लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्तपुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७१ 'खलपू+औ' यहां 'पू' उवर्णान्त धातु है, इस के उवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नहीं। अनेकाच् अङ्ग 'खलपू' है इस से परे 'औ' यह अजादि सुँप् वर्त्तमान है ही। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा की सहायता से प्रकृतसूत्र द्वारा ऊकार को यण् = वकार हो कर—'खलप्वौ' रूप बना। नित्यस्त्रीलिङ्गी न होने के कारण 'खलपू' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती; अतः आट् आदि नदीकार्य नहीं होते। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् हो जाता है। रूप- माला यथा — प्र० खलपूः खलप्वौ खलप्वः प० खलप्वः खलपूभ्याम् खलपूभ्यः द्वि० खलप्वम्‡ ,, ,,‡ प० ,, खलप्वोः खलप्वाम् तृ० खलप्वा खलपूभ्याम् खलपूभिः स० खलप्वि ,, खलपूपु च० खलप्वे ,, खलपूभ्यः सं० हे खलपूः! हे खलप्वौ! हे खलप्वः! ‡ अम् और शस् में परत्व के कारण ओः सुँपि (२१०) से यण् हो जाता है। [लघु०] एवं सुल्वादयः ॥ व्याख्या—'खलपू' शब्द के समान ही 'सुलू, उल्लू' आदि शब्दों के रूप होते हैं। सुष्ठु लुनातीति सुलूः (अच्छी प्रकार से काटने वाला)। उत्कृष्टं लुनातीति उल्लूः (उत्कृष्ट रीति से काटने वाला)। लूँञ् छेदने (क्र्या० उ०) धातु से कर्त्ता में क्विँप् प्रत्यय करने से इन की निष्पत्ति होती है। सर्वत्र अजादि सुँपों में यण् (२१०) हो जाता है। ध्यान रहे कि 'उल्लू' में संयोग धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार को मिला कर बना है अतः यण् करने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन दोनों की रूपमाला यथा— सुलू | उल्लू प्र० सुलूः सुल्वौ सुल्वः प्र० उल्लूः उल्ल्वौ उल्ल्वः द्वि० सुल्वम् ,, ,, द्वि० उल्ल्वम् ,, ,, तृ० सुल्वा सुलूभ्याम् सुलूभिः तृ० उल्ल्वा उल्लूभ्याम् उल्लूभिः च० सुल्वे ,, सुलूभ्यः च० उल्ल्वे ,, उल्लूभ्यः प० सुल्वः ,, ,, प० उल्ल्वः ,, ,, प० ,, सुल्वोः सुल्वाम् प० ,, उल्ल्वोः उल्ल्वाम् स० सुल्वि ,, सुलूपु स० उल्ल्वि ,, उल्लूपु सं० हे सुलूः! हे सुल्वौ! हे सुल्वः! सं० हे उल्लूः! हे उल्ल्वौ! हे उल्ल्वः! [लघु०] स्वभूः। स्वभुवौ। स्वभुवः॥ व्याख्या—स्वस्माद्भवतीति स्वभूः । 'स्व'पूर्वक भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से क्विँप् प्रत्यय करने पर 'स्वभू' शब्द निष्पन्न होता है। ब्रह्मा को 'स्वभू' कहते हैं। स्वभू+सुँ = स्वभूः। ङ्यन्तादि न होने से सुँ का लोप नहीं होता।