लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २६७ षष्ठी के द्विवचन में 'क्रोष्टु + ओस्' इस दशा में तृज्वद्भाव हो कर यण् करने से—'क्रोष्ट्रोः' । तदभावपक्ष में भी उकार को वकार होकर—'क्रोष्ट्वोः' । षष्ठी के बहुवचन में 'क्रोष्टु + आम्' इस दशा में तृज्वद्भाव तथा ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् युगपत् प्राप्त होते हैं। दोनों सावकाश हैं। नुट् को 'हरीणाम्' आदि में तथा तृज्वद्भाव को 'क्रोष्ट्रा' आदि में अवकाश प्राप्त हो चुका है। इस पर विप्र- तिषेधे परं कार्यम् (११३) से पर कार्य होने के कारण तृज्वद्भाव ही प्राप्त होता है। अब अग्रिम वार्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(१६) नुँम्-अचिर-तृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ क्रोष्टूनाम् । क्रोष्टरि । पक्षे हलादौ च शम्भुवत् ॥ अर्थः—नुँम्, अच् परे होने पर रेफादेश [अचि र ऋतः (२२५) से] और तृज्वद्भाव—इन से पूर्वविप्रतिषेध के कारण नुट् हो जाता है। व्याख्या—तुल्य बल वाले दो कार्यों का प्रतिषेध होने पर विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) द्वारा अष्टाध्यायीक्रमानुसार परकार्य विधान किया जाता है। इस से —मनोरथः, रामेभ्यः आदि प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं। परन्तु ऐसा करने से व्याकरण में कहीं कहीं दोष भी आ जाते हैं। क्योंकि वहां परकार्य करना इष्ट नहीं हुआ करता, पूर्वकार्य करना ही अभीष्ट होता है। तो उन दोषों की निवृत्ति के लिये विप्रतिषेधे परं कार्यम् सूत्र को विप्रतिषेधेऽपरं कार्यम् इस प्रकार पढ़ अपर अर्थात् पूर्वकार्य का विप्रति- षेध में विधान कर इष्ट सिद्ध किया जाता है। परन्तु कहां कहां 'अपरम् कार्यम्' छेद करें—इस के लिये भगवान् कात्यायन ने अपने वार्तिकों में उन उन स्थानों का परि- गणन कर दिया है। यह वार्तिक उन में से एक है। इन परिगणित स्थानों के अति- रिक्त सर्वत्र परकार्य और इन में पूर्वकार्य होगा। भाष्यकार भगवान् पतञ्जलि 'पर' शब्द को इष्टवाची मान कर दोष निवृत्त कर लेते हैं। यथा—अस्तीष्टवाची परशब्दः, तद्यथा—'परं धाम गतः' । इष्टं धाम गत इति गम्यते । तद् य इष्टवाची परशब्दस्तस्येदं ग्रहणम् । विप्रतिषेधे परं यद् इष्टं तद् भवतीति । नुँम् [इकोऽचि विभक्तौ (२४५) से], अच् परे होने पर रेफादेश [अचि र ऋतः (२२५) से] और तृज्वद्भाव [तृज्वत्क्रोष्टुः (२०३), विभाषा तृतीयादिष्वचि (२०७) से]—इन तीन कार्यों के साथ यदि नुट् [ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८)] का विप्रतिषेध हो तो नुट् ही होता है। वे तीनों यद्यपि अष्टाध्यायी में सूत्रक्रमानुसार पर हैं और इन की अपेक्षा नुट् पूर्व है तथापि नुट् हो जाता है। नुँम् तथा अच् परे होने पर रेफादेश के साथ नुट् के विप्रतिषेध के उदाहरण आगे 'वारि' और 'तिसृ' शब्दों पर स्पष्ट किये गये हैं। यहां तृज्वद्भाव के साथ नुट् के विप्रतिषेध का उदाहरण प्रस्तुत है—