लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] खलपू ॥ व्याख्या—खल पुनातीति खलपू । 'खल' कर्मोपपद पूञ् पवने (क्रया० उ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'खलपू' शब्द निष्पन्न होता है। झाडू द्वारा खलियान या स्थान को शुद्ध करने वाले नौकर को 'खलपू' कहते हैं। अथवा दुष्टों को पवित्र करने वाले को भी 'खलपू' कह सकते हैं। 'खलपू' शब्द में ऊकार 'पू' धातु का अवयव है। 'खलपू + स्' यहां ङ्यन्तादि न होने से सुँलोप नही होता--'खलपू' । 'खलपू + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर दीर्घाज्जसि च (१६२) से उस का निषेध हो जाता है। अब इको यणचि (१५) से यण् प्राप्त होने पर क्विबन्ता धातुस्थ न जहाति के अनुसार धातु होने से उस का भी बाध कर अचि श्नु-धातु० (१६६) से उवङ् प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१०) ओः सुपि ।६।४।८३॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्तदन्तो यो धातु, तदन्त- स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अचि सुपि । खलप्वौ, खलप्वः ॥ अर्थ —धातु का अवयव संयोग पूर्व में नही जिस उवर्ण के, वह उवर्ण है अन्त में जिस धातु के वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेकाच अङ्ग, उस को यण् हो अजादि सुँप् परे होने पर । व्याख्या—ओ (६।१। अनेकाच ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। (एरनेकाचोऽ- संयोगपूर्वस्य से)। धातो ।६।२। अचि ।७।१। (अचि श्नु-धातु० से)। सुंपि । ।७।१। यण् ।१।१। (इको यण् से)। 'ओ' पद 'उ' शब्द के षष्ठी का एकवचन है। इस का अर्थ है—उवर्णस्य । 'धातो' पद की आवृत्ति की जाती है। एक 'धातो' पद 'ओ' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'ओ' से तदन्तविधि हो कर 'उवर्णान्तस्य धातो' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातो' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ सम्बद्ध होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'ओर्धातो' (उवर्णान्तस्य धातो) यह विशेषण है। अत विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'उवर्णान्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ हो जाता है। 'अनेकाच' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। 'असंयोगपूर्वस्य' का 'ओ' के साथ सामानाधिकरण्य है। अर्थ —(धातो, असंयोगपूर्वस्य) धातु का अवयव संयोग जिस के पूर्व में नही ऐसा (ओ) जो उवर्ण, तदन्त (धातो ) जो धातु, तदन्त (अनेकाच ) अनेक अचों वाले (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (यण् ) यण् आदेश हो (अचि) अजादि (सुंपि) सुँप् परे होने पर । तात्पर्य—अजादि सुँप् प्रत्यय परे रहते उस अनेकाच अङ्ग को यण आदेश होता है जिस के अन्त में उवर्णान्त धातु हो परन्तु धातु के उवर्ण से पूर्व धातु का अवयव सयोग न हो । एरनेकाचोऽसयोगपूर्वस्य (२००) सूत्र का विषय इवर्णान्त धातु है और इस का विषय उवर्णान्त धातु है। वह प्रत्येक प्रकार के अजादि प्रत्ययो में यण् करता है और यह केवल अजादि सुँप् म। शेष सब बातें दोनो में समान हैं। दोनो अचि श्नु० (१६६) के अपवाद हैं।