लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा भी इस से तदन्तविधि हो सकती है । अर्थ — (नद्याम्नीभ्य ) नद्यन्त, आवन्त और नी (अङ्गेभ्य ) अङ्गो से परे (ङे.) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश होता है । 'बहुश्रेयसी+इ' यहां 'बहुश्रेयसी' नद्यन्त अङ्ग है, अतः इस से परे ङि को आम् आदेश हो गया । 'बहुश्रेयसी + आम्' इस स्थिति में स्थानिवद्भाव से आम् ङित् है । अब यहां आण्नद्या (१६६) से आट् का आगम तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् का आगम युगपत् प्राप्त होते हैं । दोनों सावकाश हैं । आट्—'बहुश्रेयस्यै' आदियों में तथा नुट्—'बहुश्रेयसीनाम्' आदियों में चरितार्थ है अतः विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) से पर कार्य आट् आगम हो कर—'बहुश्रेयसी + आ आम्' हुआ । अब यद्यपि आम् परे होने से नुट् आगम प्राप्त हो सकता है और इस में आम् का अव- यव होने से आट् आगम बाधा भी नहीं डाल सकता, तथापि विप्रतिषेधे यद् बाधितं तद् बाधितमेव (अर्थात् विप्रतिषेधस्थल में जिस शास्त्र का एक बार बाध हो जाता है उस की पुनः प्रवृत्ति नहीं होती) इस नियमानुसार नुट् नहीं होता । तब आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१४) से यण् आदेश हो 'बहुश्रेयस्याम्' प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी+सु(सुप्) = बहुश्रेयसीषु । यहां आदेश-प्रत्यययो (१५०) से सकार को षकार हो जाता है । 'बहुश्रेयसी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० बहुश्रेयसी, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयस्य । द्वि० बहुश्रेयसीम्, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयसीन् । तृ० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभि । च० बहुश्रेयस्यै, बहु- श्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । प० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । ष० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयस्यो, बहुश्रेयसीनाम् । स बहुश्रेयस्याम्, बहुश्रेयस्यो, बहु- श्रेयसीषु । स० हे बहुश्रेयसि', हे बहुश्रेयस्यौ', हे बहुश्रेयस्य । [लघु०] अङ्यन्तत्वान्न सुँलोप । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ॥ व्याख्या—लक्ष दर्शने अङ्कने च (चुरा०) इस धातु से लेश्चेर्मुद् च (उणा० ४४०) सूत्र द्वारा ई प्रत्यय तथा मुँट् का आगम हो कर 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता है । लक्ष्मीमतिक्रान्त = अतिलक्ष्मी, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति समास । लक्ष्मी का अतिक्रमण करने वाला पुरुष 'अतिलक्ष्मी' कहाता है । 'अतिलक्ष्मी+स्' (सुं) । ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता; रुत्व तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'अतिलक्ष्मी' रूप बनता है । इस के शेष रूप 'बहुश्रेयसी' के समान बनते हैं । 'अतिलक्ष्मी' में 'लक्ष्मी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अब इस के गौण हो जाने पर भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) वार्तिक द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती हैं । अतः नदी के सब पूर्वोक्त कार्य हो जाते हैं । इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० अतिलक्ष्मी, अतिलक्ष्म्यौ, अतिलक्ष्म्य । द्वि० अतिलक्ष्मीम्, अतिलक्ष्म्यौ,