भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 633 में से

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पृष्ठ 249

२३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् षष्ठी के एकवचन (ङस्) मे 'सख्यु' बनता है। 'सखि + ओस्' यहा यण् हो कर रुँत्व विसर्ग करने से 'सख्योः' बना। 'सखि + आम्' इस स्थिति मे ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् का आगम हो अनुबन्ध- लोप कर नामि (१४६) मे दीर्घ करने पर 'सखीनाम्' रूप बनता है। 'सखि + ङि' (ङि) यहा घिसञ्ज्ञा न होने से अच्च घेः (१७४) सूत्र प्रवृत्त नही होता। तब सवर्ण दीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१८४) औत् ।७।३।११८॥ इदुद्भ्या परस्य ङेरौत्। सख्यौ। शेष हरिवत् ॥ अर्थ —ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार से परे 'ङि' को 'औ' हो जाता है। व्याख्या—इदुद्भ्याम् ।५।२। (इदुद्भ्याम् ५) । ङे ।६।१। (ङेराम्नद्याम्नीभ्य स) । औत् ।१।१। अर्थ —(इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार तथा ह्रस्व उकार से परे (ङे ) ङि के स्थान पर (औत्) औकार¹ आदेश होता है। यह उत्सर्ग-सूत्र (सामान्य-सूत्र) है। अच्च घे (१७४) इस का अपवाद है। अतः उस के विषय मे इस की प्रवृत्ति नही होती। उकार का उदाहरण नही मिलता, उस का यहा ग्रहण अच्च घेः (१७४) आदि अग्रिम-सूत्रो मे अनुवृत्ति के लिये है। 'सखि + ङि' यहा प्रकृत-सूत्र से इकार को औकार आदेश हो इको यणचि (१५) से यण् करने पर 'सख्यौ' रूप बनता है। द्विवचन मे 'सख्योः' षष्ठी के द्विवचन के समान बनता है। बहुवचन मे सखि + सु = सखिषु (आदेशप्रत्यययोः)। समग्र रूपमाला यथा— प्र० सखा सखायौ सखायः । प० सख्युः सखिभ्याम् सखिभ्यः द्वि० सखायम् ,, सखीन् । ष० ,, सख्योः सखीनाम् तृ० सख्या सखिभ्याम् सखिभिः । स० सख्यौ ,, सखिषु च० सख्ये ,, सखिभ्यः । सं० हे सखे ! हे सखायौ ! हे सखायः ! अब 'पति' शब्द का वर्णन करते हैं। 'पति' का अर्थ 'स्वामी' है। प्रथम दो विभक्तियो मे 'हरि' शब्द के समान प्रक्रिया होती है। तृतीया के एकवचन मे शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस पर अग्रिम-सूत्र मे नियम करते हैं— [लघु०] नियम-सूत्रम्—(१८५) पतिः समास एव ।१।४।८॥ घि-सञ्ज्ञः। पत्या। पत्ये। पत्युः २। पत्यौ। शेष हरिवत्। समासे तु—भूपतये ॥ १ औत् मे तकार तपर है जो तत्काल के लिये है। यहा पर श्री पं० श्रीधरानन्द जी शास्त्री भ्रान्तिवश तकार को इत् लिखते और उस का प्रयोजन मवदिश करना बताते हैं।

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