लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४७ व्याख्या—आटः ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि से) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः—(आटः) आट् से (अचि) अच् परे रहते (पूर्व-परयोः) पूर्व +पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो । 'बहुश्रेयसी+आ ए' यहां आट् से परे 'ए' अच् वर्त्तमान है, अतः पूर्व (आ) और पर (ए) के स्थान पर ऐकार वृद्धि एकादेश हो गया । तब 'बहुश्रेयसी+ऐ' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'बहुश्रेयस्यै' प्रयोग सिद्ध हुआ । नोट—यद्यपि यहां वृद्धिरेचि (३३) से भी वृद्धि हो सकती थी; तथापि 'ऐक्षत' (आ+ईक्षत) आदि प्रयोगों में आटश्च (१६७) के विना कार्य सिद्ध नहीं हो सकता था, इस लिये इस का बनाना आवश्यक था। यहां न्यायवशात् इसे प्रवृत्त किया गया है। चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसीभ्यः' । सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+अस्' इस दशा में नदीसञ्ज्ञा हो कर आन्नद्याः (१६६) से आट् का आगम और आटश्च (१६७) से वृद्धि हो जाती है। तब 'बहुश्रेयसी+आस्' इस अवस्था में यण् हो सकार को रुँत्व विसर्ग करने से 'बहुश्रेयस्याः' प्रयोग सिद्ध होता है । षष्ठी के द्विवचन में यण् हो कर 'बहुश्रेयस्योः' बना । षष्ठी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसी+आम्' इस स्थिति में नद्यन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) सूत्र द्वारा नुट् का आगम हो 'बहुश्रेयसीनाम्' रूप सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+इ' (ङि) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६८) ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ।७।३।११६॥ नद्यन्ताद्, आवन्ताद्, 'नी'शब्दाच्च परस्य ङेराम् । बहुश्रेयस्याम् । शेषं पपीवत् ॥ अर्थः—नद्यन्त, आवन्त तथा 'नी' शब्द से परे 'ङि' के स्थान पर 'आम्' आदेश हो । व्याख्या—ङेः ।६।१। आम् ।१।१। नद्याम्नीभ्यः ।५।३। अङ्गेभ्यः ।५।३। (अङ्गस्य अधिकृत है। इस के विभक्ति और वचन का विपरिणाम हो जाता है) । समासः— नदी च आप् च नीश्च=नद्याम्न्यः, (यरोऽनुनासिके० इत्यनुनासिकः), तेभ्यः=नद्या- म्नीभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । नदी और आप् 'अङ्ग' के विशेषण हैं अतः येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा इन से तदन्तविधि हो जाती है¹ । 'आप्' के प्रत्यय होने से प्रत्यय- १. ग्रन्थकार के अनुरोध से हम ऐसा कर रहे हैं। वस्तुतः 'नी' शब्द से भी तदन्त- विधि हो जाती है; वह भी 'अङ्ग' का विशेषण हैं। अत एव 'ग्रामण्याम्' में आम् आदेश हो जाता है।