लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् काच० (२००) और ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) के विप्रतिषेध की अवस्था में परत्व के कारण नुट् (७।१।५४) ही होता है यण् (६।४।८२) नहीं। 'प्रधी+इ' (ङि) यहां सवर्णदीर्घ का बाध कर इयङ् प्राप्त होता है। पुनः उस का भी बाध कर एरनेकाच० (२००) से यण् करने पर 'प्रध्यि' रूप सिद्ध होता है। प्रधी+सु' (सुप्) यहां आदेशप्रत्यययो (१५०) से मूर्धन्य हो—'प्रधीषु'। सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन के एकवचन में नद्यन्त न होने से अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व (१६५) द्वारा ह्रस्व नहीं होता—हे प्रधी' । 'प्रधी' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्यः प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,, प्रध्योः प्रध्याम् तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्यि ,, प्रधीषु च० प्रध्ये ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधी' हे प्रध्यौ' हे प्रध्य' वक्तव्य—ऊपर कहा गया 'प्रधी' शब्द प्रपूर्वक ध्यै चिन्तायाम् धातु से क्विप् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है। इस प्रकार से निष्पन्न हुआ 'प्रधी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं होता। यह पुंल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिंग सब प्रकार का हो सकता है। अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से इस की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। यदि प्रथम ध्यै चिन्तायाम् धातु से क्विप् प्रत्यय कर के 'धी' शब्द बना दिया जावे तो वह नित्यस्त्री- लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञक होगा। तब प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी' इस प्रकार समस्त किया हुआ पुंल्लिङ्ग 'प्रधी' शब्द भी प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) से नदीसञ्ज्ञक हो जायेगा। तब आट्, नुट् आदि नदीकार्य भी होंगे। प्रधी (प्रकृष्टा धीर्यस्य स प्रधी । उत्तम बुद्धि वाला) प्र० प्रधी प्रध्यौ प्रध्यः प० प्रध्या† प्रधीभ्याम् प्रधीभ्यः द्वि० प्रध्यम् ,, ,, ष० ,,† प्रध्योः प्रधीनाम्‡ तृ० प्रध्या प्रधीभ्याम् प्रधीभिः स० प्रध्याम्* ,, प्रधीषु च० प्रध्यै† ,, प्रधीभ्यः स० हे प्रधि' @ हे प्रध्यौ' हे प्रध्य' †आण्नद्या (१६६) आटश्च (१६७), एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य (२००)। ‡यहां एरनेकाच० (२००) में यण् तथा ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् का विप्रतिषेध होने पर परकार्य नुट् हो जाता है। *यहां ङेराम्० (१६८) में ङि को आम्, आण्नद्या (१६६) से आट् आगम, आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा एरनेकाच० (२००) में यण् हो जाता है। @अम्बार्थनद्योर्ह्रस्व (१६५), एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४)। शङ्का—नित्यस्त्रीलिङ्ग 'धी' शब्द में अचि श्नु० (१६६) सूत्र द्वारा इयङ् हो— धियौ, धिय' आदि रूप बना करते हैं। परन्तु जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के स्थान पर इयङ् उवङ् हों वहां प्रथम नेयङ्उवङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से नदी सञ्ज्ञा का सर्वथा निषेध हो जाता है, तत्पश्चात् ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित्