लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'स्वभू+औ' इस दशा मे प्रथम 'इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त है। उस का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त हुआ। उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो गया। पुन इको यणचि से यण् प्राप्ति, उस का बाध कर अचि श्नु० (१६६) से उवङ् आदेश की प्राप्ति, उस का बाध कर ओः सुपि (२१०) से यण् प्राप्त होता है। इम यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध हो जाता है। तब पुन उवङ् आदेश हो कर 'स्वभुवौ' रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार आगे अजादि विभक्तियों मे सर्वत्र उवङ् कर लेना चाहिये। 'स्वभू' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० स्वभूः स्वभुवौ स्वभुवः | प० स्वभुवः स्वभूभ्याम् स्वभूभ्यः द्वि० स्वभुवम् ,, ,, | ष० ,, स्वभुवोः स्वभुवाम् तृ० स्वभुवा स्वभूभ्याम् स्वभूभिः | स० स्वभुवि ,, स्वभूसु च० स्वभुवे ,, स्वभूभ्यः | स० हे स्वभूः ! हे स्वभुवौ ! हे स्वभुवः ! इसी प्रकार स्वयम्भू (ब्रह्मा), आत्मभू (कामदेव) प्रतिभू (जामिन) आदि शब्दो के रूप होते हैं। [लघु०] वर्षाभूः ॥ व्याख्या—वर्षासु भवतीति वर्षाभूः (दर्दुरु मेढक)। 'वर्षा'पूर्वक भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'वर्षाभू' शब्द निष्पन्न होता है। यहा अजादिया म ओः सुपि (२१०) द्वारा प्राप्त यण् का न भूसुधियो (२०२) से निषेध हो जाता है। इस पर अग्रिमसूत्र से पुन यण् का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२११) वर्षाभ्वश्च ।६।४।८४॥ अस्य यण् स्याद् अचि सुंपि। वर्षाभ्वौ। इत्यादि॥ अर्थः—अजादि सुँप् प्रत्यय परे होने पर वर्षाभू शब्द को यण् हो। व्याख्या—अचि ।७।१। (अचि श्नु० से)। सुपि ।७।१। (ओः सुपि से)। वर्षाभ्वः ।६।१। च इत्यव्ययपदम्। यण् ।१।१। (इणो यण् से)। अर्थ —(अचि) अजादि (सुपि) सुँप् परे रहते (वर्षाभ्वः) वर्षाभू शब्द के स्थान पर (यण्) यण् हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य अल् ऊकार को यण् होगा। रूपमाला यथा— प्र० वर्षाभूः वर्षाभ्वौ वर्षाभ्वः | प० वर्षाभ्वः वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभ्यः द्वि० वर्षाभ्वम् ,, ,, | ष० ,, वर्षाभ्वोः वर्षाभ्वाम् तृ० वर्षाभ्वा वर्षाभूभ्याम् वर्षाभूभिः | स० वर्षाभ्वि ,, वर्षाभूसु च० वर्षाभ्वे ,, वर्षाभूभ्यः | स० हे वर्षाभूः ! हे वर्षाभ्वौ ! हे वर्षाभ्वः ! ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि कार्य न होंगे। [लघु०] दृन्भूः ॥ व्याख्या—'दृन्' अव्यय के उपपद होने पर 'भू' धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'दृन्भू' शब्द निष्पन्न होता है। दृन्=हिंसा भवते=प्राप्नोतीति दृन्भूः। वर्त्तमान