भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६३ हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर (अग्रिम सूत्र इस का बाध कर लेता है)। व्याख्या—ऋतः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। गुणः ।१।१। (ह्रस्वस्य गुणः से)। ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।२। समासः—ङिश्च सर्वनामस्थानञ्च = ङिसर्वनामस्थाने, तयोः = ङिसर्वनामस्थानयोः, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'ऋतः' से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(ऋतः) ऋदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (गुणः) गुण होता है (ङिसर्वनामस्थानयोः) ङि अथवा सर्वनामस्थान परे हो तो। अलोऽन्त्यपरिभाषा तथा इको गुणवृद्धी (१.१.३) परिभाषा से अन्त्य ऋवर्ण के स्थान पर ही गुण (अ) होगा। उरण्रपरः (२६) द्वारा रपर हो 'अर्' हो जायेगा। 'क्रोष्टृ+स्' यहां 'सुं' सर्वनामस्थान परे है अतः प्रकृत-सूत्र से ऋवर्ण के स्थान पर 'अर्' गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र निषेध कर अनँङ् आदेश कर देता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०५) ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ।७।१।९४॥ ऋदन्तानाम् उशनसादीनां चानँङ् स्यादसम्बुद्धौ सौ ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सुं परे होने पर ऋदन्तों तथा उशनस् (शुक्र आचार्य), पुरुदंसस् (बिल्ली) और अनेहस् (समय) शब्दों को अनँङ् आदेश हो। व्याख्या—असम्बुद्धौ ।७।१। (सख्युरसम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। अनँङ् ।१।१। (अनँङ् सौ से)। ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम् ।६।३। अङ्गानाम् ।६।३। (अङ्गस्य अधि- कार का वचनविपरिणाम हो जाता है)। च इत्यव्ययपदम्। समासः—ऋच्च उशना च पुरुदंसा च अनेहा च = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसः, तेषाम् = ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाम्, इतरेतरद्वन्द्वः । 'अङ्गानाम्' का विशेषण होने से 'ऋदुशनस्०' पद से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुं परे हो तो (ऋदुशनस्पुरुदंसो- ऽनेहसाम्) ऋदन्त, उशनस्शब्दान्त, पुरुदंसस्शब्दान्त तथा अनेहस्शब्दान्त (अङ्गानाम्) अङ्गों के स्थान पर (अनँङ्) अनँङ् आदेश होता है। अनँङ् आदेश में ङकार इत्सञ्ज्ञक है, अकार उच्चारणार्थ है। 'अन्' ही अव- शिष्ट रहता है। ङित् होने से यह आदेश ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा अन्त्य अल् —ऋवर्ण या सकार के स्थान पर होगा। किञ्च ध्यान रहे कि केवल उशनस् आदि शब्दों के स्थान पर भी व्यपदेशिवद्भाव (२७८) से अनँङ् आदेश हो जायेगा। 'क्रोष्टृ + स्' यहां सम्बुद्धिभिन्न सुं परे है अतः प्रकृत सूत्र से ऋकार को अनँङ् आदेश हो अनुबन्ध-लोप करने पर—'क्रोष्टन् + स्' । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०]विधि-सूत्रम्—(२०६) अप्-तृन्-तृच्-स्वसृ-नप्तृ-नेष्टृ-त्वष्टृ-क्षत्तृ-होतृ- पोतृ-प्रशास्तॄणाम् ।६।४।११॥ अबादीनामुपधाया दीर्घोऽसम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । क्रोष्टा, क्रोष्टारौ, क्रोष्टारः । क्रोष्टारम्, क्रोष्टॄन् ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर अप्, तृन्प्रत्ययान्त, तृच्प्रत्यया-