भारतकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् द्वन्द्व । ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से इस से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ — (अम्बार्थनद्यो ) अम्बा=माता अर्थ वाले तथा नद्यन्त (अङ्गयो ) अङ्गो के स्थान पर (सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे रहते (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है । अलोऽन्त्यपरिभाषा से यह ह्रस्व अङ्ग के अन्त्य अल् के स्थान पर होगा । अम्बार्थको के उदाहरण आगे अजन्त- स्त्रीलिङ्ग प्रकरण मे आयेंगे । ‘हे बहुश्रेयसी + सु’ यहा ‘श्रेयसी’ की नदीसञ्ज्ञा है, नद्यन्त शब्द ‘बहुश्रेयसी’ है । इस से परे सम्बुद्धि वर्त्तमान है । अत प्रकृतसूत्र से ईकार को ह्रस्व हो एङ्- ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि के हल् का लोप करने पर ‘हे बहुश्रेयसि’ प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि ह्रस्व हो जाने पर ह्रस्वविधानसामर्थ्य से ह्रस्वस्य गुण (१६६) द्वारा गुण नही होगा, अन्यथा ‘अम्बार्थनद्योर्गुण ’ सूत्र ही पढ देते । द्वितीया के एकवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अम्’ यहा पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्व. (१३५) से पूर्वरूप करने पर ‘बहुश्रेयसीम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । द्वितीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसी + अस्’(शस्) इस स्थिति मे पूर्वसवर्ण- दीर्घ हो कर तस्माच्छसो न पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने पर ‘बहुश्रेयसीन्’ प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी + आ (टा) = बहुश्रेयस्या [इको यणचि (१५) से यण्] । तृतीया, चतुर्थी तथा पञ्चमी के द्विवचन मे ‘बहुश्रेयसीभ्याम्’ सिद्ध होता है । तृतीया के बहुवचन मे ‘बहुश्रेयसीभि’ । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं । चतुर्थी के एकवचन मे बहुश्रेयसी + ए’ (ङे) इस स्थिति मे नदीसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) आङ् नद्या. ।७।३।११२॥ नद्यन्तात् परेषा ङितामाडागमः ॥ अर्थ — नद्यन्त शब्दो से परे ङित् प्रत्ययो को आट् आगम हो । व्याख्या—आट् ।१।१। (सूत्र मे यरोऽनुनासिके० द्वारा अनुनासिक हुआ है) । नद्या ।५।१। अङ्गात् ।५।१।(अङ्गस्य अधिकृत है)। ङित ।६।१। (घेर्डिति से विभक्ति- विपरिणाम कर के) । अर्थ —(नद्या ) नद्यन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित ) ङित् का अवयव (आट्) आट् हो जाता है । आट् टित् है अत आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा ङितो का आद्यवयव होगा । ‘बहुश्रेयसी + ए’ यहा ‘ए’ ङित् है, ‘बहुश्रेयसी’ नद्यन्त है । अत ङित् से पूर्व आट् का आगम हो— ‘बहुश्रेयसी + आ ए’ । इस स्थिति मे अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६७) आठश्च । ६।१।८७॥ आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेश । बहुश्रेयस्यै । बहुश्रेयस्या २ । नद्यन्त- त्वान्नुट्—बहुश्रेयसीनाम् ॥ अर्थ —आट् से अच् परे रहते पूर्व + पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४७ व्याख्या—आटः ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अचि ।७।१। (इको यणचि से) । पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व-परयोः यह अधिकृत है) । वृद्धिः ।१।१। (वृद्धिरेचि से) । अर्थः—(आटः) आट् से (अचि) अच् परे रहते (पूर्व-परयोः) पूर्व +पर के स्थान पर (एकः) एक (वृद्धिः) वृद्धि आदेश हो । 'बहुश्रेयसी+आ ए' यहां आट् से परे 'ए' अच् वर्त्तमान है, अतः पूर्व (आ) और पर (ए) के स्थान पर ऐकार वृद्धि एकादेश हो गया । तब 'बहुश्रेयसी+ऐ' इस दशा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'बहुश्रेयस्यै' प्रयोग सिद्ध हुआ । नोट—यद्यपि यहां वृद्धिरेचि (३३) से भी वृद्धि हो सकती थी; तथापि 'ऐक्षत' (आ+ईक्षत) आदि प्रयोगों में आटश्च (१६७) के विना कार्य सिद्ध नहीं हो सकता था, इस लिये इस का बनाना आवश्यक था। यहां न्यायवशात् इसे प्रवृत्त किया गया है। चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसीभ्यः' । सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+अस्' इस दशा में नदीसञ्ज्ञा हो कर आन्नद्याः (१६६) से आट् का आगम और आटश्च (१६७) से वृद्धि हो जाती है। तब 'बहुश्रेयसी+आस्' इस अवस्था में यण् हो सकार को रुँत्व विसर्ग करने से 'बहुश्रेयस्याः' प्रयोग सिद्ध होता है । षष्ठी के द्विवचन में यण् हो कर 'बहुश्रेयस्योः' बना । षष्ठी के बहुवचन में 'बहुश्रेयसी+आम्' इस स्थिति में नद्यन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) सूत्र द्वारा नुट् का आगम हो 'बहुश्रेयसीनाम्' रूप सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में 'बहुश्रेयसी+इ' (ङि) इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६८) ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ।७।३।११६॥ नद्यन्ताद्, आवन्ताद्, 'नी'शब्दाच्च परस्य ङेराम् । बहुश्रेयस्याम् । शेषं पपीवत् ॥ अर्थः—नद्यन्त, आवन्त तथा 'नी' शब्द से परे 'ङि' के स्थान पर 'आम्' आदेश हो । व्याख्या—ङेः ।६।१। आम् ।१।१। नद्याम्नीभ्यः ।५।३। अङ्गेभ्यः ।५।३। (अङ्गस्य अधिकृत है। इस के विभक्ति और वचन का विपरिणाम हो जाता है) । समासः— नदी च आप् च नीश्च=नद्याम्न्यः, (यरोऽनुनासिके० इत्यनुनासिकः), तेभ्यः=नद्या- म्नीभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । नदी और आप् 'अङ्ग' के विशेषण हैं अतः येन विधिस्तदन्तस्य (१.१.७१) द्वारा इन से तदन्तविधि हो जाती है¹ । 'आप्' के प्रत्यय होने से प्रत्यय- १. ग्रन्थकार के अनुरोध से हम ऐसा कर रहे हैं। वस्तुतः 'नी' शब्द से भी तदन्त- विधि हो जाती है; वह भी 'अङ्ग' का विशेषण हैं। अत एव 'ग्रामण्याम्' में आम् आदेश हो जाता है।

२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा भी इस से तदन्तविधि हो सकती है । अर्थ — (नद्याम्नीभ्य ) नद्यन्त, आवन्त और नी (अङ्गेभ्य ) अङ्गो से परे (ङे.) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश होता है । 'बहुश्रेयसी+इ' यहां 'बहुश्रेयसी' नद्यन्त अङ्ग है, अतः इस से परे ङि को आम् आदेश हो गया । 'बहुश्रेयसी + आम्' इस स्थिति में स्थानिवद्भाव से आम् ङित् है । अब यहां आण्नद्या (१६६) से आट् का आगम तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् का आगम युगपत् प्राप्त होते हैं । दोनों सावकाश हैं । आट्—'बहुश्रेयस्यै' आदियों में तथा नुट्—'बहुश्रेयसीनाम्' आदियों में चरितार्थ है अतः विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) से पर कार्य आट् आगम हो कर—'बहुश्रेयसी + आ आम्' हुआ । अब यद्यपि आम् परे होने से नुट् आगम प्राप्त हो सकता है और इस में आम् का अव- यव होने से आट् आगम बाधा भी नहीं डाल सकता, तथापि विप्रतिषेधे यद् बाधितं तद् बाधितमेव (अर्थात् विप्रतिषेधस्थल में जिस शास्त्र का एक बार बाध हो जाता है उस की पुनः प्रवृत्ति नहीं होती) इस नियमानुसार नुट् नहीं होता । तब आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१४) से यण् आदेश हो 'बहुश्रेयस्याम्' प्रयोग बनता है । बहुश्रेयसी+सु(सुप्) = बहुश्रेयसीषु । यहां आदेश-प्रत्यययो (१५०) से सकार को षकार हो जाता है । 'बहुश्रेयसी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा— प्र० बहुश्रेयसी, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयस्य । द्वि० बहुश्रेयसीम्, बहुश्रेयस्यौ, बहुश्रेयसीन् । तृ० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभि । च० बहुश्रेयस्यै, बहु- श्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । प० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयसीभ्याम्, बहुश्रेयसीभ्य । ष० बहुश्रेयस्या, बहुश्रेयस्यो, बहुश्रेयसीनाम् । स बहुश्रेयस्याम्, बहुश्रेयस्यो, बहु- श्रेयसीषु । स० हे बहुश्रेयसि', हे बहुश्रेयस्यौ', हे बहुश्रेयस्य । [लघु०] अङ्यन्तत्वान्न सुँलोप । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ॥ व्याख्या—लक्ष दर्शने अङ्कने च (चुरा०) इस धातु से लेश्चेर्मुद् च (उणा० ४४०) सूत्र द्वारा ई प्रत्यय तथा मुँट् का आगम हो कर 'लक्ष्मी' शब्द निष्पन्न होता है । लक्ष्मीमतिक्रान्त = अतिलक्ष्मी, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति समास । लक्ष्मी का अतिक्रमण करने वाला पुरुष 'अतिलक्ष्मी' कहाता है । 'अतिलक्ष्मी+स्' (सुं) । ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता; रुत्व तथा रेफ को विसर्ग करने पर 'अतिलक्ष्मी' रूप बनता है । इस के शेष रूप 'बहुश्रेयसी' के समान बनते हैं । 'अतिलक्ष्मी' में 'लक्ष्मी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अब इस के गौण हो जाने पर भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) वार्तिक द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती हैं । अतः नदी के सब पूर्वोक्त कार्य हो जाते हैं । इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० अतिलक्ष्मी, अतिलक्ष्म्यौ, अतिलक्ष्म्य । द्वि० अतिलक्ष्मीम्, अतिलक्ष्म्यौ,

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४६ अतिलक्ष्मीन् । तृ० अतिलक्ष्म्‍या, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभिः । च० अतिलक्ष्म्यै, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । प० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्मीभ्याम्, अतिलक्ष्मीभ्यः । ष० अतिलक्ष्म्याः, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीणाम् । स० अतिलक्ष्म्याम्, अतिलक्ष्म्योः, अतिलक्ष्मीषु । सं० हे अतिलक्ष्मि !, हे अतिलक्ष्म्यौ !, हे अतिलक्ष्म्यः ! । [लघु०] प्रधीः ॥ व्याख्या—प्रध्यायतीति प्रधीः (विशेष रूप से मनन करने वाला) । 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च इस वार्त्तिक द्वारा क्विँप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर सिद्ध होता है । व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने के कारण इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती है । 'प्रधी + स्' (सुँ) यहां ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) द्वारा सकार का लोप न हुआ । रुँत्व विसर्ग हो कर—'प्रधीः' । 'प्रधी + औ' इस अवस्था में पूर्वसवर्णदीर्घ के प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से उस का निषेध हो जाता है । पुनः इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर अग्रिम अपवादसूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६६) अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियँङुवँङौ। ६।४।७७॥ श्नुप्रत्ययान्तस्य, इवर्णोवर्णान्तस्य धातोः, भ्रू इत्यस्य च, अङ्गस्य इयँङुवँङौ स्तोऽजादौ प्रत्यये परे । इति प्राप्ते— अर्थः—अजादि प्रत्यय परे होने पर श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त धातु रूप तथा भ्रू रूप अङ्गों के स्थान पर इयङ् और उवङ् आदेश होते हैं । व्याख्या—अचि ।७।१। श्नु-धातु-भ्रुवाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । य्वोः ।६।२। इयँङुवँङौ ।१।२। 'श्नु, धातु, भ्रू' ये सब अङ्ग होने चाहियें । अङ्गसञ्ज्ञा प्रत्यय परे होने पर ही हुआ करती है, अतः 'प्रत्यये' पद का अध्याहार हो 'अचि' का विशेषण बना कर यस्मिन्विधिस्त- दादावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि करने पर 'अजादौ प्रत्यये' बन जायेगा । श्नुश्च धातु- श्च भ्रूश्च—श्नु-धातु-भ्रुवः, तेषाम् = श्नु-धातु-भ्रुवाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'श्नु' यह प्रत्यय है, प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् के नियमानुसार तदन्त अर्थात् श्नुप्रत्ययान्त का ही ग्रहण होगा । 'भ्रू' यह शब्द है, भ्रमुँ अनवस्थाने (दिवा० प०) धातु से भ्रमेरूञ्च डूंः (उणा० २२७) द्वारा डू प्रत्यय करने पर इस की निष्पत्ति होती है । इस का विशेष वर्णन आगे अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरण में किया जायेगा । इश्च उश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्वः, तयोः = य्वोः । यह 'श्नु-धातु-भ्रुवाम्' पद के 'धातु' अंश का ही विशेषण है, क्योंकि श्नु और भ्रू के सदा उवर्णान्त होने से उन के साथ इस का सम्बन्ध नहीं हो सकता । 'धातु' अंश का विशेषण होने से 'य्वोः' से तदन्तविधि हो कर 'इवर्णान्तस्य उवर्णान्तस्य च धातोः' ऐसा बन जाता है । इस प्रकार समुचित अर्थ यह होता है—(अचि) अजादि प्रत्यय परे होने पर (श्नु-धातु-भ्रुवाम्) श्नु-प्रत्ययान्त रूप, इवर्णान्त और उवर्णान्त

२५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

धातु रूप तथा भ्रू शब्द (अङ्गानाम्) इन अङ्गा के स्थान पर (इयङ्हुवेंडौ) इयङ् और उवँङ् आदेश होते हैं। ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा ये आदेश अङ्ग के अन्त्य इकार उकार के स्थान पर होते हैं। स्थानेऽन्तरतम (१७) से इवर्ण को इयङ् तथा उवर्ण को उवँङ् आदेश होगा। इन आदेशों में ङ् की इत्संज्ञा हो जाती है इय्, उव् शेष रहते हैं। 'प्रधी+औ' यहाँ औ' यह अजादि प्रत्यय परे है, प्रधी में 'धी' इवर्णान्त धातु है। [यद्यपि धातु 'ध्यै' था तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार इसे भी धातु मान लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि कृत्प्रत्ययान्त हो जाने से यह प्राति- पदिक हो गया है, तथापि णिब्वन्ता धातुत्वं न जहति इस से इस का धातुत्व भी अक्षत रह जाता है।] तो प्रकृतसूत्र से इस के ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध कर यण् विधान करता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२००) एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ।६।४।८२॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णः, तदन्तो यो धातुः, तदन्त- स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अजादौ प्रत्यये परे । प्रध्यौ । प्रध्यम् । प्रध्यः । प्रध्यि । शेषं पपीवत् ॥ अर्थ —धातु का अवयव जो संयोग वह पूर्व में नहीं है जिस इवर्ण के, वह इवर्ण है अन्त में जिस धातु के, वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेक अचो वाला अङ्ग, उस के स्थान पर यण् हो अजादि प्रत्यय परे होने पर। व्याख्या—एः ।६।१। अनेकाचः ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। यण् ।१।१। (इणो यण् से) । धातोः ।६।१। (अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० से। श्नु और भ्रू का— उवर्णान्त होने से 'एः' के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता अतः उन का अनुवर्त्तन नहीं किया जाता) । अचि ।७।१। (अचि श्नुधातु० से) । 'एः' यह षष्ठी का एकवचन है। इस का अर्थ है—'इवर्णस्य'। 'धातोः' पद आवर्तित [दो बार पढ़ा हुआ] किया जाता है। एक 'धातोः' पद 'एः' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'एः' से तदन्तविधि होकर 'इवर्णान्तस्य धातोः' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातोः' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ अन्वित होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'एर्धातोः' (इवर्णान्तस्य धातोः) यह विशेषण है। अतः विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'इवर्णा- न्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ होता है। 'अनेकाचः' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। अनेके अचो यस्य यस्मिन् वा सोऽनेकाच्, तस्य = अनेकाचः, बहुव्रीहिसमास। 'असंयोग- पूर्वस्य' का 'एः' के साथ सामानाधिकरण्य है। नास्ति संयोगः पूर्वो यस्य सोऽसंयोगपूर्वः, नञ्बहुव्रीहिसमास। इस प्रकार यह अर्थ हुआ—(धातोः, असंयोगपूर्वस्य) धातु का अवयव संयोग जिस के पूर्व में नहीं ऐसा (एः) जो इवर्ण, वह है अन्त में जिस में ऐसी (धातोः) जो धातु, वह है अन्त में जिस के ऐसा (अनेकाचः) जो अनेक अचो वाला (अङ्गस्य) अङ्ग, उस के स्थान पर (यण्) यण् आदेश होता है (अचि) अजादि

अजन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५१ प्रत्यय परे हो तो। तात्पर्य—अजादि प्रत्यय परे होने पर उस अनेकाच् अङ्ग को यण् आदेश होता है, जिस के अन्त में इवर्णान्त धातु है। परन्तु धातु के इवर्ण से पूर्व धातु का अवयव संयोग नहीं होना चाहिये । 'प्रधी+औ' यहां 'धी' इवर्णान्त धातु है। इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नहीं। [यद्यपि 'प्र्' संयोग है, तथापि वह धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग का है। किञ्च वह इवर्ण से पूर्व भी नहीं है, अकार और धकार का व्यवधान पड़ता है ।] यह धातु जिस के अन्त में है ऐसा अनेकाच् अङ्ग 'प्रधी' है। इस से परे 'औ' यह अजादि प्रत्यय वर्त्तमान है। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा प्रकृतसूत्रे से ईकार को यण्=यकार आदेश हो कर—प्रध्य्+औ='प्रध्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रधी+अस् (जस्) । यहां सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से प्राप्त यण् का प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से वाध हो जाता है। अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से इस का भी निषेध हो कर पुनः पूर्ववत् यण् की प्राप्ति होने लगती है। इस पर अचि श्नु० (१६६) से इस का वाध हो कर इयङ् की प्रसक्ति होती है। पर अन्त में एरने- काचः० (२००) से इसे भी बाधित कर यण् हो जाता है—प्रध्य्+अस् । अब सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'प्रधी+अम्' यहां भी सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से यण्, उस का वाध कर अमि पूर्वः(१३५) से पूर्वरूप प्राप्त था। उस का परत्व के कारण अचि श्नुधातु० (१६६) सूत्र वाध कर लेता है। तब उस के भी अपवाद एरनेकाचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'प्रधी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस का परत्व के कारण अचि श्नुधातु० (१६६) सूत्र वाध कर लेता है। पुनः एरनेकाचः० (२००) से यण् करने पर सकार को रुँत्व विसर्ग हो 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार भी नहीं होता। 'प्रधी+आ' (टा) यहां इयँङ् प्राप्त होने पर एरनेकाचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्या' प्रयोग सिद्ध होता है। तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में—'प्रधीभ्याम्' । तृतीया के बहुवचन में—'प्रधीभिः'। 'प्रधी+ए' (ङे) यहां भी पूर्ववत् इयँङ् का वाध कर यण् करने से—'प्रध्ये'। चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में—'प्रधीभ्यः'। 'प्रधी+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी इयँङ् का वाध कर एरनेकाचः० (२००) से यण् हो जाता है—'प्रध्यः'। इसी प्रकार ओस् में—'प्रध्योः'। 'प्रधी+आम्' यहां नदीसञ्ज्ञा न होने से नुट् प्राप्त नहीं होता। तब एरने- काचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्याम्' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि एरने-

२५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् काच० (२००) और ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) के विप्रतिषेध की अवस्था में परत्व के कारण नुट् (७।१।५४) ही होता है यण् (६।४।८२) नहीं। 'प्रधी+इ' (ङि) यहां सवर्णदीर्घ का बाध कर इयङ् प्राप्त होता है। पुनः उस का भी बाध कर एरनेकाच० (२००) से यण् करने पर 'प्रध्यि' रूप सिद्ध होता है। प्रधी+सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्यययो (१५०) से मूर्धन्य हो—'प्रधीषु'। सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन के एकवचन में नद्यन्त न होने से अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व (१६५) द्वारा ह्रस्व नहीं होता—हे प्रधी' । 'प्रधी' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्यः प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,, प्रध्योः प्रध्याम् तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्यि ,, प्रधीषु च० प्रध्ये ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधी' हे प्रध्यौ' हे प्रध्य' वक्तव्य—ऊपर कहा गया 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् धातु से क्विप् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस प्रकार से निष्पन्न हुआ 'प्रधी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं होता। यह पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग सब प्रकार का हो सकता है। अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से इस की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। यदि प्रथम ध्यै चिन्तायाम् धातु से क्विप् प्रत्यय कर के 'धी' शब्द बना दिया जावे तो वह नित्यस्त्री- लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञक होगा। तब प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी' इस प्रकार समस्त किया हुआ पुंल्लिङ्ग 'प्रधी' शब्द भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) से नदीसञ्ज्ञक हो जायेगा। तब आट्, नुट् आदि नदीकार्य भी होंगे। प्रधी (प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी । उत्तम बुद्धि वाला) प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्या† प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,,† प्रध्योः प्रधीनाम्‡ तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्याम्* ,, प्रधीषु च० प्रध्यै† ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधि' @ हे प्रध्यौ' हे प्रध्य' †आण्नद्या (१६६) आटश्च (१६७), एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य (२००)। ‡यहां एरनेकाच० (२००) में यण् तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् का विप्रतिषेध होने पर परकार्य नुट् हो जाता है। *यहां ङेराम्० (१६८) में ङि को आम्, आण्नद्या (१६६) से आट् आगम, आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा एरनेकाच० (२००) में यण् हो जाता है। @अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व (१६५), एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४)। शङ्का—नित्यस्त्रीलिङ्ग 'धी' शब्द में अचि श्नु० (१६६) सूत्र द्वारा इयङ् हो— धियौ, धिय' आदि रूप बना करते हैं। परन्तु जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के स्थान पर इयङ् उवङ् हों वहां प्रथम नेयङ्उवङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से नदी सञ्ज्ञा का सर्वथा निषेध हो जाता है, तत्पश्चात् ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित्

अजन्त-पुलिङ्ग-प्रकरणम् २५३ विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में नदीसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता है; जैसा कि अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में 'श्री' शब्द पर होता है । तो इस प्रकार 'प्रकृष्टा धीर्यस्य' इस विग्रह वाले प्रधी शब्द में भी आप को वैसा करना चाहिये था । आप के वैसा न करने का क्या कारण है ? समाधान - नेयैङुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र वहां पर निषेध करता है जहां इयङ्, उवङ् प्राप्त नही किन्तु साक्षात् हुआ करते हैं । अत एव 'इयँङुवँङोरस्त्री' न कह कर सूत्र में 'स्थान' शब्द का ग्रहण किया है। 'प्रधी' शब्द मे प्रत्यक्ष यण् होता है इयङ् नही अतः नदीत्व का निषेध न होगा । ङिति ह्रस्वश्च (२२२) तथा वाऽऽमि (२३०) सूत्रों मे 'इयँङुवँङ्स्थानौ' की अनुवृत्ति आती है अतः वे भी प्रवृत्त न होगे । [लघु०] एवं ग्रामणीः । ङौ तु ग्रामण्याम् ॥ व्याख्या—ग्रामं नयतीति = ग्रामणीः । 'ग्राम'कर्मोपपद णीञ् प्रापणे (भ्वा० उ०) धातु से कर्त्ता मे क्विप् च (८०२) सूत्र से क्विप् प्रत्यय करने पर 'ग्रामणी' (ग्राम का नेता, नम्बरदार) शब्द निष्पन्न होता है । अग्रग्रामाभ्यां नयेतेर्णो वाच्यः वार्तिक से यहां नकार को णकार हुआ है । 'ग्रामणी' शब्द मे 'नी' इवर्णान्त धातु है । इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नही । तदन्त 'ग्रामणी' शब्द अनेकाच् अङ्ग भी है । अतः अजादि प्रत्ययों में सर्वत्र एरनेकाचः० (२००) से यण् हो जायेगा । अचि श्नु० (१६६) से इयङ् न होगा । 'ग्रामणी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नही, किन्तु सब लिङ्गों में साधारण है; अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा न होगी । तब आट्, नुट् आदि नदीकार्य न होगे, सम्बुद्धि में ह्रस्व भी न हो सकेगा । समग्र रूपमाला यथा— प्र० ग्रामणीः* ग्रामण्यौ ग्रामण्यः प० ग्रामण्यः ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभ्यः द्वि० ग्रामण्यम् " " ष० " ग्रामण्योः ग्रामण्याम् तृ० ग्रामण्या ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभिः स० ग्रामण्याम्† " ग्रामणीषु च० ग्रामण्ये " ग्रामणीभ्यः सं० हे ग्रामणीः! हे ग्रामण्यौ! हे ग्रामण्यः! *हल्ङन्त न होने से सुंलोप नही होता । †डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र में 'नी' के साक्षात् निर्देश के कारण 'ङि' को 'आम्' आदेश हो जाता है । नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् का आगम नही होता । इसी प्रकार 'अग्रणी' (आगे जाने वाला) तथा 'सेनानी' (सेनापति) शब्दों के रूप बनते है । अब एरनेकाचः० को अधिक स्पष्ट करने के लिये प्रत्युदाहरण दर्शाते है— [लघु०] अनेकाचः किम्—नीः, नियौ, नियः । अमि शसि च परत्वाद् इयङ्— नियम्, नियः । ङेराम्—नियाम् ॥ व्याख्या—एरनेकाचः० (२००) सूत्र में कहा गया है कि 'अङ्ग अनेकाच् हो' यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'नी' शब्द में यण् का न होना । 'नी' (णीञ् प्रापणे धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'नी' शब्द निष्पन्न होता है । इस का अर्थ है—ले जाने

२५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् वाला = नेता ।) नीशब्द एकाच् है अनेकाच् नहीं, अतः इस में यण् आदेश न हो सकेगा, अचि श्नु० (१६६) सूत्र से इयङ् हो जायेगा । इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० नी † नियौ नियः | प० नियः * नीभ्याम् नीभ्यः द्वि० नियम् ‡ ,, ,, ‡ | ष० ,, * नियोः नियाम् * तृ० निया नीभ्याम् नीभिः | स० नियाम् @ ,, नीषु च० निये * ,, नीभ्यः | स० हे नी ! √ हे नियौ ! हे नियः ! †ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता । ‡अम् और शस् में क्रमशः अमि पूर्वं (१३५) तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) सूत्र को परत्व के कारण अचि श्नु० (१६६) सूत्र बाध कर लेता है । इसी प्रकार एरनेकाच० (२००) द्वारा विहित यण् भी इन का बाधक समझ लेना चाहिये । *सब लिङ्गों में साधारण होने से 'नी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती । अतः आट् आदि नदीकार्य नहीं होते । @डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) में 'नी' के विशेष उल्लेख के कारण ङि को आम् हो जाता है । √नदीत्व न होने के कारण अम्बार्थ० (१६५) द्वारा ह्रस्व न होगा । [लघु०] असंयोगपूर्वस्य किम् ? सुधियौ, यवक्रियौ ॥ व्याख्या—एरनेकाच० (२००) सूत्र में कहा गया था कि धातु के इवर्ण से पूर्वं संयोग नहीं होना चाहिये—यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'सुधियौ' और 'यवक्रियौ' में यण् का न होना । इन स्थानों पर धातु के इवर्ण से पूर्वं संयोग है अतः यण् न हुआ, तब इयङ् हो कर रूप बना । [ध्यान रहे कि संयोग भी जब धातु का अवयव होगा, तभी यण् का निषेध होगा । 'सुधी' आदि शब्दों में संयोग धातु का अवयव है । 'उन्नी' शब्द में संयोग धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार को मिला कर बना है अतः निषेध न होगा यण् हो जायेगा । 'उन्यौ, उन्यः' आदि रूप बनेंगे ।] सुष्ठु श्रयतीति सुश्रीः (अच्छी तरह आश्रय करने वाला) । सुपूर्वक श्रिञ् सेवायाम् (भ्वा० उ०) धातु से विब्वेञ्चिप्रादिभ्य० (वा० ४८) इस वार्तिक से क्विप् प्रत्यय और दीर्घ करने पर 'सुश्री' शब्द निष्पन्न होता है । तीनों लिङ्गों में साधारण होने के कारण इस की नदीसञ्ज्ञा न होगी । 'सुश्री' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० सुश्रीः * सुश्रियौ सुश्रियः | प० सुश्रियः † सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः द्वि० सुश्रियम् ,, ,, | ष० ,, † सुश्रियोः सुश्रियाम् † तृ० सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः | स० सुश्रियि ‡ ,, सुश्रीषु च० सुश्रिये † ,, सुश्रीभ्यः | स० हे सुश्री ! हे सुश्रियौ ! हे सुश्रियः ! *अङ्यन्त होने से सुँलोप नहीं होता । †नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि नदीकार्य नहीं होते । ‡यहाँ न तो नदीसञ्ज्ञा है और न ही नीशब्द, अतः ङि को आम् न होगा ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५५ वक्तव्य—सु=शोभना श्रीर्यस्य स सुश्रीः। इस प्रकार विग्रह मानने पर भी 'सुश्री' शब्दों के रूपों में कोई अन्तर नहीं आता। प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) वार्त्तिक की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर इयङ्स्थानी होने के कारण नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से निषेध हो जाता है। इसी प्रकार आगे 'शुद्धधी, सुधी' आदि शब्दों में भी समझ लेना चाहिये। यहां ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित् विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में वैकल्पिक नदीत्व की भी आशङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिस स्त्रीलिङ्ग अङ्ग से ङित् वा आम् का विधान हो उस की उन सूत्रों से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा की जाती है (देखो— शेखर में ङिति ह्रस्वश्च)। यहां ङित् और आम् का विधान तो सुश्री, सुधी आदि पुंल्लिङ्ग शब्दों से किया गया है और नदीसञ्ज्ञा उन के अवयव श्री, धी आदि शब्दों की करनी है। अतः नदीसञ्ज्ञा सर्वथा न होगी। लघुकौमुदी और मध्यकौमुदी के विवृत्तिकार श्री पण्डित विश्वनाथ जी शास्त्री तथा लघुकौमुदी के हिन्दी व्याख्याकार श्री पण्डित श्रीधरानन्द जी शास्त्री को 'सुश्री' शब्द पर महती भ्रान्ति हो गयी है। वे यहां नदीसञ्ज्ञा करना बतलाते हैं। यदि वैसा हो तो सुधी आदि शब्दों में भी नदीत्व प्रसक्त होगा, जो उन के मत में भी अनिष्ट है। यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) के महा- भाष्य पर श्रियै अतिश्रियै ब्राह्मण्यै, क्व मा भूत्—श्रिये अतिश्रिये ब्राह्मणाय ये वचन यहां विशेष मननीय हैं। इसी प्रकार 'यवक्री' (जौ खरीदने वाला) शब्द के रूप होते हैं। यह भी 'असंयोगपूर्वस्य' का प्रत्युदाहरण है। यवान् क्रीणातीति—यवक्रीः, यवकर्मोपपदात् डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये (क्रया० उ०) इति धातोः क्विँप् च (८०२) इति क्विँप्प्रत्ययः। इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० यवक्रीः यवक्रियौ यवक्रियः | प० यवक्रियः यवक्रीभ्याम् यवक्रीभ्यः द्वि० यवक्रियम् " " | ष० " यवक्रियोः यवक्रियाम् तृ० यवक्रिया यवक्रीभ्याम् यवक्रीभिः | स० यवक्रियि " यवक्रीषु च० यवक्रिये " यवक्रीभ्यः | सं० हेयवक्रीः! हेयवक्रियौ! हेयवक्रियः! इस शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सुश्री' शब्द के समान होती है। सर्वत्र अजादि प्रत्ययों में इयङ् हो जाता है। नदीसञ्ज्ञा कहीं नहीं होती। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२०१) गतिश्च ।१।४।५६॥ प्रादयः क्रियायोगे गतिसञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थः—क्रियायोग में प्रादि शब्द गतिसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (प्रादयः से)। क्रियायोगे ।७।१। (उपसर्गाः क्रिया- योगे से)। गतिः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(प्रादयः) प्र आदि बाईस शब्द (क्रियायोगे) क्रिया के योग में (गतिः) गतिसञ्ज्ञक (च) भी होते हैं। यह सूत्र एकसञ्ज्ञाधिकार (१६६) के अन्तर्गत पढ़ा गया है। इस अधिकार में उपसर्गाः क्रियायोगे (३५) सूत्र द्वारा क्रियायोग में प्रादियों की उपसर्गसञ्ज्ञा कह आये हैं।

२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् एक की दो सञ्ज्ञा न हो सकने से पुनः इन की गतिसञ्ज्ञा सिद्ध नहीं हो सकती अतः दोनों सञ्ज्ञाओं के समावेश के लिये मुनि ने सूत्र में 'च' शब्द का ग्रहण किया है। ध्यान रहे कि प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधिकार में पठित होने से इन दो सञ्ज्ञाओं के साथ निपातसञ्ज्ञा का भी समावेश होता है। निपातसञ्ज्ञा का फल स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) द्वारा अव्ययसञ्ज्ञा करना है। प्रश्न—क्रियायोग में प्रादियों की गतिसञ्ज्ञा करना अनावश्यक है। क्योंकि क्रियायोग में इन की उपसर्ग सञ्ज्ञा है ही। जहां २ गति को कार्य कहा है वहां २ उपसर्ग का नाम कर देना चाहिये। इस से सर्वत्र कार्य चल सकता है। उत्तर—गतिसञ्ज्ञा केवल इन बाईस प्रादियों की ही नहीं, जिस से आप सर्वत्र काम चलाने की ठान रहे हैं। गतिसञ्ज्ञा तो बहुत से अन्य शब्दों की भी इस शास्त्र में की गई है। यथा-ऊर्यादिच्विडाचश्च (१.४.६०) [ऊर्यादि, च्व्यन्त तथा डाजन्त शब्द क्रियायोग में गतिसञ्ज्ञक हों।], अनुकरणञ्चानिति परम् (१.४.६१) [इति परे न हो तो क्रियायोग में अनुकरण की गतिसञ्ज्ञा हो] इत्यादि। तो अब यदि सर्वत्र 'गति' के स्थान पर 'उपसर्ग' रख कर काम चलाते हैं तो अन्य गतिसञ्ज्ञकों की क्या गति होगी? उन के लिये पुनः गतिग्रहण करना पड़ेगा। अतः प्रादियों की भी क्रियायोग में गतिसञ्ज्ञा कर सब को एक कोटि में रख समान भाव से कार्य करना उचित है। अब गतिसञ्ज्ञा करने का यहां फल दर्शाते हैं - [लघु०] वा०-(१८) गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण् नेष्यते ॥ शुद्धधियो ॥ अर्थः-जिस शब्द का पूर्वपद गतिसञ्ज्ञक या कारक से भिन्न हो उस के स्थान पर एरनेकाच ० (२००) द्वारा यण् नहीं होता। व्याख्या-कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः कारक हैं। इन का विशेष विवेचन आगे 'कारकप्रकरण' में किया जायेगा। जिस शब्द में एरनेकाच ० (२००) सूत्र प्रवृत्त हो उस का पूर्वपद या तो गतिसञ्ज्ञक होना चाहिये अथवा कारक। यदि इन दोनों से भिन्न कोई अन्य होगा तो एरनेकाचः० द्वारा यण् न होगा। शुद्धा धीर्यस्य स शुद्धधीः (शुद्ध बुद्धि वाला), बहुव्रीहिसमास। यहां 'शुद्धा' शब्द पूर्वपद और 'धी' शब्द उत्तरपद है। पूर्वपद न तो गतिसञ्ज्ञक है और न ही कारक। यह तो 'धी' का विशेषण है। अतः सब शर्तें पूर्ण होने पर भी अजादि प्रत्यय में एरने- काच ० (२००) द्वारा यण् न होगा, अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो जायेगा। 'शुद्धधी' शब्द में समास से पूर्व 'धी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग था, अतः अब प्रथम- लिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा इस की नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस पर नेयैङ्वस्थान० (२२६) से निषेध हो जाता है। 'शुद्धधी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५७ प्र० शुद्धधीः शुद्धधियौ शुद्धधियः | प० शुद्धधियः शुद्धधीभ्याम् शुद्धधीभ्यः द्वि० शुद्धधियम् ,, ,, | ष० ,, शुद्धधियोः शुद्धधियाम् तृ० शुद्धधिया शुद्धधीभ्याम् शुद्धधीभिः | स० शुद्धधियि ,, शुद्धधीषु च० शुद्धधिये ,, शुद्धधीभ्यः | सं० हे शुद्धधीः! हे शुद्धधियौ! हे शुद्धधियः! इसी प्रकार 'मन्दधी, तीक्ष्णधी, सूक्ष्मधी' आदि शब्दों के रूप होंगे। नोट—'शुद्धधी' शब्द का 'शुद्धं ध्यायति' इस प्रकार यदि विग्रह इष्ट हो तो कर्म कारक के पूर्वपद होने के कारण यण् हो जायेगा। तब 'शुद्धध्यौ, शुद्धध्यः' इस प्रकार रूप बनेंगे। किन्तु नदीसञ्ज्ञा वहां भी न होगी; क्योंकि वहां स्त्रीलिङ्ग 'धी' शब्द ही नहीं रहेगा। [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२०२) न भू-सुधियोः ।६।४।८५॥ एतयोरचि सुपि यण् । सुधियौ, सुधियः। इत्यादि ॥ अर्थः—अजादि सुँप् प्रत्यय परे रहते भू और सुधी शब्द को यण् न हो। व्याख्या—अचि ।७।१। (अचि श्नु० से')। सुंपि ।७।१। (ओः सुँपि ते) । यण् ।१।१। (इणो यण् से) । न इत्यव्ययपदम् । भूसुधियोः ।६।२। 'अचि' पद 'सुँपि' पद का विशेषण है, अतः यस्मिन्विधिः० द्वारा तदादिविधि हो कर 'अजादी सुँपि' बन जायेगा। समासः—भूश्च सुधीश्र्च = भूसुधियौ, तयोः—भूसुधियोः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(अचि) अजादि (सुँपि) सुँप् परे होने पर (भूसुधियोः) भू और सुधी शब्द के स्थान पर (यण्) यण् (न) नहीं होता। सुध्यायतीति सुधीः (भली प्रकार चिन्तन करने वाला = बुद्धिमान् । सुपूर्व- ध्यै चिन्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से ध्यायतेः सम्प्रसारणञ्च वार्त्तिक द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा सम्प्रसारण करने पर 'सुधी' शब्द निष्पन्न होता है। इस में पूर्वपद (सु) गतिश्च (२०१) सूत्र द्वारा गतिसञ्ज्ञक है, अतः अजादि प्रत्ययों में यण् निषेध नहीं होता, एरनेकाचः० (२००) द्वारा यण् प्राप्त होता है। इस पर इस सूत्र से उस का निषेध हो कर इयङ् हो जाता है। इस की रूपमाला यथा— प्र० सुधीः सुधियौ सुधियः | प० सुधियः सुधीभ्याम् सुधीभ्यः द्वि० सुधियम् ,, ,, | ष० ,, सुधियोः सुधियाम् तृ० सुधिया सुधीभ्याम् सुधीभिः | स० सुधियि ,, सुधीषु च० सुधिये ,, सुधीभ्यः | सं० हे सुधीः! हे सुधियौ! हे सुधियः! नोट—'सु = शोभना धीर्यस्य स सुधीः' इस विग्रह में भी उच्चारण इसी तरह होगा। नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर नेयङुवड्० (२२६) सूत्र से निषेध हो जायेगा। विशेष—इस सूत्र से 'शुद्धयुपास्यः' में यण् का निषेध नहीं होता। क्योंकि १. इको यणचि सूत्राद् 'अचि' इत्यनुवर्त्तत इति मन्वानो बालमनोरमाकारोऽत्र भ्रान्तः । ल० प्र० (१७)

२५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् वहा यण्, अजादि सुँप् को मान कर नही अपितु 'उपास्य' के उकार को मान कर प्रवृत्त होता है। [लघु०] सुखमिच्छतीति—सुखी। सुतमिच्छतीति—सुती। सुख्यौ। सुत्यौ। सुख्युः। सुत्युः। शेषं प्रधीवत् ॥ व्याख्या—सुखम् आत्मन इच्छतीति—सुखी । जो अपने लिये सुख चाहे उसे 'सुखी' कहते हैं। सुतम् आत्मन इच्छतीति—सुती । जो अपने लिये सुत—पुत्र चाहे उसे 'सुती' कहते हैं। इन शब्दो की साधनप्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये। तथाहि—'सुख+अम्' तथा 'सुत+अम्' इन सुंवन्तो स सुप आत्मन क्यच् (७२०) सूत्र द्वारा क्यच् प्रत्यय हो कर सनाद्यन्ता धातव (४६८) म 'सुख अम् क्यच्' तथा 'सुत अम् क्यच्' इन समुदायो की धातुसञ्ज्ञा हो जाती है। अब सुँपो धातु प्राति- पदिकयो (७२१) सूत्र से अम् का लुक हो कर क्यचि च (७२२) से अकार को ईकार करने पर 'सुखीय, सुतीय' रूप बन जाते हैं। इन का अर्थ क्रमश 'अपने लिये सुख चाहना' और 'अपने लिये पुत्र चाहना' है। अब इन धातुओ स कर्ता अर्थ मे क्विप् च (८०२) सूत्र स क्विप् प्रत्यय कर अतो लोप (४७०) स अकारलोप तथा लोपो व्योर्वलि (४२६) म यकार का लोप हो कर—'सुखी' और 'सुती' शब्द निष्पन्न होने है। क्विबन्ता धातुत्वं न जहति इस नियमानुसार इन की धातुसञ्ज्ञा भी अक्षत है। सुखी+स्(सुँ), सुती+स्(सुँ)' यहा इदुदन्त न होने से सुँ का लोप नही होता। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो कर—सुखी, सुती। सुखी+औ, सुती+औ' यहा अनादि प्रत्ययो मे सर्वत्र धातु के ईकार को एरनेकाच ० (२००) से यण् होता चला जायेगा—सुख्यौ सुत्यौ। सुखी+अम् (ङसिँ वा ङस्), सुती+अम्(ङसिँ वा ङस्)' यहा प्रथम एरने- काच ०(२००) म यण् हो—'सुख्य्+अस्, सुत्य्+अस्' बन जाता है। तब एरनेयान् परस्य १८३) सूत्र से अकार को उकार हो सुख्यु, सुत्यु' प्रयोग निष्पन्न होते हैं। इन शब्दो की रूपमाला यथा— सुखी (अपने लिये सुख चाहने वाला) | सुती (अपने लिये पुत्र चाहने वाला) प्र० सुखी सुख्यौ सुख्य | प्र० सुती सुत्यौ सुत्य द्वि० मुख्यम् ,, ,, | द्वि० मुत्यम् ,, ,, तृ० सुख्या सुखीभ्याम् सुखीभि | तृ० सुत्या सुनीभ्याम् सुनीभि च० सुख्ये ,, सुखीभ्य | च० सुत्ये ,, मुतीभ्य प० सुख्यु ,, ,, | प० सुत्यु ,, ,, ष० ,, सुख्यो सुख्याम् | ष० ,, सुत्यो सुत्याम् स० मुख्यि ,, सुखीषु | स० मुख्यि ,, सुनीपु स० हे सुखी। हे सुख्यौ! हे मुख्य ! | स० हे मुनी! हे मुत्यौ! हे मुत्य ! इसी प्रकार—लूती, क्षामी, प्रस्नीमी आदि शब्दों के रूप होते हैं। इन शब्दो

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५६ में क्त प्रत्यय के तकार के स्थान पर नकार, मकार आदि आदेश होते हैं । ये आदेश त्रिपादीस्थ होने से ह्यत्यात् परस्य (१८३) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध हैं अतः उस से उकार आदेश करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । अभ्यास (३०) (१) यदि प्रादियों की गतिसञ्ज्ञा न कर उपसर्गसञ्ज्ञा से ही काम चलाया जाये तो क्या दोष उत्पन्न होगा ? (२) इन चार शब्दों में विग्रहभेद से सुवन्त-रूपों में कौन २ सा भेद हो सकता है ? सविस्तर लिखें । प्रधी $प्रध्यायतीति प्रधीः । प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधीः ।$ सुश्री $सुश्रयतीति सुश्रीः । सु (शोभना) श्रीर्यस्य स सुश्रीः ।$ सुधी $सुध्यायतीति सुधीः । सु (शोभना) धीर्यस्य स सुधीः ।$ शुद्धधी $शुद्धा धीर्यस्य स शुद्धधीः । शुद्धं ध्यायतीति शुद्धधीः ।$ (३) अजादि प्रत्ययों के परे रहते निम्नलिखित शब्दों में कहां यण् और कहां इयङ् होता है ? कारणनिर्देशपूर्वक तत्तद्विधायक सूत्र लिखें— १. प्रस्तीमी । २. ग्रामणी । ३. सुधी । ४ यवक्री । ५. मन्दधी । ६. सुश्री । ७. प्रधी । ८. सुखी । ९. नी । १०. सुती । (४) निम्नलिखित शब्दों में अजादि सुँप् के परे रहते यण् हो या इयङ् ? १. पपी । २. बहुश्रेयसी । ३. अतिलक्ष्मी । ४. ययी । (५) (क) किस २ विभक्ति में नदीसञ्ज्ञा के कारण अन्तर होता है ? (ख) अग्रणी तथा सेनानी शब्द के अम् तथा आम् में क्या रूप बनेंगे ? (ग) 'सुध्युपास्यः' में न भूसुधियोः द्वारा यण्निषेध क्यों नहीं होता ? (घ) 'हे बहुश्रेयसि' में ह्रस्वस्य गुणः द्वारा गुण क्यों नहीं होता ? (६) सन्धि-प्रकरण में सवर्णदीर्घ के द्वारा यण् का, और इस प्रकरण में यण् के द्वारा सवर्णदीर्घ का बाध होता है—इस कथन की पुष्टि सोदाहरण प्रमाणनिर्देशपूर्वक करते हुए प्रधी और पपी शब्द के सप्तमी के एक- वचन का रूप सिद्ध करें । (७) सूत्रों की व्याख्या करें— १. अचि श्नु०, २. एरनेकाचः०, ३. यू स्त्र्याख्यौ नदी, ४. न भूसुधियोः । (८) यदागमास्तद्गुणीभूताः०, क्विबन्ता धातुत्वम्०, प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च, गतिकारकेतर०, विप्रतिषेधे यद्० इन वचनों का तात्पर्य स्पष्ट करें । (६) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. सुत्युः । २. नियाम् । ३. शुद्धधियो । ४. बहुश्रेयसि । ५. पपी ।

२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ६ अतिलक्ष्म्यै । ७ सुधियि । ८ यवक्रियौ । ६ प्रध्यै । १० बहु- श्रेयसीनाम् । [यहाँ ईकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है] —: ० :— अब ह्रस्व उकारान्त शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] शम्भुहरिवत् । एवम्—भानवादयः ॥ अर्थ—शम्भु (भगवान् शिव) शब्द के रूप हरिशब्द के समान होते हैं । इसी प्रकार भानु (सूर्य), आदि अन्य उकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों के भी रूप होते हैं । व्याख्या—शम्भु शब्द की ह्रस्व उकारान्त होने से 'हरि' के समान शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा होती है, अतः घिसञ्ज्ञा के कार्य 'हरि' शब्द के समान ही होंगे । यहां गुण उकार के स्थान पर ओकार ही होगा । रूपमाला यथा— प्र० शम्भुः शम्भू शम्भवः ‡ । प० शम्भोः * शम्भुभ्याम् शम्भुभ्यः द्वि० शम्भुम् " शम्भून् । ष० " शम्भोः शम्भूनाम् तृ० शम्भुना† शम्भुभ्याम् शम्भुभिः । स० शम्भौ≠ " शम्भुषु च० शम्भवे √ " शम्भुभ्यः । स० हे शम्भो! @ हे शम्भू! हे शम्भवः ! ‡जसि च (१६८) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । †घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना हो जाता है । √घेर्डिति (१७२) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । घेर्डिति (१७२) से गुण तथा ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो जाता है । ≠अच्च घे (१७४) से ङि को औ तथा घि को अत् हो जाता है । @ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर 'एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः' (१३४) से सुँलोप हो जाता है । इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप बनेंगे— [णत्वविधि का चिह्न है] शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अजातशत्रु = युधिष्ठिर | अंशु = किरण | इषु = बाण अणु = परमाणु | आखु = चूहा | उन्दुरु* = चूहा अध्वर्यु* = यजुर्वेद ज्ञाता | आगन्तु = आगन्तुक | ऊरु* = पटू अनूरु* = सूर्य का सारथि | इक्षु* = गन्ना | ऊर्णायु = मेष-मेढ़ा अन्धु = कुँआ | इक्ष्वाकु* = एक राजा | ऋजु = सरल अभीषु* = किरण, लगाम | इच्छु = चाहने वाला | ऋतु = मौसम असु = प्राण | इन्दु = चन्द्र | ओतु = बिल्ला कटु¹ = तीखा १ भाषा में आजकल मरिच, पिप्पली आदि को तिक्त अर्थात् तीखा तथा निम्ब आदि को कटु समझा जाता है । परन्तु वैद्यकशास्त्रों में ठीक इस से विपरीत

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६१

शब्द—अर्थशब्द—अर्थशब्द—अर्थ
कारु* = कारीगरदयालु = दया वालाभिक्षु* = याचक
कृशानु = अग्निदस्यु = डाकूभीरु* = डरपोक
केतु = झण्डा वा एक ग्रहदिदृक्षु* = दर्शनाभिलाषीभृगु* = एक ऋषि
ऋतु = यज्ञदेवगुरु* = बृहस्पतिमञ्जु = सुन्दर
क्षवथु = खांसीदेवदारु* = दियार वृक्षमधु = वसन्त
गुग्गुलु = गूगलधातु = सुवर्णादि धातुमनु = पहला राजा
गुरु* = गुरुनिद्रालु = निद्राशीलमन्यु = क्रोध
गृध्नु = लालचीपङ्गु = लङ्गड़ामरु* = रेगिस्तान
गोमायु = गीदड़पटु = चतुरमित्रयु* = मित्रवत्सल
चण्डांशु = सूर्यपरमाणु = ज़र्रामुमूर्षु* = मरणेच्छुक
चरिष्णु = चालाकपरशु = कुल्हाड़ामृगयु* = शिकारी
चरु* = हव्यान्नपर्शु = कुल्हाड़ामृत्यु = मौत
चिकीर्षु* = करणेच्छुकपलाण्डु = प्याज़मेरु* = एक पर्वत
जन्तु = प्राणीपशु = जानवरयदु = प्रसिद्ध नृप
जायु = औषधपाण्डु = प्रसिद्ध नृपरघु* = प्रसिद्ध नृप
जिगीषु* = जयेच्छुकपायु = गुदारङ्कु* = मृग-विशेष
जिघत्सु = भूखापांशु = धूलिराहु* = ग्रह-विशेष
जिज्ञासु = ज्ञानेच्छुकपांसु = ,,रिपु* = शत्रु
जिष्णु = इन्द्र वा अर्जुनपिचु = कपासरेणु = धूलि
जीवातु = जीवन-औषधपिपासु = प्यासालघु = छोटा
तनु = पतलापीलु = पीलु का वृक्षवटु = ब्रह्मचारी
तन्तु = तागापुरु* = प्रसिद्ध नृपवनायु = अरब देश
तन्द्रालु = ऊंघनेवालापृथु = प्रसिद्ध नृपवन्दारु* = वन्दनशील
तरक्षु* = विशेष भेड़ियाप्रज्ञु = टेढ़े घुटनों वालावमथु = वमन
तरु* = वृक्षप्रभु* = स्वामीवायु = हवा
तिग्मांशु = सूर्यप्रांशु = उन्नतविधु = चन्द्र
तितउ = चलनीबन्धु = बान्धवबिन्दु = बूंद
तुहिनांशु = चन्द्रबाहु = भुजाविभावसु = अग्नि, सूर्य
-त्सरु* = तलवार की मूठबुभुक्षु* = भूखाविभु = व्यापक
दद्रु* = रोग-विशेषभानु = सूर्यविष्णु = भगवान् विष्णु
' होता है। वहां मरिच आदि को 'कटु' तथा निम्ब आदि को 'तिक्त' कहा जाता
है। अत एव 'त्रिकटु' शब्द से आयुर्वेद में—'काली मिर्च, पिप्पली, शुण्ठी' इन
तीनों का ग्रहण होता है।

२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ वेणु=बास | शीतगु=चन्द्र | सूनु=पुत्र वेपथु=कापना | श्रद्धालु=श्रद्धालु | सेतु=पुल व्यथु=मृग | श्वयथु=सूजन-शोथ | स्तनयित्नु=बादल शङ्कु=कील | सक्तु=सत्तु | स्थाणु=शाखाहीन वृक्ष शत्रु*=दुश्मन | साधु=सज्जन | स्वर्भानु=राहु शयालु=निद्राशील | सानु=पर्वत की चोटी | स्वादु=स्वादिष्ट शयु=अजगर | सिन्धु=सागर | हिमांशु=चन्द्र शरु*=हिंस्र | सीधु=मद्यविशेष | हेतु=कारण शिशु=बालक | सुधाथु=चन्द्र | शम्भु शब्द की अपेक्षा क्रोष्टु (गीदड़। शृगाल-वञ्चक-क्रोष्टु-फेरु-फेरब-जम्बुकाः इत्यमरः) शब्द के रूपों में अन्तर पड़ता है। अतः अब उस का वर्णन करते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२०३) तृज्वत् क्रोष्टुः।७।१।९५॥ असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने 'क्रोष्टृ' शब्दः प्रयोक्तव्य इत्यर्थः ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' शब्द प्रयुक्त करना चाहिये—यह सूत्र का तात्पर्य है (अर्थ नहीं। अर्थ व्याख्या में देखें)। व्याख्या—तृज्वत् इत्यव्ययपदम्। क्रोष्टु १।१। असम्बुद्धौ ७।१। (सख्युर- सम्बुद्धौ से)। सर्वनामस्थाने ७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से)। तृचा तुल्यम्—तृज्वत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८) इति वतिप्रत्ययः। प्रत्ययग्रहणपरिभाषा से तृजन्त का ग्रहण होता है। 'तृज्वत्' का अर्थ है—तृजन्त के समान। अर्थ—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे रहते (क्रोष्टु) क्रोष्टु शब्द (तृज्वत्) तृच्प्रत्ययान्त के समान होता है। यह अतिदेश-सूत्र है; अतिदेश कई प्रकार के होते हैं, यहां रूपातिदेश है। तृजन्त शब्द—कर्तृ, हर्तृ, दातृ आदि अनेक हैं, इन मे से यहां क्रोष्टु शब्द के स्थान पर कौन सा तृजन्त हो ? इस का उत्तर यह है कि स्थानेऽन्तरतमः (१७) से अर्थकृत आन्तर्य [अर्थ के तुल्य होने से जो सादृश्य देखा जाता है उसे अर्थकृत आन्तर्य कहते हैं] द्वारा 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' ही तृजन्त आदेश होगा। क्रोष्टु और क्रोष्टृ दोनों का एक ही अर्थ है। 'क्रोष्टु+स्' (सुँ) यहां सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान 'सुँ' परे है, अतः क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो—'क्रोष्टृ+स्' हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०४) ऋतो ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।३।११०। ऋदन्तोऽङ्गस्य गुणो ङौ सर्वनामस्थाने च। इति प्राप्ते— अर्थः—ङि अथवा सर्वनामस्थान परे होने पर ऋदन्त अङ्ग के स्थान पर गुण

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६३ हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर (अग्रिम सूत्र इस का बाध कर लेता है)। व्याख्या—ऋतः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से)। ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।२। समासः—ङिश्च सर्वनामस्थानञ्च = ङिसर्वनामस्थाने, तयोः = ङिसर्वनामस्थानयोः, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'ऋतः' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(ऋतः) ऋदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (गुणः) गुण होता है (ङिसर्वनामस्थानयोः) ङि अथवा सर्वनामस्थान परे हो तो। अलोऽन्त्यपरिभाषा तथा इको गुणवृद्धी (१.१.३) परिभाषा से अन्त्य ऋवर्ण के स्थान पर ही गुण (अ) होगा। उरण्रपरः (२६) द्वारा रपर हो 'अर्' हो जायेगा। 'क्रोष्टृ+स्' यहां 'सुं' सर्वनामस्थान परे है अतः प्रकृत-सूत्र से ऋवर्ण के स्थान पर 'अर्' गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र निषेध कर अनँङ् आदेश कर देता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०५) ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ।७।१।९४॥ ऋदन्तानाम् उशनसादीनां चानँङ् स्यादसम्बुद्धौ सौ ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सुं परे होने पर ऋदन्तों तथा उशनस् (शुक्र आचार्य), पुरुदंसस् (बिल्ली) और अनेहस् (समय) शब्दों को अनँङ् आदेश हो। व्याख्या—असम्बुद्धौ ।७।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। अनँङ् ।१।१। (अनँङ् सौ से)। ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य अधि- कार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। च इत्यव्ययपदम्। समासः—ऋच्च उशना च पुरुदंसा च अनेहा च = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसः, तेषाम् = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'ऋदुशनस्०' पद से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे हो तो (ऋदुशनस्पुरुदंसो- ऽनेहसाम्) ऋदन्त, उशनस्शब्दान्त, पुरुदंसस्शब्दान्त तथा अनेहस्शब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों के स्थान पर (अनँङ्) अनँङ् आदेश होता है। अनँङ् आदेश में ङकार इत्सञ्ज्ञक है, अकार उच्चारणार्थ है। 'अन्' ही अव- शिष्ट रहता है। ङित् होने से यह आदेश ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा अन्त्य अल् —ऋवर्ण या सकार के स्थान पर होगा। किञ्च ध्यान रहे कि केवल उशनस् आदि शब्दों के स्थान पर भी व्यपदेशिवद्भाव (२७८) से अनँङ् आदेश हो जायेगा। 'क्रोष्टृ + स्' यहां सम्बुद्धिभिन्न सुं परे है अतः प्रकृत सूत्र से ऋकार को अनँङ् आदेश हो अनुबन्ध-लोप करने पर—'क्रोष्टन् + स्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०]विधि-सूत्रम्—(२०६) अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ-नप्तृ-नेष्टृ-त्वष्टृ-क्षत्तृ-होतृ- पोतृ-प्रशास्तॄणाम् ।६।४।११॥ अबादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः । क्रोष्टारम्, क्रोष्टॄन् ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर अप्, तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्यया-

२६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् न्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ शब्दो की उपधा को दीर्घ हो । व्याख्या—अप्-तृन्—प्रशास्तॄणाम् ।६।३। उपधाया ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घ ।१।१। (ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से) । समास — आपश्च तृन् च तृच् च स्वसा च नप्ता च नेष्टा च त्वष्टा च क्षत्ता च होता च पोता च प्रशास्ता च = अप्तृन्तृच्—प्रशास्तारः, तेषाम् = अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । तृन् और तृच् प्रत्यय हैं अतः प्रत्यय- ग्रहणपरिभाषा द्वारा तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्) अप्, तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्ययान्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ तथा प्रशास्तृ शब्दो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर । अन्त्य वर्ण से पूर्व वर्ण उपधासञ्ज्ञक होता है—यह पीछे (१७६) सूत्र पर कहा जा चुका है । इस सूत्र पर विशेष विचार स्वयं ग्रन्थकार आगे ऋदन्त प्रकरण में करेंगे; अतः हम भी उस की वही व्याख्या करेंगे । 'क्रोष्टन् + स्' यहाँ एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'क्रोष्टन्' शब्द तृजन्त है । इस की उपधा नकार से पूर्व टकारोत्तर अकार है । सम्बुद्धिभिन्न सुँ = सर्वनाम- स्थान परे है ही, अतः प्रकृतसूत्र से उपधा को दीर्घ हो गया तो—'क्रोष्टान् + स्' । इस स्थिति में हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो कर न लोपः प्राति- पदिकान्तस्य (१८०) से नकार का भी लोप हो जाने से—'क्रोष्टा' प्रयोग सिद्ध हुआ । नोट—यद्यपि सुं मे सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा भी उपधा- दीर्घ सिद्ध हो सकता था तथापि औ, जस् आदियों मे नान्त न होने से उपधादीर्घ अप्राप्त था अतः प्रकृतसूत्र का बनाना आवश्यक था । तब यह सुँ मे न्यायवशात् प्रवृत्त हो जाता है । 'क्रोष्टु + औ = क्रोष्टृ + औ' यहाँ सुँ परे न होने से अनङ् आदेश नही होता । ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर— क्रोष्टारौ । क्रोष्टु + अस् (जस्) = क्रोष्टृ + अस् । यहाँ भी पूर्ववत् गुण और उपधादीर्घ करने पर 'क्रोष्टारः' प्रयोग सिद्ध होता है । क्रोष्टु + अम् = क्रोष्टृ + अम् । गुण और उपधादीर्घ हो—'क्रोष्टारम्' । ध्यान रहे कि यह गुण, पूर्वसवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) आदि का अपवाद है । 'क्रोष्टु + अस् (शस्)' यहाँ सर्वनामस्थान परे न होने से तृज्वद्भाव नही होता । पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को नकार करने से 'क्रोष्टून्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'क्रोष्टु + आ (टा)' यहाँ वैकल्पिक तृज्वद्भाव का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०७) विभाषा तृतीयादिष्वचि ।७।१।९७॥ अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत् । क्रोष्ट्रा । क्रोष्ट्रे ॥

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६५ अर्थः—अजादि तृतीयादि विभक्ति परे हो तो 'क्रोष्टु' विकल्प से तृज्वत् हो । व्याख्या—क्रोष्टुः ।१।१। तृज्वत् इत्यव्ययपदम् । (तृज्वत्क्रोष्टुः से)। विभाषा इत्यव्ययपदम् । तृतीयादिषु ।७।३। अचि ।७।१। 'अचि' पद 'तृतीयादिषु' का विशेषण है, अतः तदादिविधि हो कर 'अजादिषु' बन जायेगा । अर्थः—(अचि) अच् जिस के आदि में है ऐसी (तृतीयादिषु) तृतीया आदि विभक्ति परे हो तो (क्रोष्टुः) क्रोष्टुशब्द (विभाषा) विकल्प कर के (तृज्वत्) तृजन्त के समान होता है । तृतीयादि विभक्तियों में अजादि विभक्तियां आठ हैं । १ टा (आ), २ ङे (ए), ३ ङसिँ (अस्), ४ ङस् (अस्), ५ ओस्, ६ आम्, ७ ङि (इ), ८ ओस् । जिस पक्ष में क्रोष्टृ आदेश न होगा वहां सर्वत्र घिसञ्ज्ञा हो कर 'शम्भु' शब्द के समान प्रक्रिया होगी । तृतीया के एकवचन में 'क्रोष्टु + आ' इस स्थिति में अजादि तृतीयादि विभक्ति परे होने से विकल्प से तृज्वद्भाव हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में 'क्रोष्टृ + आ' इस स्थिति में इको यणचि (१५) से ऋकार को रेफ आदेश हो कर 'क्रोष्ट्रा' प्रयोग सिद्ध हुआ । तृज्वत् के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर टा को ना आदेश करने पर 'क्रोष्टुना' रूप सिद्ध होता है । भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् तृतीयादि होने पर भी हलादि हैं, अतः इन में तृज्वद्भाव न होगा— क्रोष्टुभ्याम्, क्रोष्टुभिः, क्रोष्टुभ्यः, क्रोष्टुषु । चतुर्थी के एकवचन में 'क्रोष्टु + ए' इस दशा में विकल्प कर के तृज्वद्भाव हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में यण् हो— 'क्रोष्ट्रे' रूप सिद्ध हुआ । तदभावपक्ष में घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण हो कर अव् आदेश करने से—'क्रोष्टवे' रूप सिद्ध होता है । तृज्वद्भावपक्ष में पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'क्रोष्टृ + अस्' इस दशा में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२०८) ऋत उत् ।६।१।१०७॥ ऋतो ङसिँ-ङसोरति उद् एकादेशः । रपरः ।। अर्थः—ऋत् से ङसिँ अथवा ङस् का अत् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर उत् एकादेश हो । उरण्रपरः (२६) से रपर भी हो जायेगा । व्याख्या—ऋतः ।५।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च से) । अति ।७।१। (एङः पदान्तादति से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। उत् ।१।१। अर्थः—(ऋतः) ह्रस्व ऋकार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस् का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (उत्) ह्रस्व उकार आदेश होता है । उरण्रपरः (२६) से रपर हो कर 'उर्' आदेश बन जायेगा । प्रश्न—प्रत्यय अर्थात् विधीयमान अण् अपने सवर्णों का ग्राहक नहीं होता— यह पीछे अणुदित्० (११) सूत्र में कहा गया है । इस नियमानुसार ऋत उत् यहां विधीयमान उकार से सवर्णों का ग्रहण न होगा । इस से दीर्घ ऊकार आदि के एका-