भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

२७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अभ्यास (३२) (१) ‘लुलू +अतुस् = लुलुवतु’ आदि मे ओ. सुंपि से यण् क्यो न हो ? (२) ‘खलप्वौ, खलप्व’ आदि मे एरनेकाच ० से यण् क्यो नही होता ? (३) स्वभू, वर्षाभू, आत्मभू, करभू, खलपू, अतिचमू और हूहू शब्दो के द्वितीया तथा सप्तमी के एकवचन में रूप सिद्ध करें । (४) उवङ् आदेश ओ सुंपि के यण् का बाधक है या इको यणचि के यण् का ? सप्रमाण स्पष्ट करें । (५) एरनेकाच० सूत्र की अपेक्षा ओ. सुंपि सूत्र में क्या विशेषता है ? (६) ओ. सुंपि सूत्र का सोदाहरण विवेचन करें । (यहाँ दीर्घ ऊकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) — ० — अथ ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दा का वर्णन करते हैं — [लघु०] धाता । हे धातः । धातारौ । धातारः ॥ व्याख्या—डुधाञ् धारण-पोषणयो (जुहो० उ०) धातु से कर्त्ता में तृन् वा तृच् प्रत्यय करने पर ‘धातृ’ शब्द निष्पन्न होता है । दधातीति धाता, धारण पोषण करने के कारण परमात्मा का नाम ‘धातृ’ है । ‘धातृ’ शब्द के रूप प्रायः क्रोष्टृ शब्द के समान बनते हैं । तथाहि— सुं में ऋदन्त होने से ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से अनङ् आदेश, अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप और न लोप ० (१८०) से नकार का लोप हो कर ‘धाता’ रूप बनता है । सम्बुद्धि में ‘ह धातृ + स्’ इस दशा में अनङ् आदेश नहीं होता । ऋतो ङिसर्व- नामस्थानयो (२०४) में ऋकार के स्थान पर गुण = अर् हो, सुँलोप और रेफ को विसर्ग करने से—‘हे धातः’ रूप सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि सम्बुद्धि में निषेध के कारण उपधादीर्घ नहीं होता । विशेष—धातर्देहि, धातर्यच्छ, धातख इत्यादि स्थानों पर रुँ का रेफ न होने से हशि च (१०७) आदि से उत्व न होगा । अतः ‘धातो देहि, धातो यच्छ, धातोऽव’ आदि लिखना अशुद्ध है । ‘धाता रक्ष’ इत्यादि स्थानों पर रो रि (१११) से रेफ- लोप तथा ढलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण (११२) से पूर्व अण् को दीर्घ तो हो ही जायेगा । प्रथमा के द्विवचन में ‘धातृ + औ’ यहां ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४) से ऋकार को अर् गुण तथा अप्तृन्तृच्० (२०६) से उपधादीर्घ हो कर—धातार् + औ = धातारौ । इसी प्रकार जस्, अम् और औट् में—‘धातारः, धातारम्, धातारौ’ रूप सिद्ध होते हैं । द्वितीया के बहुवचन ‘धातृ + अस्’ (शस्) में सर्वनामस्थान न होने से ऋतो ङिसर्वनामस्थानयो (२०४) द्वारा गुण नहीं होना । पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को