भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 633 में से

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२६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् देश होने की आशङ्का नहीं की जा सकती। तो पुनः ऋत उत् में उकार को तपर करने का क्या प्रयोजन है ? उत्तर—यहा उकार को तपर करने से आचार्य यह जनाना चाहते हैं कि— भाव्यमानोऽप्यण् क्वचित् सवर्णान् गृह्णाति अर्थात् कहीं २ विधीयमान भी अण् अपने सवर्णों का ग्राहक हुआ करता है। अत एव—यवलपरे यवला वा (वा० १३) वार्तिक द्वारा अनुनासिक यकार आदिया का विधान हो जाता है। इसी प्रकार—अदसोऽसेर्दादु दो म. (३५६) सूत्र मे प्राचीन वैयाकरणो ने उकार से ह्रस्व और दीर्घ दोना प्रकार के उकारो का ग्रहण किया है। यहा का विशेष विवेचन सिद्धान्त-कौमुदी की टीकाओ में देखें। 'क्रोष्टृ + अस्' यहा ऋत् से परे ङसिं वा ङस् का अत् विद्यमान है, अत प्रकृत- सूत्र से पूर्व (ऋ) और पर (अ) के स्थान पर उर् एकादश हो—'क्रोष्ट् उर् स्' हुआ। अब अग्रिम नियम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] नियम-सूत्रम्—(२०६) रात् सस्य ॥८।२।२४॥ रेफात् संयोगान्तस्य सस्यैव लोपो नान्यस्य। रेफस्य विसर्ग । क्रोष्टुः । क्रोष्ट्रोः ॥ अर्थ.—रेफ से परे यदि संयोगान्तलोप हो तो सकार का ही हो, अन्य का नहीं। व्याख्या—रात् ।५।१। संयोगान्तस्य ।६।१। सस्य ।६।१। लोप ।१।१। (संयो- गान्तस्य लोप. म)। रेफ से परे संयोगान्त सकार का लोप संयोगान्तस्य लोप. (२०) से ही सिद्ध हो जाता है, पुन इस का कथन सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ. के अनुसार निय- मार्थ है। अत 'एव' पद प्राप्त हो जाना है। अर्थ —(रात्) रेफ से परे (संयोगान्त- स्य) संयोग के अन्त में वर्तमान (सस्य) सकार का (एव) ही (लोप ) लोप होता है, अन्य किसी वर्ण का नहीं। उदाहरण यथा—'ऊर्क्'। नपुंसक ऊर्ज् शब्द से सुं का लुक् (२४४) होने पर संयोगान्तस्य लोप.(२०) द्वारा जकार का लोप प्राप्त होता है, वह अब इस नियम के कारण नहीं होता। नोट—ध्यान रहे कि नियमसूत्रों के उदाहरण वही होते हैं जो लोक मे प्रत्यु- दाहरण समझे जाते हैं। नियमसूत्रो की चरितार्थता भी इसी में है। पति समास एव (१८४) का उदाहरण वस्तुत 'पत्ये' ही है, 'भूपतये' नही, इसी प्रकार रात्सस्य (२०६) का उदाहरण 'ऊर्क' ही है, 'क्रोष्टु.' नहीं। बालको के बोध के लिय ही 'भूपतये' आदि रूपो में नियमसूत्रों की प्रवृत्ति दर्शाई गई है। 'क्रोष्ट् उर् स्' यहा पर रात्सस्य (२०६) की सहायता से संयोगान्तस्य लोप. (२०) द्वारा सकार का लोप हो कर अवसान में खरवसानयो ०(६३) ? रेफ को विसर्ग करने से 'क्रोष्टु ' रूप सिद्ध होता है। तृज्वद्भाव के अभाव मे घिसज्ञा होकर घेर्डिति (१७२) से गुण तथा ङसि-ङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप होकर 'क्रोष्टो' प्रयोग बनता है।

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