लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ वेणु=बास | शीतगु=चन्द्र | सूनु=पुत्र वेपथु=कापना | श्रद्धालु=श्रद्धालु | सेतु=पुल व्यथु=मृग | श्वयथु=सूजन-शोथ | स्तनयित्नु=बादल शङ्कु=कील | सक्तु=सत्तु | स्थाणु=शाखाहीन वृक्ष शत्रु*=दुश्मन | साधु=सज्जन | स्वर्भानु=राहु शयालु=निद्राशील | सानु=पर्वत की चोटी | स्वादु=स्वादिष्ट शयु=अजगर | सिन्धु=सागर | हिमांशु=चन्द्र शरु*=हिंस्र | सीधु=मद्यविशेष | हेतु=कारण शिशु=बालक | सुधाथु=चन्द्र | शम्भु शब्द की अपेक्षा क्रोष्टु (गीदड़। शृगाल-वञ्चक-क्रोष्टु-फेरु-फेरब-जम्बुकाः इत्यमरः) शब्द के रूपों में अन्तर पड़ता है। अतः अब उस का वर्णन करते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२०३) तृज्वत् क्रोष्टुः।७।१।९५॥ असम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने परे क्रोष्टुशब्दस्य स्थाने 'क्रोष्टृ' शब्दः प्रयोक्तव्य इत्यर्थः ॥ अर्थः—सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' शब्द प्रयुक्त करना चाहिये—यह सूत्र का तात्पर्य है (अर्थ नहीं। अर्थ व्याख्या में देखें)। व्याख्या—तृज्वत् इत्यव्ययपदम्। क्रोष्टु १।१। असम्बुद्धौ ७।१। (सख्युर- सम्बुद्धौ से)। सर्वनामस्थाने ७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से)। तृचा तुल्यम्—तृज्वत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८) इति वतिप्रत्ययः। प्रत्ययग्रहणपरिभाषा से तृजन्त का ग्रहण होता है। 'तृज्वत्' का अर्थ है—तृजन्त के समान। अर्थ—(असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे रहते (क्रोष्टु) क्रोष्टु शब्द (तृज्वत्) तृच्प्रत्ययान्त के समान होता है। यह अतिदेश-सूत्र है; अतिदेश कई प्रकार के होते हैं, यहां रूपातिदेश है। तृजन्त शब्द—कर्तृ, हर्तृ, दातृ आदि अनेक हैं, इन मे से यहां क्रोष्टु शब्द के स्थान पर कौन सा तृजन्त हो ? इस का उत्तर यह है कि स्थानेऽन्तरतमः (१७) से अर्थकृत आन्तर्य [अर्थ के तुल्य होने से जो सादृश्य देखा जाता है उसे अर्थकृत आन्तर्य कहते हैं] द्वारा 'क्रोष्टु' के स्थान पर 'क्रोष्टृ' ही तृजन्त आदेश होगा। क्रोष्टु और क्रोष्टृ दोनों का एक ही अर्थ है। 'क्रोष्टु+स्' (सुँ) यहां सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान 'सुँ' परे है, अतः क्रोष्टु के स्थान पर क्रोष्टृ आदेश हो—'क्रोष्टृ+स्' हुआ। अब अग्रिम-सूत्र प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२०४) ऋतो ङि-सर्वनामस्थानयोः ।७।३।११०। ऋदन्तोऽङ्गस्य गुणो ङौ सर्वनामस्थाने च। इति प्राप्ते— अर्थः—ङि अथवा सर्वनामस्थान परे होने पर ऋदन्त अङ्ग के स्थान पर गुण