लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५६ में क्त प्रत्यय के तकार के स्थान पर नकार, मकार आदि आदेश होते हैं । ये आदेश त्रिपादीस्थ होने से ह्यत्यात् परस्य (१८३) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध हैं अतः उस से उकार आदेश करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती । अभ्यास (३०) (१) यदि प्रादियों की गतिसञ्ज्ञा न कर उपसर्गसञ्ज्ञा से ही काम चलाया जाये तो क्या दोष उत्पन्न होगा ? (२) इन चार शब्दों में विग्रहभेद से सुवन्त-रूपों में कौन २ सा भेद हो सकता है ? सविस्तर लिखें । प्रधी $प्रध्यायतीति प्रधीः । प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधीः ।$ सुश्री $सुश्रयतीति सुश्रीः । सु (शोभना) श्रीर्यस्य स सुश्रीः ।$ सुधी $सुध्यायतीति सुधीः । सु (शोभना) धीर्यस्य स सुधीः ।$ शुद्धधी $शुद्धा धीर्यस्य स शुद्धधीः । शुद्धं ध्यायतीति शुद्धधीः ।$ (३) अजादि प्रत्ययों के परे रहते निम्नलिखित शब्दों में कहां यण् और कहां इयङ् होता है ? कारणनिर्देशपूर्वक तत्तद्विधायक सूत्र लिखें— १. प्रस्तीमी । २. ग्रामणी । ३. सुधी । ४ यवक्री । ५. मन्दधी । ६. सुश्री । ७. प्रधी । ८. सुखी । ९. नी । १०. सुती । (४) निम्नलिखित शब्दों में अजादि सुँप् के परे रहते यण् हो या इयङ् ? १. पपी । २. बहुश्रेयसी । ३. अतिलक्ष्मी । ४. ययी । (५) (क) किस २ विभक्ति में नदीसञ्ज्ञा के कारण अन्तर होता है ? (ख) अग्रणी तथा सेनानी शब्द के अम् तथा आम् में क्या रूप बनेंगे ? (ग) 'सुध्युपास्यः' में न भूसुधियोः द्वारा यण्निषेध क्यों नहीं होता ? (घ) 'हे बहुश्रेयसि' में ह्रस्वस्य गुणः द्वारा गुण क्यों नहीं होता ? (६) सन्धि-प्रकरण में सवर्णदीर्घ के द्वारा यण् का, और इस प्रकरण में यण् के द्वारा सवर्णदीर्घ का बाध होता है—इस कथन की पुष्टि सोदाहरण प्रमाणनिर्देशपूर्वक करते हुए प्रधी और पपी शब्द के सप्तमी के एक- वचन का रूप सिद्ध करें । (७) सूत्रों की व्याख्या करें— १. अचि श्नु०, २. एरनेकाचः०, ३. यू स्त्र्याख्यौ नदी, ४. न भूसुधियोः । (८) यदागमास्तद्गुणीभूताः०, क्विबन्ता धातुत्वम्०, प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च, गतिकारकेतर०, विप्रतिषेधे यद्० इन वचनों का तात्पर्य स्पष्ट करें । (६) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. सुत्युः । २. नियाम् । ३. शुद्धधियो । ४. बहुश्रेयसि । ५. पपी ।
२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ६ अतिलक्ष्म्यै । ७ सुधियि । ८ यवक्रियौ । ६ प्रध्यै । १० बहु- श्रेयसीनाम् । [यहाँ ईकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है] —: ० :— अब ह्रस्व उकारान्त शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] शम्भुहरिवत् । एवम्—भानवादयः ॥ अर्थ—शम्भु (भगवान् शिव) शब्द के रूप हरिशब्द के समान होते हैं । इसी प्रकार भानु (सूर्य), आदि अन्य उकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों के भी रूप होते हैं । व्याख्या—शम्भु शब्द की ह्रस्व उकारान्त होने से 'हरि' के समान शेषो घ्यसखि (१७०) सूत्र से घिसञ्ज्ञा होती है, अतः घिसञ्ज्ञा के कार्य 'हरि' शब्द के समान ही होंगे । यहां गुण उकार के स्थान पर ओकार ही होगा । रूपमाला यथा— प्र० शम्भुः शम्भू शम्भवः ‡ । प० शम्भोः * शम्भुभ्याम् शम्भुभ्यः द्वि० शम्भुम् " शम्भून् । ष० " शम्भोः शम्भूनाम् तृ० शम्भुना† शम्भुभ्याम् शम्भुभिः । स० शम्भौ≠ " शम्भुषु च० शम्भवे √ " शम्भुभ्यः । स० हे शम्भो! @ हे शम्भू! हे शम्भवः ! ‡जसि च (१६८) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । †घिसञ्ज्ञा होने से आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना हो जाता है । √घेर्डिति (१७२) से गुण हो अव् आदेश हो जाता है । घेर्डिति (१७२) से गुण तथा ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो जाता है । ≠अच्च घे (१७४) से ङि को औ तथा घि को अत् हो जाता है । @ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर 'एङ्घ्रस्वात् सम्बुद्धेः' (१३४) से सुँलोप हो जाता है । इसी प्रकार निम्नलिखित शब्दों के रूप बनेंगे— [णत्वविधि का चिह्न है] शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अजातशत्रु = युधिष्ठिर | अंशु = किरण | इषु = बाण अणु = परमाणु | आखु = चूहा | उन्दुरु* = चूहा अध्वर्यु* = यजुर्वेद ज्ञाता | आगन्तु = आगन्तुक | ऊरु* = पटू अनूरु* = सूर्य का सारथि | इक्षु* = गन्ना | ऊर्णायु = मेष-मेढ़ा अन्धु = कुँआ | इक्ष्वाकु* = एक राजा | ऋजु = सरल अभीषु* = किरण, लगाम | इच्छु = चाहने वाला | ऋतु = मौसम असु = प्राण | इन्दु = चन्द्र | ओतु = बिल्ला कटु¹ = तीखा १ भाषा में आजकल मरिच, पिप्पली आदि को तिक्त अर्थात् तीखा तथा निम्ब आदि को कटु समझा जाता है । परन्तु वैद्यकशास्त्रों में ठीक इस से विपरीत
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६१
| शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ |
|---|---|---|
| कारु* = कारीगर | दयालु = दया वाला | भिक्षु* = याचक |
| कृशानु = अग्नि | दस्यु = डाकू | भीरु* = डरपोक |
| केतु = झण्डा वा एक ग्रह | दिदृक्षु* = दर्शनाभिलाषी | भृगु* = एक ऋषि |
| ऋतु = यज्ञ | देवगुरु* = बृहस्पति | मञ्जु = सुन्दर |
| क्षवथु = खांसी | देवदारु* = दियार वृक्ष | मधु = वसन्त |
| गुग्गुलु = गूगल | धातु = सुवर्णादि धातु | मनु = पहला राजा |
| गुरु* = गुरु | निद्रालु = निद्राशील | मन्यु = क्रोध |
| गृध्नु = लालची | पङ्गु = लङ्गड़ा | मरु* = रेगिस्तान |
| गोमायु = गीदड़ | पटु = चतुर | मित्रयु* = मित्रवत्सल |
| चण्डांशु = सूर्य | परमाणु = ज़र्रा | मुमूर्षु* = मरणेच्छुक |
| चरिष्णु = चालाक | परशु = कुल्हाड़ा | मृगयु* = शिकारी |
| चरु* = हव्यान्न | पर्शु = कुल्हाड़ा | मृत्यु = मौत |
| चिकीर्षु* = करणेच्छुक | पलाण्डु = प्याज़ | मेरु* = एक पर्वत |
| जन्तु = प्राणी | पशु = जानवर | यदु = प्रसिद्ध नृप |
| जायु = औषध | पाण्डु = प्रसिद्ध नृप | रघु* = प्रसिद्ध नृप |
| जिगीषु* = जयेच्छुक | पायु = गुदा | रङ्कु* = मृग-विशेष |
| जिघत्सु = भूखा | पांशु = धूलि | राहु* = ग्रह-विशेष |
| जिज्ञासु = ज्ञानेच्छुक | पांसु = ,, | रिपु* = शत्रु |
| जिष्णु = इन्द्र वा अर्जुन | पिचु = कपास | रेणु = धूलि |
| जीवातु = जीवन-औषध | पिपासु = प्यासा | लघु = छोटा |
| तनु = पतला | पीलु = पीलु का वृक्ष | वटु = ब्रह्मचारी |
| तन्तु = तागा | पुरु* = प्रसिद्ध नृप | वनायु = अरब देश |
| तन्द्रालु = ऊंघनेवाला | पृथु = प्रसिद्ध नृप | वन्दारु* = वन्दनशील |
| तरक्षु* = विशेष भेड़िया | प्रज्ञु = टेढ़े घुटनों वाला | वमथु = वमन |
| तरु* = वृक्ष | प्रभु* = स्वामी | वायु = हवा |
| तिग्मांशु = सूर्य | प्रांशु = उन्नत | विधु = चन्द्र |
| तितउ = चलनी | बन्धु = बान्धव | बिन्दु = बूंद |
| तुहिनांशु = चन्द्र | बाहु = भुजा | विभावसु = अग्नि, सूर्य |
| -त्सरु* = तलवार की मूठ | बुभुक्षु* = भूखा | विभु = व्यापक |
| दद्रु* = रोग-विशेष | भानु = सूर्य | विष्णु = भगवान् विष्णु |
| ' होता है। वहां मरिच आदि को 'कटु' तथा निम्ब आदि को 'तिक्त' कहा जाता | ||
| है। अत एव 'त्रिकटु' शब्द से आयुर्वेद में—'काली मिर्च, पिप्पली, शुण्ठी' इन | ||
| तीनों का ग्रहण होता है। |
२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ वेणु=बास | शीतगु=चन्द्र | सूनु=पुत्र वेपथु=कापना | श्रद्धालु=श्रद्धालु | सेतु=पुल व्यथु=मृग | श्वयथु=सूजन-शोथ | स्तनयित्नु=बादल शङ्कु=कील | सक्तु=सत्तु | स्थाणु=शाखाहीन वृक्ष शत्रु*=दुश्मन | साधु=सज्जन | स्वर्भानु=राहु शयालु=निद्राशील | सानु=पर्वत की चोटी | स्वादु=स्वादिष्ट शयु=अजगर | सिन्धु=सागर | हिमांशु=चन्द्र शरु*=हिंस्र | सीधु=मद्यविशेष | हेतु=कारण शिशु=बालक | सुधाथु=चन्द्र | शम्भु शब्द की अपेक्षा क्रोष्टु (गीदड़। शृगाल-वञ्चक-क्रोष्टु-फेरु-फेरब-जम्बुकाः इत्यमरः) शब्द के रूपों में अन्तर पड़ता है। अतः अब उस का वर्णन करते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२०३) तृज्वत् क्रोष्टुः।७।१।९५॥ असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने 'क्रोष्टृ' शब्दः प्रयोक्तव्य इत्यर्थः ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' शब्द प्रयुक्त करना चाहिये—यह सूत्र का तात्पर्य है (अर्थ नहीं। अर्थ व्याख्या में देखें)। व्याख्या—तृज्वत् इत्यव्ययपदम्। क्रोष्टु १।१। असम्बुद्धौ ७।१। (सख्युर- सम्बुद्धौ से)। सर्वनामस्थाने ७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से)। तृचा तुल्यम्—तृज्वत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८) इति वतिप्रत्ययः। प्रत्ययग्रहणपरिभाषा से तृजन्त का ग्रहण होता है। 'तृज्वत्' का अर्थ है—तृजन्त के समान। अर्थ—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे रहते (क्रोष्टु) क्रोष्टु शब्द (तृज्वत्) तृच्प्रत्ययान्त के समान होता है। यह अतिदेश-सूत्र है; अतिदेश कई प्रकार के होते हैं, यहां रूपातिदेश है। तृजन्त शब्द—कर्तृ, हर्तृ, दातृ आदि अनेक हैं, इन मे से यहां क्रोष्टु शब्द के स्थान पर कौन सा तृजन्त हो ? इस का उत्तर यह है कि स्थानेऽन्तरतमः (१७) से अर्थकृत आन्तर्य [अर्थ के तुल्य होने से जो सादृश्य देखा जाता है उसे अर्थकृत आन्तर्य कहते हैं] द्वारा 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' ही तृजन्त आदेश होगा। क्रोष्टु और क्रोष्टृ दोनों का एक ही अर्थ है। 'क्रोष्टु+स्' (सुँ) यहां सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान 'सुँ' परे है, अतः क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो—'क्रोष्टृ+स्' हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०४) ऋतो ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।३।११०। ऋदन्तोऽङ्गस्य गुणो ङौ सर्वनामस्थाने च। इति प्राप्ते— अर्थः—ङि अथवा सर्वनामस्थान परे होने पर ऋदन्त अङ्ग के स्थान पर गुण
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६३ हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर (अग्रिम सूत्र इस का बाध कर लेता है)। व्याख्या—ऋतः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से)। ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।२। समासः—ङिश्च सर्वनामस्थानञ्च = ङिसर्वनामस्थाने, तयोः = ङिसर्वनामस्थानयोः, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'ऋतः' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(ऋतः) ऋदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (गुणः) गुण होता है (ङिसर्वनामस्थानयोः) ङि अथवा सर्वनामस्थान परे हो तो। अलोऽन्त्यपरिभाषा तथा इको गुणवृद्धी (१.१.३) परिभाषा से अन्त्य ऋवर्ण के स्थान पर ही गुण (अ) होगा। उरण्रपरः (२६) द्वारा रपर हो 'अर्' हो जायेगा। 'क्रोष्टृ+स्' यहां 'सुं' सर्वनामस्थान परे है अतः प्रकृत-सूत्र से ऋवर्ण के स्थान पर 'अर्' गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र निषेध कर अनँङ् आदेश कर देता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०५) ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ।७।१।९४॥ ऋदन्तानाम् उशनसादीनां चानँङ् स्यादसम्बुद्धौ सौ ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सुं परे होने पर ऋदन्तों तथा उशनस् (शुक्र आचार्य), पुरुदंसस् (बिल्ली) और अनेहस् (समय) शब्दों को अनँङ् आदेश हो। व्याख्या—असम्बुद्धौ ।७।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। अनँङ् ।१।१। (अनँङ् सौ से)। ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य अधि- कार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। च इत्यव्ययपदम्। समासः—ऋच्च उशना च पुरुदंसा च अनेहा च = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसः, तेषाम् = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'ऋदुशनस्०' पद से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे हो तो (ऋदुशनस्पुरुदंसो- ऽनेहसाम्) ऋदन्त, उशनस्शब्दान्त, पुरुदंसस्शब्दान्त तथा अनेहस्शब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों के स्थान पर (अनँङ्) अनँङ् आदेश होता है। अनँङ् आदेश में ङकार इत्सञ्ज्ञक है, अकार उच्चारणार्थ है। 'अन्' ही अव- शिष्ट रहता है। ङित् होने से यह आदेश ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा अन्त्य अल् —ऋवर्ण या सकार के स्थान पर होगा। किञ्च ध्यान रहे कि केवल उशनस् आदि शब्दों के स्थान पर भी व्यपदेशिवद्भाव (२७८) से अनँङ् आदेश हो जायेगा। 'क्रोष्टृ + स्' यहां सम्बुद्धिभिन्न सुं परे है अतः प्रकृत सूत्र से ऋकार को अनँङ् आदेश हो अनुबन्ध-लोप करने पर—'क्रोष्टन् + स्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०]विधि-सूत्रम्—(२०६) अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ-नप्तृ-नेष्टृ-त्वष्टृ-क्षत्तृ-होतृ- पोतृ-प्रशास्तॄणाम् ।६।४।११॥ अबादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः । क्रोष्टारम्, क्रोष्टॄन् ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर अप्, तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्यया-
२६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् न्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ शब्दो की उपधा को दीर्घ हो । व्याख्या—अप्-तृन्—प्रशास्तॄणाम् ।६।३। उपधाया ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घ ।१।१। (ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से) । समास — आपश्च तृन् च तृच् च स्वसा च नप्ता च नेष्टा च त्वष्टा च क्षत्ता च होता च पोता च प्रशास्ता च = अप्तृन्तृच्—प्रशास्तारः, तेषाम् = अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । तृन् और तृच् प्रत्यय हैं अतः प्रत्यय- ग्रहणपरिभाषा द्वारा तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ — (अप्तृन्—प्रशास्तॄणाम्) अप्, तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्ययान्त, स्वसृ, नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ तथा प्रशास्तृ शब्दो की (उपधाया ) उपधा के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर । अन्त्य वर्ण से पूर्व वर्ण उपधासञ्ज्ञक होता है—यह पीछे (१७६) सूत्र पर कहा जा चुका है । इस सूत्र पर विशेष विचार स्वयं ग्रन्थकार आगे ऋदन्त प्रकरण में करेंगे; अतः हम भी उस की वही व्याख्या करेंगे । 'क्रोष्टन् + स्' यहाँ एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार 'क्रोष्टन्' शब्द तृजन्त है । इस की उपधा नकार से पूर्व टकारोत्तर अकार है । सम्बुद्धिभिन्न सुँ = सर्वनाम- स्थान परे है ही, अतः प्रकृतसूत्र से उपधा को दीर्घ हो गया तो—'क्रोष्टान् + स्' । इस स्थिति में हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सकार का लोप हो कर न लोपः प्राति- पदिकान्तस्य (१८०) से नकार का भी लोप हो जाने से—'क्रोष्टा' प्रयोग सिद्ध हुआ । नोट—यद्यपि सुं मे सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) सूत्र द्वारा भी उपधा- दीर्घ सिद्ध हो सकता था तथापि औ, जस् आदियों मे नान्त न होने से उपधादीर्घ अप्राप्त था अतः प्रकृतसूत्र का बनाना आवश्यक था । तब यह सुँ मे न्यायवशात् प्रवृत्त हो जाता है । 'क्रोष्टु + औ = क्रोष्टृ + औ' यहाँ सुँ परे न होने से अनङ् आदेश नही होता । ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर— क्रोष्टारौ । क्रोष्टु + अस् (जस्) = क्रोष्टृ + अस् । यहाँ भी पूर्ववत् गुण और उपधादीर्घ करने पर 'क्रोष्टारः' प्रयोग सिद्ध होता है । क्रोष्टु + अम् = क्रोष्टृ + अम् । गुण और उपधादीर्घ हो—'क्रोष्टारम्' । ध्यान रहे कि यह गुण, पूर्वसवर्णदीर्घ तथा अमि पूर्वः (१३५) आदि का अपवाद है । 'क्रोष्टु + अस् (शस्)' यहाँ सर्वनामस्थान परे न होने से तृज्वद्भाव नही होता । पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को नकार करने से 'क्रोष्टून्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'क्रोष्टु + आ (टा)' यहाँ वैकल्पिक तृज्वद्भाव का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०७) विभाषा तृतीयादिष्वचि ।७।१।९७॥ अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्टुर्वा तृज्वत् । क्रोष्ट्रा । क्रोष्ट्रे ॥
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६५ अर्थः—अजादि तृतीयादि विभक्ति परे हो तो 'क्रोष्टु' विकल्प से तृज्वत् हो । व्याख्या—क्रोष्टुः ।१।१। तृज्वत् इत्यव्ययपदम् । (तृज्वत्क्रोष्टुः से)। विभाषा इत्यव्ययपदम् । तृतीयादिषु ।७।३। अचि ।७।१। 'अचि' पद 'तृतीयादिषु' का विशेषण है, अतः तदादिविधि हो कर 'अजादिषु' बन जायेगा । अर्थः—(अचि) अच् जिस के आदि में है ऐसी (तृतीयादिषु) तृतीया आदि विभक्ति परे हो तो (क्रोष्टुः) क्रोष्टुशब्द (विभाषा) विकल्प कर के (तृज्वत्) तृजन्त के समान होता है । तृतीयादि विभक्तियों में अजादि विभक्तियां आठ हैं । १ टा (आ), २ ङे (ए), ३ ङसिँ (अस्), ४ ङस् (अस्), ५ ओस्, ६ आम्, ७ ङि (इ), ८ ओस् । जिस पक्ष में क्रोष्टृ आदेश न होगा वहां सर्वत्र घिसञ्ज्ञा हो कर 'शम्भु' शब्द के समान प्रक्रिया होगी । तृतीया के एकवचन में 'क्रोष्टु + आ' इस स्थिति में अजादि तृतीयादि विभक्ति परे होने से विकल्प से तृज्वद्भाव हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में 'क्रोष्टृ + आ' इस स्थिति में इको यणचि (१५) से ऋकार को रेफ आदेश हो कर 'क्रोष्ट्रा' प्रयोग सिद्ध हुआ । तृज्वत् के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर टा को ना आदेश करने पर 'क्रोष्टुना' रूप सिद्ध होता है । भ्याम्, भिस्, भ्यस् और सुप् तृतीयादि होने पर भी हलादि हैं, अतः इन में तृज्वद्भाव न होगा— क्रोष्टुभ्याम्, क्रोष्टुभिः, क्रोष्टुभ्यः, क्रोष्टुषु । चतुर्थी के एकवचन में 'क्रोष्टु + ए' इस दशा में विकल्प कर के तृज्वद्भाव हुआ । तृज्वद्भावपक्ष में यण् हो— 'क्रोष्ट्रे' रूप सिद्ध हुआ । तदभावपक्ष में घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण हो कर अव् आदेश करने से—'क्रोष्टवे' रूप सिद्ध होता है । तृज्वद्भावपक्ष में पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'क्रोष्टृ + अस्' इस दशा में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (२०८) ऋत उत् ।६।१।१०७॥ ऋतो ङसिँ-ङसोरति उद् एकादेशः । रपरः ।। अर्थः—ऋत् से ङसिँ अथवा ङस् का अत् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर उत् एकादेश हो । उरण्रपरः (२६) से रपर भी हो जायेगा । व्याख्या—ऋतः ।५।१। ङसिँ-ङसोः ।६।२। (ङसिँ-ङसोश्च से) । अति ।७।१। (एङः पदान्तादति से)। पूर्व-परयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। उत् ।१।१। अर्थः—(ऋतः) ह्रस्व ऋकार से (ङसिँ-ङसोः) ङसिँ अथवा ङस् का (अति) अत् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (एकः) एक (उत्) ह्रस्व उकार आदेश होता है । उरण्रपरः (२६) से रपर हो कर 'उर्' आदेश बन जायेगा । प्रश्न—प्रत्यय अर्थात् विधीयमान अण् अपने सवर्णों का ग्राहक नहीं होता— यह पीछे अणुदित्० (११) सूत्र में कहा गया है । इस नियमानुसार ऋत उत् यहां विधीयमान उकार से सवर्णों का ग्रहण न होगा । इस से दीर्घ ऊकार आदि के एका-
२६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् देश होने की आशङ्का नहीं की जा सकती। तो पुनः ऋत उत् में उकार को तपर करने का क्या प्रयोजन है ? उत्तर—यहा उकार को तपर करने से आचार्य यह जनाना चाहते हैं कि— भाव्यमानोऽप्यण् क्वचित् सवर्णान् गृह्णाति अर्थात् कहीं २ विधीयमान भी अण् अपने सवर्णों का ग्राहक हुआ करता है। अत एव—यवलपरे यवला वा (वा० १३) वार्तिक द्वारा अनुनासिक यकार आदिया का विधान हो जाता है। इसी प्रकार—अदसोऽसेर्दादु दो म. (३५६) सूत्र मे प्राचीन वैयाकरणो ने उकार से ह्रस्व और दीर्घ दोना प्रकार के उकारो का ग्रहण किया है। यहा का विशेष विवेचन सिद्धान्त-कौमुदी की टीकाओ में देखें। 'क्रोष्टृ + अस्' यहा ऋत् से परे ङसिं वा ङस् का अत् विद्यमान है, अत प्रकृत- सूत्र से पूर्व (ऋ) और पर (अ) के स्थान पर उर् एकादश हो—'क्रोष्ट् उर् स्' हुआ। अब अग्रिम नियम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्—(२०६) रात् सस्य ॥८।२।२४॥ रेफात् संयोगान्तस्य सस्यैव लोपो नान्यस्य। रेफस्य विसर्ग । क्रोष्टुः । क्रोष्ट्रोः ॥ अर्थ.—रेफ से परे यदि संयोगान्तलोप हो तो सकार का ही हो, अन्य का नहीं। व्याख्या—रात् ।५।१। संयोगान्तस्य ।६।१। सस्य ।६।१। लोप ।१।१। (संयो- गान्तस्य लोप. म)। रेफ से परे संयोगान्त सकार का लोप संयोगान्तस्य लोप. (२०) से ही सिद्ध हो जाता है, पुन इस का कथन सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ. के अनुसार निय- मार्थ है। अत 'एव' पद प्राप्त हो जाना है। अर्थ —(रात्) रेफ से परे (संयोगान्त- स्य) संयोग के अन्त में वर्तमान (सस्य) सकार का (एव) ही (लोप ) लोप होता है, अन्य किसी वर्ण का नहीं। उदाहरण यथा—'ऊर्क्'। नपुंसक ऊर्ज् शब्द से सुं का लुक् (२४४) होने पर संयोगान्तस्य लोप.(२०) द्वारा जकार का लोप प्राप्त होता है, वह अब इस नियम के कारण नहीं होता। नोट—ध्यान रहे कि नियमसूत्रों के उदाहरण वही होते हैं जो लोक मे प्रत्यु- दाहरण समझे जाते हैं। नियमसूत्रो की चरितार्थता भी इसी में है। पति समास एव (१८४) का उदाहरण वस्तुत 'पत्ये' ही है, 'भूपतये' नही, इसी प्रकार रात्सस्य (२०६) का उदाहरण 'ऊर्क' ही है, 'क्रोष्टु.' नहीं। बालको के बोध के लिय ही 'भूपतये' आदि रूपो में नियमसूत्रों की प्रवृत्ति दर्शाई गई है। 'क्रोष्ट् उर् स्' यहा पर रात्सस्य (२०६) की सहायता से संयोगान्तस्य लोप. (२०) द्वारा सकार का लोप हो कर अवसान में खरवसानयो ०(६३) ? रेफ को विसर्ग करने से 'क्रोष्टु ' रूप सिद्ध होता है। तृज्वद्भाव के अभाव मे घिसज्ञा होकर घेर्डिति (१७२) से गुण तथा ङसि-ङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप होकर 'क्रोष्टो' प्रयोग बनता है।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६७ षष्ठी के द्विवचन में 'क्रोष्टु + ओस्' इस दशा में तृज्वद्भाव हो कर यण् करने से—'क्रोष्ट्रोः' । तदभावपक्ष में भी उकार को वकार होकर—'क्रोष्ट्वोः' । षष्ठी के बहुवचन में 'क्रोष्टु + आम्' इस दशा में तृज्वद्भाव तथा ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् युगपत् प्राप्त होते हैं। दोनों सावकाश हैं। नुट् को 'हरीणाम्' आदि में तथा तृज्वद्भाव को 'क्रोष्ट्रा' आदि में अवकाश प्राप्त हो चुका है। इस पर विप्र- तिषेधे परं कार्यम् (११३) से पर कार्य होने के कारण तृज्वद्भाव ही प्राप्त होता है। अब अग्रिम वार्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(१६) नुँम्-अचिर-तृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ क्रोष्टूनाम् । क्रोष्टरि । पक्षे हलादौ च शम्भुवत् ॥ अर्थः—नुँम्, अच् परे होने पर रेफादेश [अचि र ऋतः (२२५) से] और तृज्वद्भाव—इन से पूर्वविप्रतिषेध के कारण नुट् हो जाता है। व्याख्या—तुल्य बल वाले दो कार्यों का प्रतिषेध होने पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) द्वारा अष्टाध्यायीक्रमानुसार परकार्य विधान किया जाता है। इस से —मनोरथः, रामेभ्यः आदि प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। परन्तु ऐसा करने से व्याकरण में कहीं कहीं दोष भी आ जाते हैं। क्योंकि वहां परकार्य करना इष्ट नहीं हुआ करता, पूर्वकार्य करना ही अभीष्ट होता है। तो उन दोषों की निवृत्ति के लिये विप्रतिषेधे परं कार्यम् सूत्र को विप्रतिषेधेऽपरं कार्यम् इस प्रकार पढ़ अपर अर्थात् पूर्वकार्य का विप्रति- षेध में विधान कर इष्ट सिद्ध किया जाता है। परन्तु कहां कहां 'अपरम् कार्यम्' छेद करें—इस के लिये भगवान् कात्यायन ने अपने वार्तिकों में उन उन स्थानों का परि- गणन कर दिया है। यह वार्तिक उन में से एक है। इन परिगणित स्थानों के अति- रिक्त सर्वत्र परकार्य और इन में पूर्वकार्य होगा। भाष्यकार भगवान् पतञ्जलि 'पर' शब्द को इष्टवाची मान कर दोष निवृत्त कर लेते हैं। यथा—अस्तीष्टवाची परशब्दः, तद्यथा—'परं धाम गतः' । इष्टं धाम गत इति गम्यते । तद् य इष्टवाची परशब्दस्तस्येदं ग्रहणम् । विप्रतिषेधे परं यद् इष्टं तद् भवतीति । नुँम् [इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से], अच् परे होने पर रेफादेश [अचि र ऋतः (२२५) से] और तृज्वद्भाव [तृज्वत्क्रोष्टुः (२०३), विभाषा तृतीयादिष्वचि (२०७) से]—इन तीन कार्यों के साथ यदि नुट् [ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८)] का विप्रतिषेध हो तो नुट् ही होता है। वे तीनों यद्यपि अष्टाध्यायी में सूत्रक्रमानुसार पर हैं और इन की अपेक्षा नुट् पूर्व है तथापि नुट् हो जाता है। नुँम् तथा अच् परे होने पर रेफादेश के साथ नुट् के विप्रतिषेध के उदाहरण आगे 'वारि' और 'तिसृ' शब्दों पर स्पष्ट किये गये हैं। यहां तृज्वद्भाव के साथ नुट् के विप्रतिषेध का उदाहरण प्रस्तुत है—
२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'क्रोष्टु + आम्' यहां नुट् का तृज्वद्भाव के साथ विप्रतिषेध है अतः प्रकृत- वार्त्तिक द्वारा पूर्वविप्रतिषेध से नुट् हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर—'क्रोष्टूनाम्' । 'क्रोष्टु + ङि' (इ) यहां 'इ' यह अजादि तृतीयादि विभक्ति परे है अतः विकल्प से तृज्वद्भाव हो गया । तृज्वद्भावपक्ष में ऋतो ङि० (२०४) से अर् गुण हो कर 'क्रोष्टरि' रूप बना । तदभावपक्ष में अच्व घे (१७४) से ङि को औ तथा उकार को अकार कर वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने से 'क्रोष्टौ' रूप सिद्ध हुआ । 'हे क्रोष्टु + सु' । सम्बुद्धि में तृज्वद्भाव के निषेध के कारण तृज्वत्क्रोष्टु (२०३) प्रवृत्त न हुआ । ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण तथा एङ्घ्रस्वात्० (१३४) द्वारा सम्बुद्धि के सकार का लोप हो कर 'हे क्रोष्टो' रूप बना । 'हे क्रोष्ट लिखना अशुद्ध है । 'क्रोष्टु' शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा क्रोष्टा क्रोष्टारौ क्रोष्टारः द्वितीया क्रोष्टारम् ,, क्रोष्टून् तृतीया क्रोष्ट्रा, क्रोष्टुना क्रोष्टुभ्याम् क्रोष्टुभिः चतुर्थी क्रोष्ट्रे, क्रोष्टवे ,, क्रोष्टुभ्यः पञ्चमी क्रोष्टुः, क्रोष्टोः ,, ,, षष्ठी ,, ,, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्वोः क्रोष्टूनाम् सप्तमी क्रोष्टरि, क्रोष्टौ ,, ,, क्रोष्टुषु सम्बोधन हे क्रोष्टो ! हे क्रोष्टारौ ! हे क्रोष्टारः ! अभ्यास (३१) (१) ऋत उत् में तपर करने का क्या प्रयोजन है ? सविस्तर टिप्पणी करें । (२) पूर्वविप्रतिषेध और परविप्रतिषेध किसे कहते हैं ? इन दोनों का वि- प्रतिषेधे परं कार्यम् इस एक ही सूत्र से कैसे प्रतिपादन किया जाता है ? (३) रातस्सस्य सूत्र की व्याख्या करते हुए इस बात को स्पष्ट करें कि नियम- सूत्रों के प्रत्युदाहरण ही वस्तुतः उदाहरण होते हैं । (४) किस आन्तर्य के कारण क्रोष्टु शब्द के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो जाता है ? (५) 'हे क्रोष्ट !' प्रयोग के शुद्धाशुद्ध होने का विवेचन करें । (६) सूत्रनिर्देशपूर्वक निम्नस्थ प्रयोगों की सिद्धि करें— १ क्रोष्टु । २ ऋष्ट । ३ क्रोष्टूनाम् । ४ क्रोष्टारौ । ५ भानो । ६ क्रोष्ट्रा । ७ शम्भव । ८ शम्भो । ९ क्रोष्टा । १० क्रोष्टरि । (यहां ह्रस्व उकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) ० —
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६६ अब ऊकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का वर्णन किया जाता है— [लघु०] हूहूः, हूह्वौ, हूह्वः । हूहून् । इत्यादि ॥ व्याख्या—'हूहू' अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है। हाहा हूहूश्चैवमाद्या गन्धर्वास्त्रिदिवौ- कसाम् इत्यमरः । इस का अर्थ 'गन्धर्व-विशेष' है। इस की रूपमाला यथा— प्र० हूहूः हूह्वौ हूह्वः† | प० हूह्वः* हूहूभ्याम् हूहूभ्यः द्वि० हूहूम्@ ,,† हूहून्‡ | प० ,,* हूह्वोः* हूह्वाम्* तृ० हूह्वा* हूहूभ्याम् हूहूभिः | स० हूह्वि* ,,* हूहूषु च० हूह्वे* ,, हूहूभ्यः | सं० हे हूहूः! हे हूह्वौ! हे हूह्वः! † दीर्घाज्जसि च से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर इको यणचि से यण् । @ यहां अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो जाता है । ‡ पूर्वसवर्ण-दीर्घ हो कर तस्माच्छसो नः० (१३७) से नत्व हो जाता है ।
- सर्वत्र इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है । [लघु०] 'अतिचमू'शब्दे तु नदीकार्यं विशेषः । हे अतिचमु ! । अतिचम्वै । अतिचम्वाः । अतिचमूनाम् । अतिचम्वाम् ॥ व्याख्या—'चमू' शब्द ऊदन्त नित्यस्त्रीलिङ्ग है । इस का अर्थ है—सेना । चमूम् अतिक्रान्तः=अतिचमूः, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयाया (वा० ५६) इति वार्तिकेन समासः । जो सेना को अतिक्रमण (विजय) कर गया हो उस विजेता को 'अतिचमू' कहते हैं । 'अतिचमू' शब्द की प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च वार्तिक की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र द्वारा नदीसञ्ज्ञा हो जाती है । अतः नदीकार्य अर्थात् सम्बुद्धि में ह्रस्व, ङितों में आट् का आगम, आम् को नुट् आगम और ङि को आम् आदेश ये सब कार्य हो जाते हैं । 'अतिचमू' शब्द की समग्र प्रक्रिया बहुश्रेयसी शब्द की तरह होती है । केवल ङ्यन्त न होने से सुँ का लोप नहीं होता । 'अतिचमू' शब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा अतिचमूः† अतिचम्वौ अतिचम्वः द्वितीया अतिचमूम् ,, अतिचमून् तृतीया अतिचम्वा अतिचमूभ्याम् अतिचमूभिः चतुर्थी अतिचम्वै† ,, अतिचमूभ्यः पञ्चमी अतिचम्वाः‡ ,, ,, षष्ठी ,, ‡ अतिचम्वोः अतिचमूनाम् ✓ सप्तमी अतिचम्वाम्@ ,, अतिचमूपु सम्बोधन हे अतिचमु! * हे अतिचम्वौ! हे अतिचम्वः! † ङ्यन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) द्वारा सुँलोप नहीं होता । ‡ आण्नद्याः (१६६), आटश्च (१६७), इको यणचि (१५) । ✓ ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् । @ ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८), आण्नद्याः (१६६), आटश्च (१६७), इको यणचि (१५) ।
- अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५), एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धेः (१३४) ।
२७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] खलपू ॥ व्याख्या—खल पुनातीति खलपू । 'खल' कर्मोपपद पूञ् पवने (क्रया० उ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'खलपू' शब्द निष्पन्न होता है। झाडू द्वारा खलियान या स्थान को शुद्ध करने वाले नौकर को 'खलपू' कहते हैं। अथवा दुष्टों को पवित्र करने वाले को भी 'खलपू' कह सकते हैं। 'खलपू' शब्द में ऊकार 'पू' धातु का अवयव है। 'खलपू + स्' यहां ङ्यन्तादि न होने से सुँलोप नही होता--'खलपू' । 'खलपू + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) से उस का निषेध हो जाता है। अब इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर क्विबन्ता धातुस्थ न जहाति के अनुसार धातु होने से उस का भी बाध कर अचि श्नु-धातु० (१६६) से उवङ् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१०) ओः सुपि ।६।४।८३॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातु, तदन्त- स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अचि सुपि । खलप्वौ, खलप्वः ॥ अर्थ —धातु का अवयव संयोग पूर्व में नही जिस उवर्ण के, वह उवर्ण है अन्त में जिस धातु के वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेकाच अङ्ग, उस को यण् हो अजादि सुँप् परे होने पर । व्याख्या—ओ (६।१। अनेकाच ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। (एरनेकाचोऽ- संयोगपूर्वस्य से)। धातो ।६।२। अचि ।७।१। (अचि श्नु-धातु० से)। सुंपि । ।७।१। यण् ।१।१। (इको यण् से)। 'ओ' पद 'उ' शब्द के षष्ठी का एकवचन है। इस का अर्थ है—उवर्णस्य । 'धातो' पद की आवृत्ति की जाती है। एक 'धातो' पद 'ओ' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'ओ' से तदन्तविधि हो कर 'उवर्णान्तस्य धातो' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातो' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ सम्बद्ध होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'ओर्धातो' (उवर्णान्तस्य धातो) यह विशेषण है। अत विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'उवर्णान्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ हो जाता है। 'अनेकाच' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। 'असंयोगपूर्वस्य' का 'ओ' के साथ सामानाधिकरण्य है। अर्थ —(धातो, असंयोगपूर्वस्य) धातु का अवयव संयोग जिस के पूर्व में नही ऐसा (ओ) जो उवर्ण, तदन्त (धातो ) जो धातु, तदन्त (अनेकाच ) अनेक अचों वाले (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (यण् ) यण् आदेश हो (अचि) अजादि (सुंपि) सुँप् परे होने पर । तात्पर्य—अजादि सुँप् प्रत्यय परे रहते उस अनेकाच अङ्ग को यण आदेश होता है जिस के अन्त में उवर्णान्त धातु हो परन्तु धातु के उवर्ण से पूर्व धातु का अवयव सयोग न हो । एरनेकाचोऽसयोगपूर्वस्य (२००) सूत्र का विषय इवर्णान्त धातु है और इस का विषय उवर्णान्त धातु है। वह प्रत्येक प्रकार के अजादि प्रत्ययो में यण् करता है और यह केवल अजादि सुँप् म। शेष सब बातें दोनो में समान हैं। दोनो अचि श्नु० (१६६) के अपवाद हैं।
अजन्तपुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७१ 'खलपू+औ' यहां 'पू' उवर्णान्त धातु है, इस के उवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नहीं। अनेकाच् अङ्ग 'खलपू' है इस से परे 'औ' यह अजादि सुँप् वर्त्तमान है ही। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र द्वारा ऊकार को यण् = वकार हो कर—'खलप्वौ' रूप बना। नित्यस्त्रीलिङ्गी न होने के कारण 'खलपू' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती; अतः आट् आदि नदीकार्य नहीं होते। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् हो जाता है। रूप- माला यथा — प्र० खलपूः खलप्वौ खलप्वः प० खलप्वः खलपूभ्याम् खलपूभ्यः द्वि० खलप्वम्‡ ,, ,,‡ प० ,, खलप्वोः खलप्वाम् तृ० खलप्वा खलपूभ्याम् खलपूभिः स० खलप्वि ,, खलपूपु च० खलप्वे ,, खलपूभ्यः सं० हे खलपूः! हे खलप्वौ! हे खलप्वः! ‡ अम् और शस् में परत्व के कारण ओः सुँपि (२१०) से यण् हो जाता है। [लघु०] एवं सुल्वादयः ॥ व्याख्या—'खलपू' शब्द के समान ही 'सुलू, उल्लू' आदि शब्दों के रूप होते हैं। सुष्ठु लुनातीति सुलूः (अच्छी प्रकार से काटने वाला)। उत्कृष्टं लुनातीति उल्लूः (उत्कृष्ट रीति से काटने वाला)। लूँञ् छेदने (क्र्या० उ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप् प्रत्यय करने से इन की निष्पत्ति होती है। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् (२१०) हो जाता है। ध्यान रहे कि 'उल्लू' में संयोग धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार को मिला कर बना है अतः यण् करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन दोनों की रूपमाला यथा— सुलू | उल्लू प्र० सुलूः सुल्वौ सुल्वः प्र० उल्लूः उल्ल्वौ उल्ल्वः द्वि० सुल्वम् ,, ,, द्वि० उल्ल्वम् ,, ,, तृ० सुल्वा सुलूभ्याम् सुलूभिः तृ० उल्ल्वा उल्लूभ्याम् उल्लूभिः च० सुल्वे ,, सुलूभ्यः च० उल्ल्वे ,, उल्लूभ्यः प० सुल्वः ,, ,, प० उल्ल्वः ,, ,, प० ,, सुल्वोः सुल्वाम् प० ,, उल्ल्वोः उल्ल्वाम् स० सुल्वि ,, सुलूपु स० उल्ल्वि ,, उल्लूपु सं० हे सुलूः! हे सुल्वौ! हे सुल्वः! सं० हे उल्लूः! हे उल्ल्वौ! हे उल्ल्वः! [लघु०] स्वभूः। स्वभुवौ। स्वभुवः॥ व्याख्या—स्वस्माद्भवतीति स्वभूः । 'स्व'पूर्वक भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने पर 'स्वभू' शब्द निष्पन्न होता है। ब्रह्मा को 'स्वभू' कहते हैं। स्वभू+सुँ = स्वभूः। ङ्यन्तादि न होने से सुँ का लोप नहीं होता।
२७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'स्वभू+औ' इस दशा मे प्रथम 'इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त है। उस का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त हुआ। उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो गया। पुन इको यणचि से यण् प्राप्ति, उस का बाध कर अचि श्नु० (१६६) से उवङ् आदेश की प्राप्ति, उस का बाध कर ओः सुपि (२१०) से यण् प्राप्त होता है। इम यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध हो जाता है। तब पुन उवङ् आदेश हो कर 'स्वभुवौ' रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार आगे अजादि विभक्तियों मे सर्वत्र उवङ् कर लेना चाहिये। 'स्वभू' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० स्वभूः स्वभुवौ स्वभुवः | प० स्वभुवः स्वभूभ्याम् स्वभूभ्यः द्वि० स्वभुवम् ,, ,, | ष० ,, स्वभुवोः स्वभुवाम् तृ० स्वभुवा स्वभूभ्याम् स्वभूभिः | स० स्वभुवि ,, स्वभूसु च० स्वभुवे ,, स्वभूभ्यः | स० हे स्वभूः ! हे स्वभुवौ ! हे स्वभुवः ! इसी प्रकार स्वयम्भू (ब्रह्मा), आत्मभू (कामदेव) प्रतिभू (जामिन) आदि शब्दो के रूप होते हैं। [लघु०] वर्षाभूः ॥ व्याख्या—वर्षासु भवतीति वर्षाभूः (दर्दुरु मेढक)। 'वर्षा'पूर्वक भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'वर्षाभू' शब्द निष्पन्न होता है। यहा अजादिया म ओः सुपि (२१०) द्वारा प्राप्त यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध हो जाता है। इस पर अग्रिमसूत्र से पुन यण् का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२११) वर्षाभ्वश्च ।६।४।८४॥ अस्य यण् स्याद् अचि सुंपि। वर्षाभ्वौ। इत्यादि॥ अर्थः—अजादि सुँप् प्रत्यय परे होने पर वर्षाभू शब्द को यण् हो। व्याख्या—अचि ।७।१। (अचि श्नु० से)। सुपि ।७।१। (ओः सुपि से)। वर्षाभ्वः ।६।१। च इत्यव्ययपदम्। यण् ।१।१। (इणो यण् से)। अर्थ —(अचि) अजादि (सुपि) सुँप् परे रहते (वर्षाभ्वः) वर्षाभू शब्द के स्थान पर (यण्) यण् हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् ऊकार को यण् होगा। रूपमाला यथा— प्र० वर्षाभूः वर्षाभ्वौ वर्षाभ्वः | प० वर्षाभ्वः वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभ्यः द्वि० वर्षाभ्वम् ,, ,, | ष० ,, वर्षाभ्वोः वर्षाभ्वाम् तृ० वर्षाभ्वा वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभिः | स० वर्षाभ्वि ,, वर्षाभूसु च० वर्षाभ्वे ,, वर्षाभूभ्यः | स० हे वर्षाभूः ! हे वर्षाभ्वौ ! हे वर्षाभ्वः ! ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि कार्य न होंगे। [लघु०] दृन्भूः ॥ व्याख्या—'दृन्' अव्यय के उपपद होने पर 'भू' धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'दृन्भू' शब्द निष्पन्न होता है। दृन्=हिंसा भवते=प्राप्नोतीति दृन्भूः। वर्त्तमान
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७३ उपलब्ध संस्कृत-साहित्य में इस के प्रयोगों के उपलब्ध न होने से इस के अर्थ में बड़ा विवाद है। कई इस का अर्थ सर्पविशेष वा वज्र करते हैं, कोई इसे वानर वा सूर्यवाची मानते हैं। अजादि विभक्तियों में ओः सुँपि (२१०) से प्राप्त यण् का न भूसुधियोः (२०२) से निषेध हो जाता है। तब अग्रिमवार्त्तिक से पुनः यण् का विधान करते हैं— [लघु०] वा०—(२०) दृन्करपुनःपूर्वस्य भुवो यण् वक्तव्यः ॥ दृन्भ्वौ । एवं करभूः ॥ अर्थः—अजादि सुँप् परे होने पर दृन्, कर और पुनर् पूर्व वाले 'भू' शब्द के स्थान पर यण् आदेश करना चाहिये । व्याख्या—यह वार्त्तिक वर्षाभ्वश्च (२११) सूत्र पर महाभाष्य में पढ़ा गया है। दृन्भू, करभू और पुनर्भू शब्दों के ऊकार को यण् हो अजादि सुँप् परे हो तो—यह इस वार्त्तिक का तात्पर्य है। 'दृन्भू' शब्द को इस वार्त्तिक से अजादि सुँप् में यण् हो जाता है। रूपमाला यथा— प्र० दृन्भूः दृन्भ्वौ दृन्भ्वः | प० दृन्भ्वः दृन्भूभ्याम् दृन्भूभ्यः द्वि० दृन्भ्वम् ” ” | प० ” दृन्भ्वोः दृन्भ्वाम् तृ० दृन्भ्वा दृन्भूभ्याम् दृन्भूभिः | स० दृन्भ्वि ” दृन्भूषु च० दृन्भ्वे ” दृन्भूभ्यः | सं० हे दृन्भूः ! हे दृन्भ्वौ ! हे दृन्भ्वः ! इसी प्रकार करभू और पुनर्भू शब्दों के रूप बनते हैं। करे भवतीति करभूः (नख = नाखून), पुनर्भवतीति पुनर्भूः (पुनः पैदा होने वाला)। कर और पुनर् के उपपद रहते भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने पर करभू और पुनर्भू शब्द निष्पन्न होते हैं। अजादि विभक्तियों में पूर्वोक्त वार्त्तिक से यण् हो जाता है। रूपमाला यथा— करभू | पुनर्भू प्र० करभूः करभ्वौ करभ्वः | प्र० पुनर्भूः पुनर्भ्वौ पुनर्भ्वः द्वि० करभ्वम् ” ” | द्वि० पुनर्भ्वम् ” ” तृ० करभ्वा करभूभ्याम् करभूभिः | तृ० पुनर्भ्वा पुनर्भूभ्याम् पुनर्भूभिः च० करभ्वे ” करभूभ्यः | च० पुनर्भ्वे ” पुनर्भूभ्यः प० करभ्वः ” ” | प० पुनर्भ्वः ” ” ष० ” करभ्वोः करभ्वाम् | ष० ” पुनर्भ्वोः पुनर्भ्वाम् स० करभ्वि ” करभूषु | स० पुनर्भ्वि ” पुनर्भूषु सं० हे करभूः! हे करभ्वौ! हे करभ्वः! | सं० हे पुनर्भूः! हे पुनर्भ्वौ! हे पुनर्भ्वः! सूचना—'पुनः व्याही हुई स्त्री' इस अर्थ में 'पुनर्भू' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग होता है, पुंल्लिङ्ग नहीं। स्त्रीलिङ्ग में इस का उच्चारण सिद्धान्त-कौमुदी में देखना चाहिये । ल० प्र० (१८)
२७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अभ्यास (३२) (१) ‘लुलू +अतुस् = लुलुवतु’ आदि मे ओ. सुंपि से यण् क्यो न हो ? (२) ‘खलप्वौ, खलप्व’ आदि मे एरनेकाच ० से यण् क्यो नही होता ? (३) स्वभू, वर्षाभू, आत्मभू, करभू, खलपू, अतिचमू और हूहू शब्दो के द्वितीया तथा सप्तमी के एकवचन में रूप सिद्ध करें । (४) उवङ् आदेश ओ सुंपि के यण् का बाधक है या इको यणचि के यण् का ? सप्रमाण स्पष्ट करें । (५) एरनेकाच० सूत्र की अपेक्षा ओ. सुंपि सूत्र में क्या विशेषता है ? (६) ओ. सुंपि सूत्र का सोदाहरण विवेचन करें । (यहाँ दीर्घ ऊकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) — ० — अथ ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दा का वर्णन करते हैं — [लघु०] धाता । हे धातः । धातारौ । धातारः ॥ व्याख्या—डुधाञ् धारण-पोषणयो (जुहो० उ०) धातु से कर्त्ता में तृन् वा तृच् प्रत्यय करने पर ‘धातृ’ शब्द निष्पन्न होता है । दधातीति धाता, धारण पोषण करने के कारण परमात्मा का नाम ‘धातृ’ है । ‘धातृ’ शब्द के रूप प्रायः क्रोष्टृ शब्द के समान बनते हैं । तथाहि— सुं में ऋदन्त होने से ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से अनङ् आदेश, अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप और न लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर ‘धाता’ रूप बनता है । सम्बुद्धि में ‘ह धातृ + स्’ इस दशा में अनङ् आदेश नहीं होता । ऋतो ङिसर्व- नामस्थानयो (२०४) में ऋकार के स्थान पर गुण = अर् हो, सुँलोप और रेफ को विसर्ग करने से—‘हे धातः’ रूप सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि सम्बुद्धि में निषेध के कारण उपधादीर्घ नहीं होता । विशेष—धातर्देहि, धातर्यच्छ, धातख इत्यादि स्थानों पर रुँ का रेफ न होने से हशि च (१०७) आदि से उत्व न होगा । अतः ‘धातो देहि, धातो यच्छ, धातोऽव’ आदि लिखना अशुद्ध है । ‘धाता रक्ष’ इत्यादि स्थानों पर रो रि (१११) से रेफ- लोप तथा ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण (११२) से पूर्व अण् को दीर्घ तो हो ही जायेगा । प्रथमा के द्विवचन में ‘धातृ + औ’ यहां ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४) से ऋकार को अर् गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर—धातार् + औ = धातारौ । इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में—‘धातारः, धातारम्, धातारौ’ रूप सिद्ध होते हैं । द्वितीया के बहुवचन ‘धातृ + अस्’ (शस्) में सर्वनामस्थान न होने से ऋतो ङिसर्वनामस्थानयो (२०४) द्वारा गुण नहीं होना । पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७५ नकार आदेश हो जाता है—धातॄन् । यहां पदान्तस्य (१३६) से णत्व का निषेध समझना चाहिये । तृतीया के एकवचन 'धातृ + आ' (टा) में इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है—धातृ + आ = 'धात्रा' । भ्याम्, भिस् और भ्यस् में कुछ परिवर्तन नहीं होता—धातृभ्याम् धातृभिः, धातृभ्यः । चतुर्थी के एकवचन 'धातृ + ए' (ङे) में भी इको यणचि (१५) से यण् हो कर—धातृ + ए = 'धात्रे' । पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन 'धातृ + अस्' (ङसिँ वा ङस्) में ऋत उत् (२०८) द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर उर् एकादेश हो कर सकार का संयोगान्तलोप तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से 'धातुः' प्रयोग सिद्ध होता है । धातृ + ओस् = 'धात्रोः' [इको यणचि (१५)] । षष्ठी के बहुवचन में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा नामि (१४६) से दीर्घ करने पर—धातृ + नाम् । अब यहां रेफ या षकार न होने के कारण रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) से णत्व प्राप्त नहीं हो सकता । अतः इस के लिये अग्रिम वार्त्तिक का अवतरण करते हैं— [लघु०] वा०—(२१) ऋवर्णान्निस्य णत्वं वाच्यम् ॥ धातॄणाम् ॥ अर्थः—णत्वप्रकरण में ऋवर्ण से परे भी नकार को णकार कहना चाहिये । व्याख्या—यह वार्त्तिक सम्पूर्ण णत्वविधायक सूत्रों का शेष समझना चाहिये । अतः प्रत्येक णत्वविधायक सूत्र में इस की प्रवृत्ति होती है । इस से जिस २ व्यव- धान या नियम के अधीन रेफ या षकार से परे णत्व करना कहा गया है वहां २ सर्वत्र ऋवर्ण से परे का भी सङ्ग्रह कर लेना चाहिये—यह इस वार्त्तिक का तात्पर्य है । 'धातृ + नाम्' यहां ऋवर्ण से परे इस वार्त्तिक की सहायता से रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) सूत्र द्वारा नकार को णकार हो कर 'धातॄणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में ऋतो ङि० (२०४) से गुण हो कर—'धातरि' । सुप् में आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो 'धातृषु' सिद्ध होता है । 'धातृ' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० धाता धातारौ धातारः | प० धातुः धातृभ्याम् धातृभ्यः द्वि० धातारम् ,, धातॄन् | ष० ,, धात्रोः धातॄणाम् तृ० धात्रा धातृभ्याम् धातृभिः | स० धातरि ,, धातृषु च० धात्रे ,, धातृभ्यः | सं० हे धातः! हे धातारौ! हे धातारः! निम्नलिखित शब्दों के रूप भी इसी तरह होते हैं— १. ध्यान रहे कि आम् में सब ऋदन्तों को णत्व हो जाता है अतः चिह्न नहीं लगाया ।
४. समास प्रकरण (अव्ययीभाव, तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व व बहुव्रीहि)
२७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ अध्येतृ = पढ़ने वाला | बोद्धृ = जानने वाला कथयितृ = कहने वाला | भर्तृ = स्वामी या पति कर्तृ = करने वाला | भेत्तृ = तोड़ने वाला क्रेतृ = खरीदने वाला | भोक्तृ = खाने वाला क्षत्तृ = सारथि या द्वारपाल | योद्धृ = युद्ध करने वाला खनितृ = खोदने वाला | रक्षितृ = रक्षा करने वाला गणयितृ = गिनने वाला | रचयितृ = रचने वाला गन्तृ = जाने वाला | वक्तृ = बोलने वाला ग्रहीतृ = ग्रहण करने वाला | वसितृ = पहनने वाला छेत्तृ = काटने वाला | वस्तु = रहने वाला जेतृ = जीतने वाला | विक्रेतृ = बेचने वाला ज्ञातृ = जानने वाला | वेत्तृ = जानने वाला तरितृ = तैरने वाला | वोढृ = उठाने वाला त्रातृ = बचाने वाला | शङ्कितृ = शङ्का करने वाला त्वष्टृ = विश्वकर्मा | शमयितृ = शान्त करने वाला दातृ = देने वाला | शयितृ = सोने वाला दोग्धृ = दोहने वाला | शामितृ = शान्त करने वाला द्रष्टृ = देखने वाला | श्रोतॄ = सुनने वाला धर्तृ = धारण करने वाला | मवितृ = सूर्य या प्रेरक ध्यातृ = ध्यान करने वाला | सान्त्वयितृ = सान्त्वना देने वाला नप्तृ = पोता या दोहता | सोढृ = सहन करने वाला नेतृ = नेता या सञ्चालक | स्खलितृ = स्खलित होने वाला नेष्टृ = ऋत्विग्विशेष | स्तोतृ = स्तुति करने वाला पक्तृ = पकाने वाला | स्थातृ = ठहरने वाला पठितृ = पढ़ने वाला | स्नातृ = स्नान करने वाला पातृ = रक्षक या पीने वाला | स्मर्तृ = स्मरण करने वाला पूजयितृ = पूजने वाला | स्रष्टृ = पैदा करने वाला पोतृ = ऋत्विग्विशेष | हन्तृ = मारने वाला प्रशास्तृ = ऋत्विग् या राजा | हर्तृ = हरने वाला प्रष्टृ = पूछने वाला | होतृ = यज्ञ करने वाला [लघु०] एवं नप्तृरादयः ॥ व्याख्या—नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ शब्दों के रूप भी धातृ शब्द के समान होंगे। सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर अप्तृन्तृच्० (२०६)
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७७ सूत्र में विशेष उल्लेख के कारण इन की उपधा को दीर्घ हो जायेगा—नप्ता, नप्तारौ, नप्तारः । नप्तारम्, नप्तारौ इत्यादि । नप्तृ, नेष्टृ आदि शब्द औणादिक तृन्नन्त वा तृजन्त हैं । उणादियों में तीन सूत्रों द्वारा प्रायः बीस शब्द तृन्नन्त या तृजन्त सिद्ध किये गये हैं । तथाहि— (क) तृन्तृचौ शंसिक्षदादिभ्यः संज्ञायां चानिटौ (उणा० २५०)। (१) शंस् + तृन् = शंस्तृ [यह ऋत्विग् या भाट की सञ्ज्ञा है] । (२) शास् + तृन्¹ = शास्तृ [यह ऋत्विग् या भगवान् बुद्ध की सञ्ज्ञा है] । (३) क्षद् + तृच्² = क्षत्तृ [सारथि, द्वारपाल, वैश्या में शूद्र से उत्पन्न] । (४) क्षुद् + तृच् = क्षोत्तृ [मुसल] । (५) प्रशास् + तृच् = प्रशास्तृ [ऋत्विग् वा राजा] । (६) उद् नी + तृच् = उन्नेतृ [ऋत्विग्] । (७) प्रति हृ + तृच् = प्रतिहर्तृ [ऋत्विग्] । (८) उद् गा + तृच् = उद्गातृ [यज्ञ में साम का गान करने वाला] । (ख) बहुलमन्यत्रापि (उणा० २५१)। (६) हन् + तृच् = हन्तृ [चोर वा डाकू] । (१०) मन् + तृच् = मन्तृ [विद्वान्] । (ग) नप्तृ-नेष्टृ-त्वष्टृ-होतृ-पोतृ-भ्रातृ-जामातृ-मातृ-पितृ-दुहितृ (उणा०२५२)। (११) नप्तृ [पौत्र, दौहित्र । तृन्नन्त वा तृजन्त निपातित है] । (१२) नेष्टृ [ऋत्विग्विशेष । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१३) त्वष्टृ [विश्वकर्मा । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१४) होतृ [ऋत्विग् । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१५) पोतृ [ऋत्विग्विशेष । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१६) भ्रातृ [भाई । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१७) जामातृ [दामाद । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१८) मातृ [माता । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (१६) पितृ [पिता । ,, ,, ,, ,, ,, ] । (२०) दुहितृ [लड़की, पुत्री । ,, ,, ,, ,, ,, ] । इस प्रकरण में प्रतिप्रस्थातृ, प्रस्तोतृ, दस्तृ³, शस्तृ और अप्तृ⁴ इतने शब्द १. तत्त्वबोधिनीकारा ज्ञानेन्द्रस्वामिनोऽन्ये च उज्ज्वलदत्तप्रभृतयो वृत्तिकृतोऽत्र तृन्प्रत्ययमेवाहुः, परं भाष्यमर्मविन्नागेशस्त्वत्र तृचमेवाभिदधाति । दृश्यतामत्रत्यः शेखरः । २. क्षदिः सौत्रो धातुः । शकलीकरणे भक्षणे चेति दीक्षितः । ३. दस्ता क्षयकृत् इति प्रक्रियासर्वस्वे नारायणभट्टः । न क्वाप्यन्यत्रायं शब्दोऽवलोक्यते । ४. महाराज भोजदेव ने आपो ह्रस्वश्च इस प्रकार सूत्र बना कर 'अप्तृ' शब्द सिद्ध
२४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अधिक अन्यत्र देखे जाते हैं। उपदेष्टृ और धातृ शब्दा को भी यहां उज्ज्वलदत्त ने अपनी उणादिवृत्ति में गिन रखा है। सरस्वतीकण्ठाभरणकार धारेश्वर भोज, दण्ड- नारायण, प्रक्रियासर्वस्वकार नारायणभट्ट, प्रक्रियाकौमुदी की प्रसादटीका के रचयिता विट्ठलाचार्य और दुर्गसिंह प्रभृति इन का उल्लेख नहीं करते। विशेष—स्वसृ, यातृ, देवृ, ननान्दृ, नृ और सव्येष्टृ ये छ शब्द भी यद्यपि औणादिक हैं तथापि ये ऋप्रत्ययान्त हैं, तृन्नन्त वा तृजन्त नहीं। अत इन के दीर्घ या दीर्घाभाव का यहां प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इन में से स्वसृ शब्द का ही सूत्र में ग्रहण है अत उसे ही उपधादीर्घ होगा अन्य किसी ऋप्रत्ययान्त शब्द को नहीं। शङ्का—यदि नप्तृ, नेष्टृ आदि सातो शब्द पूर्वोक्तरीत्या तृन्नन्त वा तृजन्त हैं तो इन की उपधा को दीर्घ अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने से ही सिद्ध हो सकता है, क्योंकि सूत्र में तृन् और तृच् को दीर्घ कहा ही है। पुन सूत्र में इन के पृथक् उल्लेख का क्या कारण है ? समाधान—इस प्रकार सिद्ध होने पर सूत्र में इन के पुन ग्रहण का एक महत्त्वपूर्ण प्रयोजन है। ग्रन्थकार के शब्दा में ही देखिये— [लघु०] नप्त्रादीनां ग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्। तेनेह न—पिता, पितरौ, पितरः। पितरम्। शेषं धातृवत्। एवं जामात्रादयः। ना। नरौ॥ अर्थ—नप्तृ आदि तृन्नन्त वा तृजन्त शब्दो का ग्रहण व्युत्पत्तिपक्ष में नियम के लिये है। अर्थात् यदि व्युत्पत्तिपक्ष में औणादिक शब्दो को तृन्नन्त वा तृजन्त समझा जाये तो नप्तृ, नेष्टृ, त्वष्टृ, क्षत्तृ, होतृ, पोतृ और प्रशास्तृ इन सात शब्दो की उपधा को ही अप्तृन् तृच्० सूत्र से दीर्घ हो अन्य किसी औणादिक तृन्नन्त वा तृजन्त की उपधा को दीर्घ न हो। उणादिनिष्पन्नानां तृन्तृजन्तानां दीर्घश्चेद् ? नप्त्रादीनामेव, न तु पित्रा- दीनामिति नियमोऽत्र बोध्यः। व्याख्या—कुछ लोग औणादिक शब्दों को व्युत्पन्न और कुछ अव्युत्पन्न मानते हैं। अव्युत्पन्न मानने वालों के पक्ष में नप्तृ आदि शब्दो में न कोई धातु और न कोई प्रत्यय माना जाता है। अतः उन के मत में अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ इतने सूत्रमात्र से काम नहीं चल सकता। उन के मत में नप्तृ, नेष्टृ आदि शब्दो का उपधादीर्घविधानार्थ ग्रहण करना आवश्यक है ही। अब रहे व्युत्पत्तिपक्ष वाले, ये लोग औणादिक शब्दो में प्रकृति, प्रत्यय, आगम, विकार और आदेश आदि सब यथावत् मानते हैं। नप्तृ आदि शब्दो को ये लोग किया है। दण्डनारायण ने अपनी वृत्ति में 'अप्तृ' का अर्थ 'यज्ञ' किया है। वर्त्त- मान उपलब्ध संस्कृत-साहित्य में इस का पता नहीं चलता। परन्तु 'अप्तोर्याम, अप्तोर्यामन्' यादि शब्दों के देखने से प्रतीत होता है कि यज्ञ अर्थ में इस का कही प्रयोग अवश्य हुआ होगा। इसी प्रकार 'चोर' आदि अर्थों में 'हन्तृ' शब्द के प्रयोग भी अन्वेषणीय हैं।