भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 633 में से

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पृष्ठ 275

२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ६ अतिलक्ष्म्यै । ७ सुधियि । ८ यवक्रियौ । ६ प्रध्यै । १० बहु- श्रेयसीनाम् । [यहाँ ईकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है] —: ० :— अब ह्रस्व उकारान्त शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] शम्भुहरिवत् । एवम्—भानवादयः ॥ अर्थ—शम्भु (भगवान् शिव) शब्द के रूप हरिशब्द के समान होते हैं । इसी प्रकार भानु (सूर्य), आदि अन्य उकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों के भी रूप होते हैं । व्याख्या—शम्भु शब्द की ह्रस्व उकारान्त होने से 'हरि' के समान शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा होती है, अतः घिसञ्ज्ञा के कार्य 'हरि' शब्द के समान ही होंगे । यहां गुण उकार के स्थान पर ओकार ही होगा । रूपमाला यथा— प्र० शम्भुः शम्भू शम्भवः ‡ । प० शम्भोः * शम्भुभ्याम् शम्भुभ्यः द्वि० शम्भुम् " शम्भून् । ष० " शम्भोः शम्भूनाम् तृ० शम्भुना† शम्भुभ्याम् शम्भुभिः । स० शम्भौ≠ " शम्भुषु च० शम्भवे √ " शम्भुभ्यः । स० हे शम्भो! @ हे शम्भू! हे शम्भवः ! ‡जसि च (१६८) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । †घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना हो जाता है । √घेर्डिति (१७२) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । घेर्डिति (१७२) से गुण तथा ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो जाता है । ≠अच्च घे (१७४) से ङि को औ तथा घि को अत् हो जाता है । @ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर 'एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः' (१३४) से सुँलोप हो जाता है । इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप बनेंगे— [णत्वविधि का चिह्न है] शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अजातशत्रु = युधिष्ठिर | अंशु = किरण | इषु = बाण अणु = परमाणु | आखु = चूहा | उन्दुरु* = चूहा अध्वर्यु* = यजुर्वेद ज्ञाता | आगन्तु = आगन्तुक | ऊरु* = पटू अनूरु* = सूर्य का सारथि | इक्षु* = गन्ना | ऊर्णायु = मेष-मेढ़ा अन्धु = कुँआ | इक्ष्वाकु* = एक राजा | ऋजु = सरल अभीषु* = किरण, लगाम | इच्छु = चाहने वाला | ऋतु = मौसम असु = प्राण | इन्दु = चन्द्र | ओतु = बिल्ला कटु¹ = तीखा १ भाषा में आजकल मरिच, पिप्पली आदि को तिक्त अर्थात् तीखा तथा निम्ब आदि को कटु समझा जाता है । परन्तु वैद्यकशास्त्रों में ठीक इस से विपरीत

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