भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४६ अतिलक्ष्मीन् । तृ० अतिलक्ष्म्‍या, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभिः । च० अतिलक्ष्म्यै, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । प० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । ष० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीणाम् । स० अतिलक्ष्म्याम्, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीषु । सं० हे अतिलक्ष्मि !, हे अतिलक्ष्म्यौ !, हे अतिलक्ष्म्यः ! । [लघु०] प्रधीः ॥ व्याख्या—प्रध्यायतीति प्रधीः (विशेष रूप से मनन करने वाला) । 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च इस वार्त्तिक द्वारा क्विँप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर सिद्ध होता है । व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने के कारण इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती है । 'प्रधी + स्' (सुँ) यहां ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) द्वारा सकार का लोप न हुआ । रुँत्व विसर्ग हो कर—'प्रधीः' । 'प्रधी + औ' इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ के प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर अग्रिम अपवादसूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियँङुवँङौ। ६।४।७७॥ श्नुप्रत्ययान्तस्य, इवर्णोवर्णान्तस्य धातोः, भ्रू इत्यस्य च, अङ्गस्य इयँङुवँङौ स्तोऽजादौ प्रत्यये परे । इति प्राप्ते— अर्थः—अजादि प्रत्यय परे होने पर श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त धातु रूप तथा भ्रू रूप अङ्गों के स्थान पर इयङ् और उवङ् आदेश होते हैं । व्याख्या—अचि ।७।१। श्नु-धातु-भ्रुवाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । य्वोः ।६।२। इयँङुवँङौ ।१।२। 'श्नु, धातु, भ्रू' ये सब अङ्ग होने चाहियें । अङ्गसञ्ज्ञा प्रत्यय परे होने पर ही हुआ करती है, अतः 'प्रत्यये' पद का अध्याहार हो 'अचि' का विशेषण बना कर यस्मिन्विधिस्त- दादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि करने पर 'अजादौ प्रत्यये' बन जायेगा । श्नुश्च धातु- श्च भ्रूश्च—श्नु-धातु-भ्रुवः, तेषाम् = श्नु-धातु-भ्रुवाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'श्नु' यह प्रत्यय है, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियमानुसार तदन्त अर्थात् श्नुप्रत्ययान्त का ही ग्रहण होगा । 'भ्रू' यह शब्द है, भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरूञ्च डूंः (उणा० २२७) द्वारा डू प्रत्यय करने पर इस की निष्पत्ति होती है । इस का विशेष वर्णन आगे अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरण में किया जायेगा । इश्च उश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्वः, तयोः = य्वोः । यह 'श्नु-धातु-भ्रुवाम्' पद के 'धातु' अंश का ही विशेषण है, क्योंकि श्नु और भ्रू के सदा उवर्णान्त होने से उन के साथ इस का सम्बन्ध नहीं हो सकता । 'धातु' अंश का विशेषण होने से 'य्वोः' से तदन्तविधि हो कर 'इवर्णान्तस्य उवर्णान्तस्य च धातोः' ऐसा बन जाता है । इस प्रकार समुचित अर्थ यह होता है—(अचि) अजादि प्रत्यय परे होने पर (श्नु-धातु-भ्रुवाम्) श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त