लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५६ में क्त प्रत्यय के तकार के स्थान पर नकार, मकार आदि आदेश होते हैं । ये आदेश त्रिपादीस्थ होने से ह्यत्यात् परस्य (१८३) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध हैं अतः उस से उकार आदेश करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । अभ्यास (३०) (१) यदि प्रादियों की गतिसञ्ज्ञा न कर उपसर्गसञ्ज्ञा से ही काम चलाया जाये तो क्या दोष उत्पन्न होगा ? (२) इन चार शब्दों में विग्रहभेद से सुवन्त-रूपों में कौन २ सा भेद हो सकता है ? सविस्तर लिखें । प्रधी $प्रध्यायतीति प्रधीः । प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधीः ।$ सुश्री $सुश्रयतीति सुश्रीः । सु (शोभना) श्रीर्यस्य स सुश्रीः ।$ सुधी $सुध्यायतीति सुधीः । सु (शोभना) धीर्यस्य स सुधीः ।$ शुद्धधी $शुद्धा धीर्यस्य स शुद्धधीः । शुद्धं ध्यायतीति शुद्धधीः ।$ (३) अजादि प्रत्ययों के परे रहते निम्नलिखित शब्दों में कहां यण् और कहां इयङ् होता है ? कारणनिर्देशपूर्वक तत्तद्विधायक सूत्र लिखें— १. प्रस्तीमी । २. ग्रामणी । ३. सुधी । ४ यवक्री । ५. मन्दधी । ६. सुश्री । ७. प्रधी । ८. सुखी । ९. नी । १०. सुती । (४) निम्नलिखित शब्दों में अजादि सुँप् के परे रहते यण् हो या इयङ् ? १. पपी । २. बहुश्रेयसी । ३. अतिलक्ष्मी । ४. ययी । (५) (क) किस २ विभक्ति में नदीसञ्ज्ञा के कारण अन्तर होता है ? (ख) अग्रणी तथा सेनानी शब्द के अम् तथा आम् में क्या रूप बनेंगे ? (ग) 'सुध्युपास्यः' में न भूसुधियोः द्वारा यण्निषेध क्यों नहीं होता ? (घ) 'हे बहुश्रेयसि' में ह्रस्वस्य गुणः द्वारा गुण क्यों नहीं होता ? (६) सन्धि-प्रकरण में सवर्णदीर्घ के द्वारा यण् का, और इस प्रकरण में यण् के द्वारा सवर्णदीर्घ का बाध होता है—इस कथन की पुष्टि सोदाहरण प्रमाणनिर्देशपूर्वक करते हुए प्रधी और पपी शब्द के सप्तमी के एक- वचन का रूप सिद्ध करें । (७) सूत्रों की व्याख्या करें— १. अचि श्नु०, २. एरनेकाचः०, ३. यू स्त्र्याख्यौ नदी, ४. न भूसुधियोः । (८) यदागमास्तद्गुणीभूताः०, क्विबन्ता धातुत्वम्०, प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च, गतिकारकेतर०, विप्रतिषेधे यद्० इन वचनों का तात्पर्य स्पष्ट करें । (६) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. सुत्युः । २. नियाम् । ३. शुद्धधियो । ४. बहुश्रेयसि । ५. पपी ।