लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् द्वन्द्व । ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ — (अम्बार्थनद्यो ) अम्बा=माता अर्थ वाले तथा नद्यन्त (अङ्गयो ) अङ्गो के स्थान पर (सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे रहते (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह ह्रस्व अङ्ग के अन्त्य अल् के स्थान पर होगा । अम्बार्थको के उदाहरण आगे अजन्त- स्त्रीलिङ्ग प्रकरण मे आयेंगे । ‘हे बहुश्रेयसी + सु’ यहा ‘श्रेयसी’ की नदीसञ्ज्ञा है, नद्यन्त शब्द ‘बहुश्रेयसी’ है । इस से परे सम्बुद्धि वर्त्तमान है । अत प्रकृतसूत्र से ईकार को ह्रस्व हो एङ्- ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे बहुश्रेयसि’ प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि ह्रस्व हो जाने पर ह्रस्वविधानसामर्थ्य से ह्रस्वस्य गुण (१६६) द्वारा गुण नही होगा, अन्यथा ‘अम्बार्थनद्योर्गुण ’ सूत्र ही पढ देते । द्वितीया के एकवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अम्’ यहा पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्व. (१३५) से पूर्वरूप करने पर ‘बहुश्रेयसीम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । द्वितीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अस्’(शस्) इस स्थिति मे पूर्वसवर्ण- दीर्घ हो कर तस्माच्छसो न पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने पर ‘बहुश्रेयसीन्’ प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी + आ (टा) = बहुश्रेयस्या [इको यणचि (१५) से यण्] । तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी के द्विवचन मे ‘बहुश्रेयसीभ्याम्’ सिद्ध होता है । तृतीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसीभि’ । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं । चतुर्थी के एकवचन मे बहुश्रेयसी + ए’ (ङे) इस स्थिति मे नदीसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) आङ् नद्या. ।७।३।११२॥ नद्यन्तात् परेषा ङितामाडागमः ॥ अर्थ — नद्यन्त शब्दो से परे ङित् प्रत्ययो को आट् आगम हो । व्याख्या—आट् ।१।१। (सूत्र मे यरोऽनुनासिके० द्वारा अनुनासिक हुआ है) । नद्या ।५।१। अङ्गात् ।५।१।(अङ्गस्य अधिकृत है)। ङित ।६।१। (घेर्डिति से विभक्ति- विपरिणाम कर के) । अर्थ —(नद्या ) नद्यन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित ) ङित् का अवयव (आट्) आट् हो जाता है । आट् टित् है अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा ङितो का आद्यवयव होगा । ‘बहुश्रेयसी + ए’ यहा ‘ए’ ङित् है, ‘बहुश्रेयसी’ नद्यन्त है । अत ङित् से पूर्व आट् का आगम हो— ‘बहुश्रेयसी + आ ए’ । इस स्थिति मे अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६७) आठश्च । ६।१।८७॥ आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेश । बहुश्रेयस्यै । बहुश्रेयस्या २ । नद्यन्त- त्वान्नुट्—बहुश्रेयसीनाम् ॥ अर्थ —आट् से अच् परे रहते पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो ।