भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 248

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३३ बहुवचन में 'सखि + अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ होकर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार करने पर—'सखीन्' प्रयोग सिद्ध हुआ। ध्यान रहे कि शस् के सर्वनामस्थान न होने से णिद्वद्भाव नहीं होगा। तृतीया के एकवचन में 'सखि + आ' (टा) इस स्थिति में इको यणचि (१५) से यण् आदेश हो—'सख्या' प्रयोग सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि सखि की घिसञ्ज्ञा न होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा 'टा' को 'ना' नहीं होता। तृतीया के द्विवचन में 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभिः'। 'सखि + ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा के न होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण नहीं होता। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'सख्ये' प्रयोग बनता है। 'सखि + अस्' (ङसि) यहां इको यणचि (१५) से इकार को यकार हो— 'सख्य् + अस्' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१८३) ख्यत्यात्परस्य ।६।१।१०८॥ 'खि-ति'शब्दाभ्यां 'खी-ती'शब्दाभ्यां कृतयणादेशाभ्यां परस्य ङसिँ- ङसोरत उः । सख्युः २ ॥ अर्थः—जिन के स्थान पर यण् किया गया हो ऐसे खिशब्द, तिशब्द, खीशब्द अथवा तीशब्द से परे ङसिँ और ङस् के अकार को उकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—ख्यत्यात् ।५।१। परस्य ।६।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च से)। अतः ।६।१। (एङः पदान्तादति से, विभक्तिविपरिणाम कर के)। उत् ।१।१। (ऋत उत् से)। समासः—ख्यञ्च त्यञ्च = ख्यत्यम्, तस्मात् = ख्यत्यात्, समाहार- द्वन्द्वः। यकारादकार उच्चारणार्थः¹। 'खि' या 'खी' शब्द के इवर्ण को यण् करने से ख्य् और 'ति' या 'ती' शब्द के इवर्ण को यण् करने ये त्य् रूप बनता है। उसी का यहां ग्रहण करना चाहिये। 'ख्यत्यात्' यह पञ्चम्यन्त है; अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१) सूत्र से स्वयं ही ख्य् और त्य् से परे कार्य होना था, पुनः मुनि का 'परस्य' ग्रहण करना एकः पूर्वपरयोः (६.१.८१)अधिकार की निवृत्ति के लिये है। अर्थः—(ख्यत्यात्) यणादेश किये हुए खि, खी और ति, ती शब्दों से (परस्य) परे (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ और ङस् के (अतः) अकार के स्थान पर (उत्) उकार आदेश होता है। 'सख्य् + अस्' यहां यणादेश किया हुआ 'खि' शब्द है; अतः इस से परे ङसिँ के अकार को उकार हो—'सख्य् + उस्' बना। अब सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'सख्युः' प्रयोग सिद्ध हुआ। द्विवचन में चतुर्थी के समान 'सखिभ्याम्'। बहुवचन में 'सखिभ्यः'। १ ध्यान रहे कि यदि यहां अकार को उच्चारणार्थ न मान 'ख्य' और 'त्य' शब्दों का ग्रहण कर 'सङ्ख्य' 'अपत्य' आदि शब्दों में इस की प्रवृत्ति मानेंगे तो सख्य्युर्यः (११५७) पत्युर्नो यज्ञसंयोगे (४.१.३३), आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति (६.४.१५१) इत्यादि निर्देश विपरीत पड़ेंगे।