भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 276

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६१

शब्द—अर्थशब्द—अर्थशब्द—अर्थ
कारु* = कारीगरदयालु = दया वालाभिक्षु* = याचक
कृशानु = अग्निदस्यु = डाकूभीरु* = डरपोक
केतु = झण्डा वा एक ग्रहदिदृक्षु* = दर्शनाभिलाषीभृगु* = एक ऋषि
ऋतु = यज्ञदेवगुरु* = बृहस्पतिमञ्जु = सुन्दर
क्षवथु = खांसीदेवदारु* = दियार वृक्षमधु = वसन्त
गुग्गुलु = गूगलधातु = सुवर्णादि धातुमनु = पहला राजा
गुरु* = गुरुनिद्रालु = निद्राशीलमन्यु = क्रोध
गृध्नु = लालचीपङ्गु = लङ्गड़ामरु* = रेगिस्तान
गोमायु = गीदड़पटु = चतुरमित्रयु* = मित्रवत्सल
चण्डांशु = सूर्यपरमाणु = ज़र्रामुमूर्षु* = मरणेच्छुक
चरिष्णु = चालाकपरशु = कुल्हाड़ामृगयु* = शिकारी
चरु* = हव्यान्नपर्शु = कुल्हाड़ामृत्यु = मौत
चिकीर्षु* = करणेच्छुकपलाण्डु = प्याज़मेरु* = एक पर्वत
जन्तु = प्राणीपशु = जानवरयदु = प्रसिद्ध नृप
जायु = औषधपाण्डु = प्रसिद्ध नृपरघु* = प्रसिद्ध नृप
जिगीषु* = जयेच्छुकपायु = गुदारङ्कु* = मृग-विशेष
जिघत्सु = भूखापांशु = धूलिराहु* = ग्रह-विशेष
जिज्ञासु = ज्ञानेच्छुकपांसु = ,,रिपु* = शत्रु
जिष्णु = इन्द्र वा अर्जुनपिचु = कपासरेणु = धूलि
जीवातु = जीवन-औषधपिपासु = प्यासालघु = छोटा
तनु = पतलापीलु = पीलु का वृक्षवटु = ब्रह्मचारी
तन्तु = तागापुरु* = प्रसिद्ध नृपवनायु = अरब देश
तन्द्रालु = ऊंघनेवालापृथु = प्रसिद्ध नृपवन्दारु* = वन्दनशील
तरक्षु* = विशेष भेड़ियाप्रज्ञु = टेढ़े घुटनों वालावमथु = वमन
तरु* = वृक्षप्रभु* = स्वामीवायु = हवा
तिग्मांशु = सूर्यप्रांशु = उन्नतविधु = चन्द्र
तितउ = चलनीबन्धु = बान्धवबिन्दु = बूंद
तुहिनांशु = चन्द्रबाहु = भुजाविभावसु = अग्नि, सूर्य
-त्सरु* = तलवार की मूठबुभुक्षु* = भूखाविभु = व्यापक
दद्रु* = रोग-विशेषभानु = सूर्यविष्णु = भगवान् विष्णु
' होता है। वहां मरिच आदि को 'कटु' तथा निम्ब आदि को 'तिक्त' कहा जाता
है। अत एव 'त्रिकटु' शब्द से आयुर्वेद में—'काली मिर्च, पिप्पली, शुण्ठी' इन
तीनों का ग्रहण होता है।