लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् वहा यण्, अजादि सुँप् को मान कर नही अपितु 'उपास्य' के उकार को मान कर प्रवृत्त होता है। [लघु०] सुखमिच्छतीति—सुखी। सुतमिच्छतीति—सुती। सुख्यौ। सुत्यौ। सुख्युः। सुत्युः। शेषं प्रधीवत् ॥ व्याख्या—सुखम् आत्मन इच्छतीति—सुखी । जो अपने लिये सुख चाहे उसे 'सुखी' कहते हैं। सुतम् आत्मन इच्छतीति—सुती । जो अपने लिये सुत—पुत्र चाहे उसे 'सुती' कहते हैं। इन शब्दो की साधनप्रक्रिया पर विशेष ध्यान देना चाहिये। तथाहि—'सुख+अम्' तथा 'सुत+अम्' इन सुंवन्तो स सुप आत्मन क्यच् (७२०) सूत्र द्वारा क्यच् प्रत्यय हो कर सनाद्यन्ता धातव (४६८) म 'सुख अम् क्यच्' तथा 'सुत अम् क्यच्' इन समुदायो की धातुसञ्ज्ञा हो जाती है। अब सुँपो धातु प्राति- पदिकयो (७२१) सूत्र से अम् का लुक हो कर क्यचि च (७२२) से अकार को ईकार करने पर 'सुखीय, सुतीय' रूप बन जाते हैं। इन का अर्थ क्रमश 'अपने लिये सुख चाहना' और 'अपने लिये पुत्र चाहना' है। अब इन धातुओ स कर्ता अर्थ मे क्विप् च (८०२) सूत्र स क्विप् प्रत्यय कर अतो लोप (४७०) स अकारलोप तथा लोपो व्योर्वलि (४२६) म यकार का लोप हो कर—'सुखी' और 'सुती' शब्द निष्पन्न होने है। क्विबन्ता धातुत्वं न जहति इस नियमानुसार इन की धातुसञ्ज्ञा भी अक्षत है। सुखी+स्(सुँ), सुती+स्(सुँ)' यहा इदुदन्त न होने से सुँ का लोप नही होता। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो कर—सुखी, सुती। सुखी+औ, सुती+औ' यहा अनादि प्रत्ययो मे सर्वत्र धातु के ईकार को एरनेकाच ० (२००) से यण् होता चला जायेगा—सुख्यौ सुत्यौ। सुखी+अम् (ङसिँ वा ङस्), सुती+अम्(ङसिँ वा ङस्)' यहा प्रथम एरने- काच ०(२००) म यण् हो—'सुख्य्+अस्, सुत्य्+अस्' बन जाता है। तब एरनेयान् परस्य १८३) सूत्र से अकार को उकार हो सुख्यु, सुत्यु' प्रयोग निष्पन्न होते हैं। इन शब्दो की रूपमाला यथा— सुखी (अपने लिये सुख चाहने वाला) | सुती (अपने लिये पुत्र चाहने वाला) प्र० सुखी सुख्यौ सुख्य | प्र० सुती सुत्यौ सुत्य द्वि० मुख्यम् ,, ,, | द्वि० मुत्यम् ,, ,, तृ० सुख्या सुखीभ्याम् सुखीभि | तृ० सुत्या सुनीभ्याम् सुनीभि च० सुख्ये ,, सुखीभ्य | च० सुत्ये ,, मुतीभ्य प० सुख्यु ,, ,, | प० सुत्यु ,, ,, ष० ,, सुख्यो सुख्याम् | ष० ,, सुत्यो सुत्याम् स० मुख्यि ,, सुखीषु | स० मुख्यि ,, सुनीपु स० हे सुखी। हे सुख्यौ! हे मुख्य ! | स० हे मुनी! हे मुत्यौ! हे मुत्य ! इसी प्रकार—लूती, क्षामी, प्रस्नीमी आदि शब्दों के रूप होते हैं। इन शब्दो