भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 268

अजन्त-पुलिङ्ग-प्रकरणम् २५३ विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में नदीसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता है; जैसा कि अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में 'श्री' शब्द पर होता है । तो इस प्रकार 'प्रकृष्टा धीर्यस्य' इस विग्रह वाले प्रधी शब्द में भी आप को वैसा करना चाहिये था । आप के वैसा न करने का क्या कारण है ? समाधान - नेयैङुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र वहां पर निषेध करता है जहां इयङ्, उवङ् प्राप्त नही किन्तु साक्षात् हुआ करते हैं । अत एव 'इयँङुवँङोरस्त्री' न कह कर सूत्र में 'स्थान' शब्द का ग्रहण किया है। 'प्रधी' शब्द मे प्रत्यक्ष यण् होता है इयङ् नही अतः नदीत्व का निषेध न होगा । ङिति ह्रस्वश्च (२२२) तथा वाऽऽमि (२३०) सूत्रों मे 'इयँङुवँङ्स्थानौ' की अनुवृत्ति आती है अतः वे भी प्रवृत्त न होगे । [लघु०] एवं ग्रामणीः । ङौ तु ग्रामण्याम् ॥ व्याख्या—ग्रामं नयतीति = ग्रामणीः । 'ग्राम'कर्मोपपद णीञ् प्रापणे (भ्वा० उ०) धातु से कर्त्ता मे क्विप् च (८०२) सूत्र से क्विप् प्रत्यय करने पर 'ग्रामणी' (ग्राम का नेता, नम्बरदार) शब्द निष्पन्न होता है । अग्रग्रामाभ्यां नयेतेर्णो वाच्यः वार्तिक से यहां नकार को णकार हुआ है । 'ग्रामणी' शब्द मे 'नी' इवर्णान्त धातु है । इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नही । तदन्त 'ग्रामणी' शब्द अनेकाच् अङ्ग भी है । अतः अजादि प्रत्ययों में सर्वत्र एरनेकाचः० (२००) से यण् हो जायेगा । अचि श्नु० (१६६) से इयङ् न होगा । 'ग्रामणी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नही, किन्तु सब लिङ्गों में साधारण है; अतः यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा न होगी । तब आट्, नुट् आदि नदीकार्य न होगे, सम्बुद्धि में ह्रस्व भी न हो सकेगा । समग्र रूपमाला यथा— प्र० ग्रामणीः* ग्रामण्यौ ग्रामण्यः प० ग्रामण्यः ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभ्यः द्वि० ग्रामण्यम् " " ष० " ग्रामण्योः ग्रामण्याम् तृ० ग्रामण्या ग्रामणीभ्याम् ग्रामणीभिः स० ग्रामण्याम्† " ग्रामणीषु च० ग्रामण्ये " ग्रामणीभ्यः सं० हे ग्रामणीः! हे ग्रामण्यौ! हे ग्रामण्यः! *हल्ङन्त न होने से सुंलोप नही होता । †डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र में 'नी' के साक्षात् निर्देश के कारण 'ङि' को 'आम्' आदेश हो जाता है । नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् का आगम नही होता । इसी प्रकार 'अग्रणी' (आगे जाने वाला) तथा 'सेनानी' (सेनापति) शब्दों के रूप बनते है । अब एरनेकाचः० को अधिक स्पष्ट करने के लिये प्रत्युदाहरण दर्शाते है— [लघु०] अनेकाचः किम्—नीः, नियौ, नियः । अमि शसि च परत्वाद् इयङ्— नियम्, नियः । ङेराम्—नियाम् ॥ व्याख्या—एरनेकाचः० (२००) सूत्र में कहा गया है कि 'अङ्ग अनेकाच् हो' यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'नी' शब्द में यण् का न होना । 'नी' (णीञ् प्रापणे धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'नी' शब्द निष्पन्न होता है । इस का अर्थ है—ले जाने