा में प्रथमलिङ्ग का भी ग्रहण होता है अर्थात् जो शब्द पहले नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं और बाद में समासवशात् गौण हो जाने से अन्य लिङ्ग में चले गये हैं उन की भी पहले के लिङ्ग के द्वारा नदीसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये । व्याख्या—इस वार्तिक से 'बहुश्रेयसी' में स्थित 'श्रेयसी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा हो जाती है । अब इस का फल अग्रिमसूत्र में दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६५) अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः ।७।३।१०७॥ सम्बुद्धौ । हे बहुश्रेयसि ! ॥ अर्थः—अम्बार्थ तथा नद्यन्त अङ्गों को सम्बुद्धि परे रहते ह्रस्व हो जाता है । व्याख्या—अम्बार्थनद्योः ।६।२। अङ्गयोः ।६।२। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) । ह्रस्वः ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। (सम्बुद्धौ च से) । अम्बा अर्थो यस्य सः=अम्बार्थः, बहुव्रीहिसमासः । अम्बार्थश्च नदी च=अम्बार्थनद्यौ, तयोः=अम्बार्थनद्योः, इतरेतर- १. इस सूत्र से वर्णों की भी नदीसञ्ज्ञा हो जाती है; अन्यथा 'तुदन्ती' आदि उदा- हरणों में आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) से नुम् न हो सकेगा [इसी सूत्र पर तत्त्वबोधिनी यहां द्रष्टव्य है] ।
२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् द्वन्द्व । ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ — (अम्बार्थनद्यो ) अम्बा=माता अर्थ वाले तथा नद्यन्त (अङ्गयो ) अङ्गो के स्थान पर (सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे रहते (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह ह्रस्व अङ्ग के अन्त्य अल् के स्थान पर होगा । अम्बार्थको के उदाहरण आगे अजन्त- स्त्रीलिङ्ग प्रकरण मे आयेंगे । ‘हे बहुश्रेयसी + सु’ यहा ‘श्रेयसी’ की नदीसञ्ज्ञा है, नद्यन्त शब्द ‘बहुश्रेयसी’ है । इस से परे सम्बुद्धि वर्त्तमान है । अत प्रकृतसूत्र से ईकार को ह्रस्व हो एङ्- ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे बहुश्रेयसि’ प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि ह्रस्व हो जाने पर ह्रस्वविधानसामर्थ्य से ह्रस्वस्य गुण (१६६) द्वारा गुण नही होगा, अन्यथा ‘अम्बार्थनद्योर्गुण ’ सूत्र ही पढ देते । द्वितीया के एकवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अम्’ यहा पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्व. (१३५) से पूर्वरूप करने पर ‘बहुश्रेयसीम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । द्वितीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अस्’(शस्) इस स्थिति मे पूर्वसवर्ण- दीर्घ हो कर तस्माच्छसो न पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने पर ‘बहुश्रेयसीन्’ प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी + आ (टा) = बहुश्रेयस्या [इको यणचि (१५) से यण्] । तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी के द्विवचन मे ‘बहुश्रेयसीभ्याम्’ सिद्ध होता है । तृतीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसीभि’ । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं । चतुर्थी के एकवचन मे बहुश्रेयसी + ए’ (ङे) इस स्थिति मे नदीसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) आङ् नद्या. ।७।३।११२॥ नद्यन्तात् परेषा ङितामाडागमः ॥ अर्थ — नद्यन्त शब्दो से परे ङित् प्रत्ययो को आट् आगम हो । व्याख्या—आट् ।१।१। (सूत्र मे यरोऽनुनासिके० द्वारा अनुनासिक हुआ है) । नद्या ।५।१। अङ्गात् ।५।१।(अङ्गस्य अधिकृत है)। ङित ।६।१। (घेर्डिति से विभक्ति- विपरिणाम कर के) । अर्थ —(नद्या ) नद्यन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित ) ङित् का अवयव (आट्) आट् हो जाता है । आट् टित् है अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा ङितो का आद्यवयव होगा । ‘बहुश्रेयसी + ए’ यहा ‘ए’ ङित् है, ‘बहुश्रेयसी’ नद्यन्त है । अत ङित् से पूर्व आट् का आगम हो— ‘बहुश्रेयसी + आ ए’ । इस स्थिति मे अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६७) आठश्च । ६।१।८७॥ आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेश । बहुश्रेयस्यै । बहुश्रेयस्या २ । नद्यन्त- त्वान्नुट्—बहुश्रेयसीनाम् ॥ अर्थ —आट् से अच् परे रहते पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४७ व्याख्या—आटः ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि से) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः—(आटः) आट् से (अचि) अच् परे रहते (पूर्व-परयोः) पूर्व +पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो । 'बहुश्रेयसी+आ ए' यहां आट् से परे 'ए' अच् वर्त्तमान है, अतः पूर्व (आ) और पर (ए) के स्थान पर ऐकार वृद्धि एकादेश हो गया । तब 'बहुश्रेयसी+ऐ' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'बहुश्रेयस्यै' प्रयोग सिद्ध हुआ । नोट—यद्यपि यहां वृद्धिरेचि (३३) से भी वृद्धि हो सकती थी; तथापि 'ऐक्षत' (आ+ईक्षत) आदि प्रयोगों में आटश्च (१६७) के विना कार्य सिद्ध नहीं हो सकता था, इस लिये इस का बनाना आवश्यक था। यहां न्यायवशात् इसे प्रवृत्त किया गया है। चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसीभ्यः' । सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+अस्' इस दशा में नदीसञ्ज्ञा हो कर आन्नद्याः (१६६) से आट् का आगम और आटश्च (१६७) से वृद्धि हो जाती है। तब 'बहुश्रेयसी+आस्' इस अवस्था में यण् हो सकार को रुँत्व विसर्ग करने से 'बहुश्रेयस्याः' प्रयोग सिद्ध होता है । षष्ठी के द्विवचन में यण् हो कर 'बहुश्रेयस्योः' बना । षष्ठी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसी+आम्' इस स्थिति में नद्यन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) सूत्र द्वारा नुट् का आगम हो 'बहुश्रेयसीनाम्' रूप सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+इ' (ङि) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६८) ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ।७।३।११६॥ नद्यन्ताद्, आवन्ताद्, 'नी'शब्दाच्च परस्य ङेराम् । बहुश्रेयस्याम् । शेषं पपीवत् ॥ अर्थः—नद्यन्त, आवन्त तथा 'नी' शब्द से परे 'ङि' के स्थान पर 'आम्' आदेश हो । व्याख्या—ङेः ।६।१। आम् ।१।१। नद्याम्नीभ्यः ।५।३। अङ्गेभ्यः ।५।३। (अङ्गस्य अधिकृत है। इस के विभक्ति और वचन का विपरिणाम हो जाता है) । समासः— नदी च आप् च नीश्च=नद्याम्न्यः, (यरोऽनुनासिके० इत्यनुनासिकः), तेभ्यः=नद्या- म्नीभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । नदी और आप् 'अङ्ग' के विशेषण हैं अतः येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा इन से तदन्तविधि हो जाती है¹ । 'आप्' के प्रत्यय होने से प्रत्यय- १. ग्रन्थकार के अनुरोध से हम ऐसा कर रहे हैं। वस्तुतः 'नी' शब्द से भी तदन्त- विधि हो जाती है; वह भी 'अङ्ग' का विशेषण हैं। अत एव 'ग्रामण्याम्' में आम् आदेश हो जाता है।
२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा भी इस से तदन्तविधि हो सकती है । अर्थ — (नद्याम्नीभ्य ) नद्यन्त, आवन्त और नी (अङ्गेभ्य ) अङ्गो से परे (ङे.) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश होता है । 'बहुश्रेयसी+इ' यहां 'बहुश्रेयसी' नद्यन्त अङ्ग है, अतः इस से परे ङि को आम् आदेश हो गया । 'बहुश्रेयसी + आम्' इस स्थिति में स्थानिवद्भाव से आम् ङित् है । अब यहां आण्नद्या (१६६) से आट् का आगम तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् का आगम युगपत् प्राप्त होते हैं । दोनों सावकाश हैं । आट्—'बहुश्रेयस्यै' आदियों में तथा नुट्—'बहुश्रेयसीनाम्' आदियों में चरितार्थ है अतः विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) से पर कार्य आट् आगम हो कर—'बहुश्रेयसी + आ आम्' हुआ । अब यद्यपि आम् परे होने से नुट् आगम प्राप्त हो सकता है और इस में आम् का अव- यव होने से आट् आगम बाधा भी नहीं डाल सकता, तथापि विप्रतिषेधे यद् बाधितं तद् बाधितमेव (अर्थात् विप्रतिषेधस्थल में जिस शास्त्र का एक बार बाध हो जाता है उस की पुनः प्रवृत्ति नहीं होती) इस नियमानुसार नुट् नहीं होता । तब आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१४) से यण् आदेश हो 'बहुश्रेयस्याम्' प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी+सु(सुप्) = बहुश्रेयसीषु । यहां आदेश-प्रत्यययो (१५०) से सकार को षकार हो जाता है । 'बहुश्रेयसी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० बहुश्रेयसी, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयस्य । द्वि० बहुश्रेयसीम्, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयसीन् । तृ० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभि । च० बहुश्रेयस्यै, बहु- श्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । प० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । ष० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयस्यो, बहुश्रेयसीनाम् । स बहुश्रेयस्याम्, बहुश्रेयस्यो, बहु- श्रेयसीषु । स० हे बहुश्रेयसि', हे बहुश्रेयस्यौ', हे बहुश्रेयस्य । [लघु०] अङ्यन्तत्वान्न सुँलोप । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ॥ व्याख्या—लक्ष दर्शने अङ्कने च (चुरा०) इस धातु से लेश्चेर्मुद् च (उणा० ४४०) सूत्र द्वारा ई प्रत्यय तथा मुँट् का आगम हो कर 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता है । लक्ष्मीमतिक्रान्त = अतिलक्ष्मी, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति समास । लक्ष्मी का अतिक्रमण करने वाला पुरुष 'अतिलक्ष्मी' कहाता है । 'अतिलक्ष्मी+स्' (सुं) । ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता; रुत्व तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'अतिलक्ष्मी' रूप बनता है । इस के शेष रूप 'बहुश्रेयसी' के समान बनते हैं । 'अतिलक्ष्मी' में 'लक्ष्मी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अब इस के गौण हो जाने पर भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) वार्तिक द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती हैं । अतः नदी के सब पूर्वोक्त कार्य हो जाते हैं । इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० अतिलक्ष्मी, अतिलक्ष्म्यौ, अतिलक्ष्म्य । द्वि० अतिलक्ष्मीम्, अतिलक्ष्म्यौ,
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४६ अतिलक्ष्मीन् । तृ० अतिलक्ष्म्या, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभिः । च० अतिलक्ष्म्यै, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । प० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । ष० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीणाम् । स० अतिलक्ष्म्याम्, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीषु । सं० हे अतिलक्ष्मि !, हे अतिलक्ष्म्यौ !, हे अतिलक्ष्म्यः ! । [लघु०] प्रधीः ॥ व्याख्या—प्रध्यायतीति प्रधीः (विशेष रूप से मनन करने वाला) । 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च इस वार्त्तिक द्वारा क्विँप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर सिद्ध होता है । व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने के कारण इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती है । 'प्रधी + स्' (सुँ) यहां ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) द्वारा सकार का लोप न हुआ । रुँत्व विसर्ग हो कर—'प्रधीः' । 'प्रधी + औ' इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ के प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर अग्रिम अपवादसूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियँङुवँङौ। ६।४।७७॥ श्नुप्रत्ययान्तस्य, इवर्णोवर्णान्तस्य धातोः, भ्रू इत्यस्य च, अङ्गस्य इयँङुवँङौ स्तोऽजादौ प्रत्यये परे । इति प्राप्ते— अर्थः—अजादि प्रत्यय परे होने पर श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त धातु रूप तथा भ्रू रूप अङ्गों के स्थान पर इयङ् और उवङ् आदेश होते हैं । व्याख्या—अचि ।७।१। श्नु-धातु-भ्रुवाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । य्वोः ।६।२। इयँङुवँङौ ।१।२। 'श्नु, धातु, भ्रू' ये सब अङ्ग होने चाहियें । अङ्गसञ्ज्ञा प्रत्यय परे होने पर ही हुआ करती है, अतः 'प्रत्यये' पद का अध्याहार हो 'अचि' का विशेषण बना कर यस्मिन्विधिस्त- दादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि करने पर 'अजादौ प्रत्यये' बन जायेगा । श्नुश्च धातु- श्च भ्रूश्च—श्नु-धातु-भ्रुवः, तेषाम् = श्नु-धातु-भ्रुवाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'श्नु' यह प्रत्यय है, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियमानुसार तदन्त अर्थात् श्नुप्रत्ययान्त का ही ग्रहण होगा । 'भ्रू' यह शब्द है, भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरूञ्च डूंः (उणा० २२७) द्वारा डू प्रत्यय करने पर इस की निष्पत्ति होती है । इस का विशेष वर्णन आगे अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरण में किया जायेगा । इश्च उश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्वः, तयोः = य्वोः । यह 'श्नु-धातु-भ्रुवाम्' पद के 'धातु' अंश का ही विशेषण है, क्योंकि श्नु और भ्रू के सदा उवर्णान्त होने से उन के साथ इस का सम्बन्ध नहीं हो सकता । 'धातु' अंश का विशेषण होने से 'य्वोः' से तदन्तविधि हो कर 'इवर्णान्तस्य उवर्णान्तस्य च धातोः' ऐसा बन जाता है । इस प्रकार समुचित अर्थ यह होता है—(अचि) अजादि प्रत्यय परे होने पर (श्नु-धातु-भ्रुवाम्) श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त
२५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
धातु रूप तथा भ्रू शब्द (अङ्गानाम्) इन अङ्गा के स्थान पर (इयङ्हुवेंडौ) इयङ् और उवँङ् आदेश होते हैं। ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा ये आदेश अङ्ग के अन्त्य इकार उकार के स्थान पर होते हैं। स्थानेऽन्तरतम (१७) से इवर्ण को इयङ् तथा उवर्ण को उवँङ् आदेश होगा। इन आदेशों में ङ् की इत्संज्ञा हो जाती है इय्, उव् शेष रहते हैं। 'प्रधी+औ' यहाँ औ' यह अजादि प्रत्यय परे है, प्रधी में 'धी' इवर्णान्त धातु है। [यद्यपि धातु 'ध्यै' था तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार इसे भी धातु मान लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि कृत्प्रत्ययान्त हो जाने से यह प्राति- पदिक हो गया है, तथापि णिब्वन्ता धातुत्वं न जहति इस से इस का धातुत्व भी अक्षत रह जाता है।] तो प्रकृतसूत्र से इस के ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध कर यण् विधान करता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२००) एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ।६।४।८२॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णः, तदन्तो यो धातुः, तदन्त- स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अजादौ प्रत्यये परे । प्रध्यौ । प्रध्यम् । प्रध्यः । प्रध्यि । शेषं पपीवत् ॥ अर्थ —धातु का अवयव जो संयोग वह पूर्व में नहीं है जिस इवर्ण के, वह इवर्ण है अन्त में जिस धातु के, वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेक अचो वाला अङ्ग, उस के स्थान पर यण् हो अजादि प्रत्यय परे होने पर। व्याख्या—एः ।६।१। अनेकाचः ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। यण् ।१।१। (इणो यण् से) । धातोः ।६।१। (अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० से। श्नु और भ्रू का— उवर्णान्त होने से 'एः' के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता अतः उन का अनुवर्त्तन नहीं किया जाता) । अचि ।७।१। (अचि श्नुधातु० से) । 'एः' यह षष्ठी का एकवचन है। इस का अर्थ है—'इवर्णस्य'। 'धातोः' पद आवर्तित [दो बार पढ़ा हुआ] किया जाता है। एक 'धातोः' पद 'एः' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'एः' से तदन्तविधि होकर 'इवर्णान्तस्य धातोः' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातोः' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ अन्वित होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'एर्धातोः' (इवर्णान्तस्य धातोः) यह विशेषण है। अतः विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'इवर्णा- न्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ होता है। 'अनेकाचः' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। अनेके अचो यस्य यस्मिन् वा सोऽनेकाच्, तस्य = अनेकाचः, बहुव्रीहिसमास। 'असंयोग- पूर्वस्य' का 'एः' के साथ सामानाधिकरण्य है। नास्ति संयोगः पूर्वो यस्य सोऽसंयोगपूर्वः, नञ्बहुव्रीहिसमास। इस प्रकार यह अर्थ हुआ—(धातोः, असंयोगपूर्वस्य) धातु का अवयव संयोग जिस के पूर्व में नहीं ऐसा (एः) जो इवर्ण, वह है अन्त में जिस में ऐसी (धातोः) जो धातु, वह है अन्त में जिस के ऐसा (अनेकाचः) जो अनेक अचो वाला (अङ्गस्य) अङ्ग, उस के स्थान पर (यण्) यण् आदेश होता है (अचि) अजादि