भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७५ नकार आदेश हो जाता है—धातॄन् । यहां पदान्तस्य (१३६) से णत्व का निषेध समझना चाहिये । तृतीया के एकवचन 'धातृ + आ' (टा) में इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है—धातृ + आ = 'धात्रा' । भ्याम्, भिस् और भ्यस् में कुछ परिवर्तन नहीं होता—धातृभ्याम् धातृभिः, धातृभ्यः । चतुर्थी के एकवचन 'धातृ + ए' (ङे) में भी इको यणचि (१५) से यण् हो कर—धातृ + ए = 'धात्रे' । पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन 'धातृ + अस्' (ङसिँ वा ङस्) में ऋत उत् (२०८) द्वारा पूर्व + पर के स्थान पर उर् एकादेश हो कर सकार का संयोगान्तलोप तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने से 'धातुः' प्रयोग सिद्ध होता है । धातृ + ओस् = 'धात्रोः' [इको यणचि (१५)] । षष्ठी के बहुवचन में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा नामि (१४६) से दीर्घ करने पर—धातृ + नाम् । अब यहां रेफ या षकार न होने के कारण रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) से णत्व प्राप्त नहीं हो सकता । अतः इस के लिये अग्रिम वार्त्तिक का अवतरण करते हैं— [लघु०] वा०—(२१) ऋवर्णान्निस्य णत्वं वाच्यम् ॥ धातॄणाम् ॥ अर्थः—णत्वप्रकरण में ऋवर्ण से परे भी नकार को णकार कहना चाहिये । व्याख्या—यह वार्त्तिक सम्पूर्ण णत्वविधायक सूत्रों का शेष समझना चाहिये । अतः प्रत्येक णत्वविधायक सूत्र में इस की प्रवृत्ति होती है । इस से जिस २ व्यव- धान या नियम के अधीन रेफ या षकार से परे णत्व करना कहा गया है वहां २ सर्वत्र ऋवर्ण से परे का भी सङ्ग्रह कर लेना चाहिये—यह इस वार्त्तिक का तात्पर्य है । 'धातृ + नाम्' यहां ऋवर्ण से परे इस वार्त्तिक की सहायता से रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) सूत्र द्वारा नकार को णकार हो कर 'धातॄणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में ऋतो ङि० (२०४) से गुण हो कर—'धातरि' । सुप् में आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो 'धातृषु' सिद्ध होता है । 'धातृ' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० धाता धातारौ धातारः | प० धातुः धातृभ्याम् धातृभ्यः द्वि० धातारम् ,, धातॄन् | ष० ,, धात्रोः धातॄणाम् तृ० धात्रा धातृभ्याम् धातृभिः | स० धातरि ,, धातृषु च० धात्रे ,, धातृभ्यः | सं० हे धातः! हे धातारौ! हे धातारः! निम्नलिखित शब्दों के रूप भी इसी तरह होते हैं— १. ध्यान रहे कि आम् में सब ऋदन्तों को णत्व हो जाता है अतः चिह्न नहीं लगाया ।